बरेली : रक्षाबंधन के खास मौके पर तीन दिनों तक चलने वाले एक आयोजन में बरेली के मेयर डॉ. उमेश गौतम को 20,000 से अधिक महिलाओं ने राखी बांधी। इस अनूठे आयोजन में मेयर के साथ-साथ उनके बेटे पार्थ गौतम भी शामिल हुए। महिलाओं ने उन्हें भी राखी बांधकर लम्बी उम्र का आशीर्वाद दिया। देश में पहली बार इतने बड़े स्तर पर आयोजित इस स्नेह-बंधन कार्यक्रम की चर्चा पूरे देश में हो रही है। इस आयोजन का एक उल्लेखनीय बिंदु यह भी रहा कि एक साथ 20,000 से अधिक महिलाओं से राखी बँधवाने का यह कार्यक्रम एक विश्व रिकॉर्ड बन सकता था लेकिन मेयर डॉ. उमेश गौतम ने इसे यह कहते हुए हुए मना कर दिया कि उनकी प्राथमिकता रिकॉर्ड बनाना नहीं बल्कि भाई-बहन के इस पवित्र रिश्ते को निभाना और बहनों की शिक्षा, स्वास्थ्य और उनके स्वाभिमान की रक्षा करना है।
फोटो बरेली मेयर
बताते चलें कि फ़िलहाल गिनीज बुक ऑफ़ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स में सबसे ज़्यादा राखी बंधवाने का रिकॉर्ड पटना के खान सर के नाम दर्ज़ है। 2023 में उन्होंने 7,000 से ज्यादा राखियां बंधवाकर यह विश्व रिकॉर्ड बनाया था। लोगों की माने तो यह विशेष आयोजन का राजनीतिक और सामाजिक दोनों ही दृष्टिकोण से बड़ा महत्वपूर्ण है। इस कार्यक्रम में शामिल महिलाओं की भावनाओं का सम्मान करते हुए, डॉ. गौतम ने स्वास्थ्य और शिक्षा के क्षेत्र में कई बड़े वादे किए जिनमें मिशन अस्पताल में विशेष स्वास्थ्य कार्ड के माध्यम से नि:शुल्क इलाज सुनिश्चित कराना, इंटरमीडिएट स्तर तक की मुफ़्त शिक्षा मुहैया कराना और जिन परिवारों के पास राशन कार्ड नहीं है, उन्हें मासिक राशन किट उपलब्ध कराना आदि शामिल है।
भावुक हुए बरेली मेयर
दोनों हाथों में कोहनी तक बंधी राखियों को देखकर मेयर डॉ. उमेश गौतम ने भावुक होकर कहा कि यह उनके लिए गर्व और ज़िम्मेदारी का पल है। उन्होंने उन सभी महिलाओं को विश्वास दिलाया कि रेशम की एक डोरी से जुड़ा भाई-बहन का यह रिश्ता वह मरते दम तक निभाएंगे और अपनी बहनों की भलाई के वह भाई बनकर हमेशा उनके साथ खड़े रहेंगे।
बरेली के स्टेडियम मेयर के कैंप कार्यालय और कई बैंक्वेट हॉल्स में आयोजित इस कार्यक्रम में बड़ी संख्या में महिलाएं शामिल हुईं। स्थानीय लोगों ने जहाँ इसे सामाजिक भाईचारे और राजनीतिक जुड़ाव का एक नया अध्याय बताया तो वहीं राखी बांधने पहुँची सभी महिलाओं ने एक स्वर में कहा कि उन्हें गर्व है कि वो डॉ. उमेश गौतम की बहनें हैं।
इस दौर में जब रिश्तों की परिभाषा बड़ी तेज़ी से बदल रही है और युवा पीढ़ी भारतीय परम्पराओं और मूल्यों से कहीं न कहीं दूर जाती दिख रही है, ऐसे में इस तरह के आयोजन से न सिर्फ़ युवाओं को प्रेरणा मिलती है बल्कि समाज को एक नई दिशा मिलती है।
