टर्म इंश्योरेंस का मकसद पॉलिसीधारक की मृत्यु के बाद उसके परिवार को आर्थिक सहारा देना है। अगर पॉलिसी की अवधि के दौरान बीमित व्यक्ति की मृत्यु हो जाती है, तो पॉलिसी की शर्तों के अनुसार नॉमिनी को डेथ बेनिफिट मिल सकता है। आमतौर पर प्राकृतिक मौत, बीमारी या दुर्घटना जैसी स्थितियां कवर में शामिल होती हैं। लेकिन कुछ परिस्थितियों में बीमा कंपनी क्लेम को रोक सकती है या खारिज कर सकती है। इसलिए केवल पॉलिसी खरीदना ही काफी नहीं है, बल्कि उसके नियम और अपवाद समझना भी जरूरी है।
कब नॉमिनी को नहीं मिलते हैं टर्म इंश्योरेंस के पैसे?
नशे में गाड़ी चलाने पर मौत
अगर पॉलिसीधारक की मौत नशे की हालत में गाड़ी चलाते समय हुए हादसे से होती है, तो कुछ पॉलिसियों में इसे कवर से बाहर रखा जा सकता है। शराब या किसी अन्य नशीले पदार्थ के प्रभाव में ड्राइविंग से हुई मौत के मामले में क्लेम की शर्तें पॉलिसी के अनुसार देखी जाती हैं। इसलिए ऐसी स्थिति में बीमा कंपनी जांच के बाद फैसला लेती है।
ड्रग्स या नशे से जुड़ी मौत
ड्रग्स या शराब की लत और उसके कारण हुई मौत भी कुछ टर्म प्लान की शर्तों में बाहर हो सकती है। खासकर ओवरडोज या नशे के सीधे असर से हुई मौत के मामले में पॉलिसी की शर्तें महत्वपूर्ण होती हैं। बीमा खरीदते समय नशे की आदत से जुड़ी जानकारी छिपाना भी बाद में परेशानी पैदा कर सकता है।
खतरनाक खेल या स्टंट
अगर किसी व्यक्ति की मौत खतरनाक खेल या गतिविधि के दौरान होती है, तो हर टर्म प्लान में इसका कवर मिलना जरूरी नहीं है। कार या बाइक रेसिंग, स्काइडाइविंग, पैराग्लाइडिंग, स्कूबा डाइविंग और बंजी जंपिंग जैसी गतिविधियों को कुछ पॉलिसियों में जोखिम वाली गतिविधि माना जा सकता है। ऐसे मामलों में क्लेम पॉलिसी की शर्तों के आधार पर तय होता है।
हत्या के मामले में नॉमिनी की भूमिका
अगर पॉलिसीधारक की हत्या हो जाती है और जांच में नॉमिनी की भूमिका सामने आती है, तो क्लेम का भुगतान तुरंत नहीं किया जा सकता। ऐसे मामले में बीमा कंपनी जांच के नतीजे का इंतजार कर सकती है। अगर नॉमिनी पर हत्या का आरोप साबित होता है, तो भुगतान से जुड़ा फैसला उसी के आधार पर किया जाता है।
बीमारी की जानकारी छिपाना पड़ सकता है भारी
टर्म इंश्योरेंस लेते समय अपनी सेहत से जुड़ी सही जानकारी देना बहुत जरूरी है। अगर पॉलिसी खरीदते समय किसी गंभीर बीमारी की जानकारी जानबूझकर छिपाई गई और बाद में उसी बीमारी से मृत्यु हो गई, तो क्लेम पर सवाल उठ सकता है। बीमा कंपनी प्रस्ताव फॉर्म में दी गई जानकारी और उपलब्ध दस्तावेजों की जांच कर सकती है।
आपराधिक गतिविधि में मौत
अगर पॉलिसीधारक किसी आपराधिक गतिविधि में शामिल था और उसी गतिविधि के दौरान उसकी मौत हो जाती है, तो क्लेम पर असर पड़ सकता है। ऐसे मामलों में पुलिस जांच और पॉलिसी की शर्तें काफी महत्वपूर्ण होती हैं। बीमा कंपनी उपलब्ध रिकॉर्ड के आधार पर दावे पर फैसला करती है।
आत्महत्या के मामले में खास नियम
टर्म इंश्योरेंस में आत्महत्या से जुड़ा नियम अलग होता है और इसमें तय अवधि के दौरान विशेष शर्तें लागू हो सकती हैं। मौजूदा नियामकीय नियमों के तहत कई गैर-लिंक्ड जीवन बीमा उत्पादों में जोखिम शुरू होने या पॉलिसी दोबारा चालू होने के 12 महीने के भीतर आत्महत्या की स्थिति में कम-से-कम कुल जमा प्रीमियम का 80 फीसदी या उपलब्ध सरेंडर वैल्यू, जो अधिक हो, देने का प्रावधान है। हालांकि संबंधित पॉलिसी के नियम देखना जरूरी है।
इसलिए टर्म इंश्योरेंस लेते समय सिर्फ कम प्रीमियम और बड़ा कवर देखकर फैसला नहीं करना चाहिए। पॉलिसी में किन मौतों को कवर किया गया है और किन परिस्थितियों में अपवाद लागू होते हैं, इसे ध्यान से पढ़ना जरूरी है। साथ ही स्वास्थ्य, नशे की आदत और अन्य जरूरी जानकारी सही-सही देनी चाहिए। इससे भविष्य में परिवार के क्लेम के समय परेशानी कम हो सकती है।
