पत्रकार के तौर पर अपनी नौकरी छोड़ने पर सिन्हा को दो महीने की सैलरी के तौर पर ₹250 मिले थे। उन्होंने इसी पैसे से एक छोटा गैराज किराये पर लिया और रिटायर्ड सैनिकों को रोजगार देने के इरादे से सिक्योरिटी कंपनी शुरू की।
आरके सिन्हा ने खड़ा किया अरबों का कारोबार
5 दशक बाद यही कारोबार करीब ₹16,000 करोड़ के सालाना रेवेन्यू वाले ग्लोबल बिजनेस ग्रुप में बदल गया। यह कहानी है SIS Group के संस्थापक रविन्द्र किशोर सिन्हा (R.K. Sinha) की, जिनका 75 वर्ष की उम्र में 30 अक्टूबर, 2026 को निधन हो गया।
पत्रकारिता से शुरू किया सफर?
बिहार के बक्सर में जन्मे सिन्हा ने पटना में पढ़ाई की और राजनीतिक विज्ञान तथा कानून की डिग्री हासिल की। उन्होंने अपने करियर की शुरुआत पटना के अखबार 'सर्चलाइट' में पत्रकार के तौर पर की थी। 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध की रिपोर्टिंग के दौरान उनका संपर्क बिहार रेजिमेंट के सैनिकों से हुआ। इस दौरान उन्होंने देखा कि सेना से रिटायर होने के बाद कई अनुशासित और प्रशिक्षित जवानों को रोजगार के लिए संघर्ष करना पड़ता है।
क्यों छोड़नी पड़ी पहली नौकरी?
1973 में जयप्रकाश नारायण के राजनीतिक विचारों से प्रभावित होकर उन्होंने खुलकर उनका समर्थन किया। इससे अखबार प्रबंधन से उनके मतभेद हुए और उन्हें नौकरी छोड़नी पड़ी। नौकरी छोड़ने पर उन्हें दो महीने की सैलरी के रूप में करीब ₹250 मिले। यह रकम उनकी जिंदगी का सबसे बड़ा कारोबारी निवेश साबित हुई।
14 पूर्व सैनिकों के साथ शुरू की SIS
RK Sinha को नौकरी छोड़ने पर जो 250 रुपये मिले, उन्ही से पटना में एक छोटा गैराज किराये पर लिया। 1974 में उन्होंने सिक्योरिटी एंड इंटेलिजेंस सर्विसेज (SIS) की शुरुआत की। उनके एक दोस्त निर्माण कार्य से जुड़े थे और उन्हें अपनी प्रोजेक्ट साइट की सुरक्षा के लिए पूर्व सैनिकों की जरूरत थी। सिन्हा ने बिहार रेजिमेंट के अपने संपर्कों की मदद से 14 रिटायर्ड सैनिकों को सिक्योरिटी गार्ड के तौर पर नियुक्त किया।
पूर्व सैनिकों की मदद जज्बा बना कारोबार
शुरुआत में उनका मकसद केवल पूर्व सैनिकों को रोजगार देना था, लेकिन धीरे-धीरे दूसरे कारोबारी भी उनसे सिक्योरिटी सेवाएं लेने लगे। सिन्हा ने कर्मचारियों के बेहतर कामकाजी माहौल, प्रशिक्षण और अनुशासन पर ध्यान दिया। इसका असर कारोबार पर दिखा। पहले ही साल कंपनी में 250-300 लोग काम करने लगे और टर्नओवर ₹1 लाख से ज्यादा पहुंच गया।
कैसे फैलता गया कारोबार
SIS ने समय के साथ खुद को सिर्फ सिक्योरिटी गार्ड उपलब्ध कराने वाली कंपनी तक सीमित नहीं रखा। कंपनी ने ट्रेनिंग और मैनेजमेंट सिस्टम पर निवेश किया। 1986 में ग्रेजुएट ट्रेनी ऑफिसर प्रोग्राम शुरू किया गया। 2005 तक कंपनी का टर्नओवर करीब ₹25 करोड़ पहुंच गया था। इसी दौर में उसने अपने ऑफिस नेटवर्क को 14 से बढ़ाकर 52 किया और बैंकिंग सेक्टर की जरूरतों को देखते हुए कैश मैनेजमेंट कारोबार में भी कदम रखा।
इसके बाद कंपनी ने फैसिलिटी मैनेजमेंट और इलेक्ट्रॉनिक सिक्योरिटी जैसे क्षेत्रों में विस्तार किया। इस तरह SIS सिक्योरिटी, कैश लॉजिस्टिक्स और फैसिलिटी मैनेजमेंट की एकीकृत सेवा देने वाला ग्रुप बन गया।
कैसे बने ग्लोबल प्लेयर
सिन्हा के कारोबारी सफर का सबसे बड़ा मोड़ 2008 में आया। उस साल SIS ने ऑस्ट्रेलिया की बड़ी सिक्योरिटी कंपनी Chubb Security का अधिग्रहण किया। इकोनॉमिक टाइम्स को दिए एक इंटरव्यू में सिन्हा ने इस डील का आकार करीब 300 मिलियन डॉलर बताया था। इस अधिग्रहण को फंड करने के लिए कंपनी ने अमेरिकी हेज फंड DE Shaw को अपनी 14% हिस्सेदारी भी बेची।
इस डील ने SIS को भारतीय बाजार से निकालकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर स्थापित कर दिया। 2009 में कंपनी का रेवेन्यू ₹1000 करोड़ के पार पहुंच गया। बाद में कंपनी ने ऑस्ट्रेलिया के अलावा न्यूजीलैंड और सिंगापुर में भी अपना कारोबार बढ़ाया।
₹15,982 करोड़ रेवेन्यू, 3.57 लाख से ज्यादा कर्मचारी
SIS ने अगस्त 2017 में शेयर बाजार में दस्तक दी। कंपनी की ग्रोथ का अंदाजा इसके वित्तीय आंकड़ों से लगाया जा सकता है। वित्त वर्ष 2025-26 में SIS Group का कंसोलिडेटेड रेवेन्यू ₹15,982 करोड़ रहा, जो पिछले वित्त वर्ष के ₹13,189 करोड़ से 21.2% अधिक है। इस दौरान कंपनी का कंसोलिडेटेड प्रॉफिट आफ्टर टैक्स ₹138 करोड़ रहा।
कंपनी की FY26 एनुअल रिपोर्ट के मुताबिक, 31 मार्च 2026 तक इसके सिक्योरिटी, फैसिलिटी मैनेजमेंट और कैश लॉजिस्टिक्स कारोबार में करीब 3,57,028 कर्मचारी काम कर रहे थे।
मदद के जज्बे और विजन ने बदली जिंदगी
खुलकर राजनीतिक विचार रखने की वजह से जहां उन्हें नौकरी गंवानी पड़ी। वहीं, आगे चलकर इन्हीं राजनीतिक विचारों के चलते जनसंघ और भाजपा में ऊंचे कद का नेता बनाया। इस तरह खुलकर अपनी अपने विचार रखने की हिम्मत ने उन्हें राजनीति का आसामान दिया। वहीं, दूसरी तरफ पूर्व सैनिकों की मदद के लिए अपनी नौकरी गंवाने पर मिले ₹250 लगाने की हिम्मत से 16 हजार करोड़ का कारोबार बना।
