अमेरिका और भारत के रिश्ते लगातार खराब हो रहे हैं। एक साल से ज्यादा समय बीतने के बाद भी दोनों देशों में ट्रेड डील नहीं हो पाई है। अब ट्रंप प्रशासन ने टीसीएस, इंफोसिस, विप्रो समेत 8 बड़ी भारतीय IT कंपनियों को ग्रीन कार्ड से जुड़े PERM (परमानेंट लेबर सर्टिफिकेशन) प्रोग्राम से सस्पेंड कर दिया है। इससे पहले भी ट्रंप का ग्रीन कार्ड, स्टूडेंट वीजा और रूस से तेल खरीदने जैसे मुद्दों पर टैरिफ और फीस के जरिये भारत को घेर चुके हैं।
अब ताजा ग्रीन कार्ड नियम से भारतीय IT सेक्टर की चिंता बढ़ गई है। इस बीच ऐलन मस्क के 'स्टारलिंक' जैसी टेक दिग्गजों की भारतीय बाजार में एंट्री की कोशिशों ने भी एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या अमेरिका व्यापार की आड़ में भारत की आर्थिक संप्रभुता पर दबाव बनाने और नकेल कसने की कोशिश कर रहा है?
ट्रंप की भारत के प्रति लगातार होती सख्त नीतियों को लेकर हमने देश के जाने-माने अर्थशास्त्री प्रो. अरुण कुमार से बात की। उन्होंने बताया कि ट्रंप की नीति काफी हद तक 'ट्रांजैक्शनल' यानी लेन-देन पर आधारित है। वह उन्हीं संबंधों को प्राथमिकता देते हैं, जिनसे अमेरिका को सीधा फायदा हो। ऐसे में भारत के सामने चुनौती सिर्फ ट्रेड डील नहीं, बल्कि अपनी इकोनॉमी की रक्षा की भी है। आइए समझते हैं कि ट्रंप क्या चाह रहे हैं और भारत के पास क्या विकल्प बचा है?
डोनाल्ड ट्रंप की नीति को समझना जरूरी
अरुण कुमार के अनुसार, डोनाल्ड ट्रंप की नीति को समझने के लिए यह देखना जरूरी है कि अमेरिका ने अभी तक दूसरे देशों के साथ क्या किया है? ट्रंप द्वारा किए गए अभी तक के ट्रेड डील पर नजर डालें तो उन्होंने अपने फायदे के अनुसार ट्रेड डील की है। यूरोपीय संघ, जापान और कनाडा जैसे देशों के साथ भी ट्रंप ने अपने आर्थिक हितों को ध्यान में रखकर डील करने की कोशिश की है। इससे उनके रिश्ते खराब भी हुए हैं। हालांकि, उन्होंने दुनिया के देशों के बीच फूट डालकर अपना हित साधा है। सभी देश बेहतर डील की उम्मीद में ट्रंप की बातों में आ गए हैं। होना यह चाहिए था कि WTO-1 यानी दुनिया के सभी देश एक तरफ और अमेरिका एक तरफ लेकिन ऐसा हो नहीं पाया है। चीन, रूस, कनाडा, ब्राजिल जैसे कुछ देशों ने उनकी बात नहीं मानी है। भारत को भी यह रणनीति अपनानी होगी। हर बात पर झुकने की जगह अपनी बात मजबूती से रखनी होगी।
भारत के IT सेक्टर पर अमेरिक की नजर क्यों?
अब सवाल उठता है कि ट्रेड डील के बहाने हाई टैरिफ के बाद अमेरिका लगातार भारतीय आईटी सेक्टर पर नकेल क्यों कसना चाह रहा है। इसके पीछे भी कारोाबार है। अमेरिका भारतीय IT कंपनियों का सबसे बड़ा बाजार है। RBI के FY 2025-26 के आंकड़ों के मुताबिक, भारत का सॉफ्टवेयर सर्विसेज निर्यात 221.4 अरब डॉलर रहा, जिसमें अमेरिका की हिस्सेदारी 54.1% थी। वहीं, NASSCOM के अनुसार, FY 2024-25 में भारत की टेक इंडस्ट्री का कुल रेवेन्यू करीब 282.6 अरब डॉलर और रोजगार लगभग 58 लाख लोगों का था। भारतीय IT कंपनियां अमेरिका में भी बड़े पैमाने पर रोजगार देती हैं।
भारत की कुल जीडीपी में आईटी-बीपीएम (IT-BPM) सेक्टर का योगदान करीब 7.4% से 8% है और यह देश के कुल सेवा निर्यात का 40% से अधिक हिस्सा कवर करता है। अमेरिका भारतीय आईटी सेक्टर पर हमला कर भारत को कमजोर करना चाहता है। ट्रंप प्रशासन की लगातार यह कोशिश है कि भारतीय कंपनियों के रेवन्यू पर असर डाला जाए। इससे भारत में व्यापक असर देखने को मिल सकता है।
AI में पिछड़ने से संकट और बढ़ा
भारत AI की दुनिया में काफी पिछड़ गया है। भारत की बड़ी कमजोरी यह है कि कई महत्वपूर्ण तकनीकों के लिए वह अमेरिका पर निर्भर है। भारतीय IT कंपनियां वैश्विक सेवाओं में मजबूत हैं, लेकिन अत्याधुनिक तकनीक, अपने अनुसंधान एवं विकास (R&D), उच्चस्तरीय कंपोनेंट और नई तकनीकी खोजों के मामले में काफी पीछे हैं। अगर देश की कंपनियां विदेशी बाजार, वीजा नियमों और बाहरी तकनीक पर बहुत अधिक निर्भर हों, तो दूसरे देश की नीतियों में बदलाव का असर उसके कारोबार पर असर होता है। इसलिए भारत को IT सेवाओं में अपनी मौजूदा ताकत बनाए रखने के साथ-साथ स्वदेशी तकनीक, उत्पाद विकास और अनुसंधान में भी निवेश बढ़ाने की जरूरत है।
स्टारलिंक की एंट्री एकदम से नहीं हुई?
अरुण कुमार का मानना है कि एलन मस्क की कंपनी स्टारलिंक और भारतीय टेलीकॉम बाजार का मुद्दा भी महत्वपूर्ण है। सैटेलाइट इंटरनेट जैसी तकनीक दूरदराज के इलाकों में कनेक्टिविटी देने का काम कर सकती है। लेकिन ऐसी सेवाओं का प्रवेश केवल कारोबारी प्रतिस्पर्धा तक सीमित नहीं होता। इसमें राष्ट्रीय सुरक्षा, डेटा, संचार नेटवर्क और नियामकीय नियंत्रण जैसे सवाल भी जुड़े होते हैं। भारत के पास अधिकार है कि वे अपनी रणनीतिक जरूरतों के हिसाब से किन तकनीकों और कंपनियों को किस तरह बाजार में प्रवेश दें। इसलिए ऐलन मस्क का आरोप सही नहीं है। वो अपने कारोबारी फायदे के लिए दबाब बनाने की कोशिश कर रहे हैं।
भारत के सामने क्या हैं चुनौतियां?
अगर ट्रंप के काम करने के तरीकों पर नजर डालें तो टैरिफ यानी आयात शुल्क उनकी व्यापार नीति का अहम हिस्सा रहा है। अमेरिका ने भारत समेत कई देशों के साथ टैरिफ शर्तों को लेकर सख्त रुख अपनाया है। ऐसा इसलिए की अमेरिकी इकोनॉमी का साइज 30 ट्रिलयन डॉलर की है। दुनियाभर के देश अमेरिका को निर्यात करते हैं। यानी अमेरिका दुनिया का बड़ा बजार है। इस बात को ट्रंप समझ रहे हैं और वह उसका फायदा उठाना चाह रहे हैं।
इस हालात में भारत के लिए मुश्किल यह है कि अमेरिका उसका एक बड़ा निर्यात बाजार है। कपड़ा, परिधान और अन्य उत्पादों के निर्यात पर शुल्क बढ़ने से भारतीय कंपनियों की प्रतिस्पर्धा प्रभावित हो सकती है। दूसरी ओर, भारत कृषि और डेयरी जैसे संवेदनशील क्षेत्रों को अमेरिका के लिए खोल नहीं सकता है। अमेरिका चाहता है कि भारत उसके लिए अपना एग्रीकल्चर सेक्टर खोल जो कि संभव नहीं है। आज भी भारत की 46% अबादी कृषि पर निर्भर है। भारत अमेरिकी टेक्नोलॉजी पर बहुत ज्यादा निर्भर है। इन चुनौतियों से भारत को पार पाना होगा।
भारत को घेरने की रणनीति
घरेलू मांग बढ़ाना सबसे बेहतर विकल्प
अरुण कुमार के मुताबिक, भारत को अपनी अर्थव्यवस्था की मजबूती केवल निर्यात या बड़े संगठित उद्योगों के प्रदर्शन से नहीं आंकनी चाहिए। देश की बड़ी आबादी कृषि, छोटे कारोबार, घरेलू उत्पादन और असंगठित क्षेत्र से जुड़ी है। अगर इन क्षेत्रों की आय और उत्पादकता नहीं बढ़ती, तो अर्थव्यवस्था की व्यापक मांग कमजोर रह सकती है।
उनके मुताबिक, भारत को घरेलू बाजार मजबूत करने पर ज्यादा ध्यान देना चाहिए। छोटे उद्योगों, कपड़ा कारोबार, स्थानीय विनिर्माण और रोजगार देने वाले व्यवसायों की क्षमता बढ़ाने से लोगों की आय और खरीदने की ताकत में सुधार हो सकता है। मजबूत घरेलू मांग वैश्विक बाजार में उतार-चढ़ाव के समय अर्थव्यवस्था को सहारा दे सकती है।
इसका अर्थ निर्यात से दूरी बनाना नहीं है। भारत को वैश्विक बाजार में अपनी हिस्सेदारी बढ़ाने के साथ-साथ घरेलू उत्पादन और खपत के बीच संतुलन बनाना होगा। बड़े उद्योगों और संगठित क्षेत्र के साथ छोटे कारोबारों की समस्याओं पर भी पर्याप्त ध्यान देना जरूरी है।
अमेरिका से मुकाबला कैसे संभव?
अरुण कुमार के मुताबिक, भारत को तकनीक के मामले में अपनी कमजोरियों को गंभीरता से देखना होगा। इलेक्ट्रॉनिक कंपोनेंट से लेकर अत्याधुनिक चिप, औद्योगिक तकनीक और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस तक, कई क्षेत्रों में भारत को विदेशी कंपनियों और देशों की विशेषज्ञता की जरूरत पड़ती है। AI के तेजी से विकास ने इस चुनौती को और बड़ा कर दिया है। आने वाले समय में उन्नत AI मॉडल, कंप्यूटिंग क्षमता और स्वचालित प्रणालियां अर्थव्यवस्था और रोजगार को प्रभावित कर सकती हैं। अगर भारत केवल विदेशी तकनीक का उपभोक्ता बना रहता है, तो नई तकनीकी क्रांति से पैदा होने वाले अवसरों का बड़ा हिस्सा दूसरे देशों के पास जा सकता है।
इसलिए भारत को अपने विश्वविद्यालयों, अनुसंधान संस्थानों और कंपनियों के बीच सहयोग बढ़ाना चाहिए। सेमीकंडक्टर, इलेक्ट्रॉनिक्स, ऊर्जा, रक्षा उपकरण और AI जैसे क्षेत्रों में घरेलू क्षमता विकसित करना जरूरी है। इसका अर्थ यह नहीं कि भारत को विदेशों से तकनीक लेना बंद कर देना चाहिए, बल्कि यह कि विदेशी तकनीक के साथ अपनी क्षमता भी बढ़ानी होगी।
भारत के सामने आगे क्या रास्ता?
भारत को अपनी आर्थिक नीतियों की समीक्षा करते हुए उन क्षेत्रों की पहचान करनी चाहिए जहां विदेशी निर्भरता सबसे अधिक है। व्यापार समझौते जरूरी हैं, लेकिन उनका मूल्यांकन केवल टैरिफ में कमी या निवेश के वादों से नहीं होना चाहिए। यह भी देखना होगा कि उनसे घरेलू उद्योग, रोजगार, तकनीकी क्षमता और नीतिगत स्वतंत्रता पर क्या असर पड़ेगा।
भारत को कृषि और अन्य संवेदनशील क्षेत्रों के हितों की रक्षा करते हुए निर्यात के नए अवसर तलाशने होंगे। साथ ही, R&D, उच्च तकनीक, ऊर्जा सुरक्षा और छोटे कारोबारों को मजबूत करने पर निवेश बढ़ाना होगा। अंतरराष्ट्रीय मंचों पर अन्य देशों के साथ सहयोग और बहुपक्षीय व्यापार व्यवस्था को मजबूत करना भी महत्वपूर्ण है।
