GDP 2.6% Vs 7.8%: भारत की GDP वाकई 7.8% बढ़ी है या देश की असली आर्थिक ग्रोथ सिर्फ 2.6% के आसपास है? वित्त वर्ष 2026-27 की पहली तिमाही के GDP आंकड़ों ने इस सवाल को लेकर बड़ा विवाद खड़ा कर दिया है। 31 अगस्त, 2026 को जारी आंकड़ों के मुताबिक अप्रैल-जून तिमाही में भारत की Real GDP Growth 7.8% रही, जबकि Nominal GDP Growth 10.3% दर्ज की गई। यह आंकड़ा नई 2022-23 बेस ईयर वाली GDP सीरीज पर आधारित है।
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लेकिन, भारत सरकार के पूर्व वित्त सचिव सुभाष चंद्र गर्ग ने इस आंकड़े पर सवाल उठाते हुए कहा कि अगर पिछले साल के GDP आंकड़ों में बड़ी कटौती नहीं की गई होती, तो मौजूदा साल की ग्रोथ बेहद कम दिखती। उनके हिसाब से मौजूदा कीमतों पर ग्रोथ करीब 2.6% बैठती है और रियल ग्रोथ भी बहुत कम, यहां तक कि शून्य के करीब हो सकती है।
फिलहाल, भारत के 17वें मुख्य आर्थिक सलाहकार (CEA) रे प्रो. कृष्णमूर्ति वी सुब्रमण्यम (Krishnamurthy V. Subramanian) ने इस दावे पर पलटवार किया है। उनका कहना है कि 2.6% निकालने का तरीका ही गलत है, क्योंकि इसमें अलग-अलग GDP सीरीज के आंकड़ों को आपस में मिलाकर तुलना की गई है।
पहले समझिए पूरा विवाद क्या है?
गर्ग का तर्क है कि पुरानी 2011-12 बेस वाली GDP सीरीज में वित्त वर्ष 2025-26 की पहली तिमाही यानी Q1 FY26 का नॉमिनल GDP करीब ₹86.05 लाख करोड़ था। नई 2022-23 बेस वाली सीरीज में इसी तिमाही का आंकड़ा करीब ₹80 लाख करोड़ रह गया। यानी पिछली सीरीज की तुलना में लगभग ₹6 लाख करोड़ की बड़ी कमी दिखाई दी। अब Q1 FY27 का नॉमिनल GDP करीब ₹88.27 लाख करोड़ है। इस तरह वृद्धि लगभग 2.6% बनती है। यहीं से पूरा विवाद शुरू हुआ।
प्रो. सुब्रमण्यम बोले गर्ग ने की संतरे से सेब की तुलना
प्रो. सुब्रमण्यम के मुताबिक 2.6% की गणना में पहली और सबसे बड़ी समस्या यह है कि पुरानी GDP सीरीज के आंकड़े को नई GDP सीरीज के आंकड़े के साथ जोड़ दिया गया। मतलब एक तरफ पुरानी 2011-12 बेस वाली सीरीज का ₹86.05 लाख करोड़ और दूसरी तरफ नई 2022-23 बेस वाली सीरीज का ₹88.27 लाख करोड़ लेकर ग्रोथ निकाल दी गई। सुब्रमण्यम का तर्क है कि यह “Apples to Oranges” की तरह है। GDP सीरीज बदलने पर सिर्फ बेस ईयर नहीं बदलता, बल्कि डेटा स्रोत, सेक्टरल वेटेज, कवरेज और कई एस्टिमेशन मेथड भी अपडेट होते हैं। इसलिए तुलना के लिए दोनों वर्षों के आंकड़े एक ही सीरीज और एक ही मेथड पर होने चाहिए।
आसान भाषा में समझिए
मान लीजिए किसी कंपनी ने अपना अकाउंटिंग सिस्टम ही बदल दिया। पुराने सिस्टम से निकले पिछले साल के आंकड़े और नए सिस्टम से निकले इस साल के आंकड़े को सीधे डिवाइड करके ग्रोथ रेट निकालना सही नहीं होगा। पहले पिछले साल के आंकड़े को भी नए सिस्टम के हिसाब से तैयार करना पड़ेगा GDP में भी यही किया जाता है।
2.6% से 7.8% तक पहुंचने की असली कहानी
गर्ग असल में 2.6% का आंकड़ा नॉमिनल GDP की गणना से निकाला रहे हैं। जबिक, जबकि सरकार का 7.8% आंकड़ा रियल GDP ग्रोथ का है। नॉमिनल GDP में मौजूदा कीमतों पर आर्थिक गतिविधि का मूल्य देखा जाता है। इसमें कीमतों में बदलाव भी शामिल होता है। जबकि, रियल GDP में कीमतों के असर को हटाकर वास्तविक उत्पादन और आर्थिक गतिविधि में बदलाव को मापा जाता है।
व्यापक हुआ डेटा कलेक्शन
प्रो. सुब्रमण्यम ने इसी को अपनी दूसरी आपत्ति बनाया है। उनका कहना है कि नॉमिनल GDP की गणित से रियल GDP ग्रोथ के 7.8% आंकड़े को खारिज नहीं किया जा सकता। भारत की नई GDP मेथडॉलॉजी में प्राइस मेजरमेंट और डिफ्लेशन के तरीके भी बदले गए हैं। भारत की नई GDP सीरीज में अधिक व्यापक प्राइस इन्फॉर्मेशन का इस्तेमाल किया जा रहा है। सांख्यिकी मंत्रालय के मुताबिक नए तरीके में होलसेल प्राइस बेस्ड तरीके को आगे बढ़ते हुए 300 से अधिक प्राइस डिफ्लेक्टर्स का इस्तेमाल किया गया है, जबकि पहले करीब 180 डिफ्लेक्टर थे।
GDP के आंकड़े बदले क्यों गए?
क्या पिछले साल का GDP डेटा घटा दिया गया, ताकि इस साल की ग्रोथ रेट बड़ी दिखाई दे? यही सबसे बड़ा राजनीतिक और सार्वजनिक सवाल बन गया है। लेकिन GDP के आंकड़ों में रिविजन असामान्य नहीं हैं। पहली बार जारी होने वाले तिमाही अनुमान अक्सर उपलब्ध शुरुआती डेटा पर आधारित होते हैं। GDP के अंतिम आंकड़े 3 साल बाद तक आते हैं।
7.8% Real GDP Growth कैसे निकली?
नई 2022-23 बेस वाली सीरीज में Q1 FY26 की Real GDP ₹75.46 लाख करोड़ से बढ़कर Q1 FY27 में ₹81.36 लाख करोड़ हुई। इसी कॉन्स्टेंट प्राइस कंपोजिशन 7.8% रियल GDP ग्रोथ निकलती है। यानी 7.8% की जगह 2.6% का गणित दो अलग सीरीज के आंकड़ों को निकाला गया है, जबकि यह सही तरीका नहीं है। प्रो. सुब्रमण्यम का कहना है कि अलग-अलग सीरीज के नॉमिनल GDP डाटा को रियल GDP डाटा से कंपेयर करके मनमाना आंकड़ा तो निकाला जा सकता है। लेकिन, इससे GDP ग्रोथ झूठा साबित नहीं किया जा सकता है।
क्या खपत आ रही कमी?
र्गग ने देश में खपत घटने का भी दावा किया था। लेकिन, आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक Q1 FY27 में रियल प्राइवेट फाइनल कंजप्शन एक्सपेंडिचर 7.1% बढ़ी है। इसे लेकर प्रो. सुब्रमण्यम कहते हैं कि गर्ग का यह दावा भी निराधार है कि देश में खपत घट रही है। इसके अलावा दूसरी आर्थिक गतिविधियों के संकेतक भी इकोनॉमी के बढ़ने की ही तस्वीर दिखाते हैं। खासतौर पर इंडस्ट्रियल प्रोडक्शन में 6.3% वृद्धि हुई है। ग्रॉस कैपिटल फॉर्मेशन में 11.9% वृद्धि हुई है।
