मिडल ईस्ट में छिड़ी जंग, RBI ने बैंकों से मांगा पूरा हिसाब; पूछा- 'वहां कितना फंसा है आपका पैसा?'

युद्ध की स्थिति में अगर वहां रह रहे भारतीयों की कमाई प्रभावित होती है, तो भारत के विदेशी मुद्रा भंडार और बाजार की लिक्विडिटी पर सीधा असर पड़ेगा। साथ ही, एक्सपोर्टर्स को डर है कि ऑर्डर कैंसिल होने और लॉजिस्टिक्स की दिक्कतों के कारण भारतीय निर्यात को 8-10 अरब डॉलर का बड़ा झटका लग सकता है।

दुनिया के नक्शे पर पश्चिम एशिया (West Asia) यानी मिडल ईस्ट में छिड़ी जंग ने न केवल वैश्विक राजनीति, बल्कि भारत की अर्थव्यवस्था और बैंकिंग सेक्टर की भी चिंता बढ़ा दी है। ईरान और इजरायल के बीच बढ़ते तनाव को देखते हुए भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) पूरी तरह एक्शन मोड में आ गया है। आरबीआई ने देश के सभी प्रमुख बैंकों को निर्देश दिया है कि वे मिडल ईस्ट में अपने सीधे और परोक्ष (Indirect) निवेश और जोखिम यानी 'एक्सपोजर' की पूरी जानकारी साझा करें। दरअसल, इस युद्ध की वजह से दुनिया भर के करीब 2.5 ट्रिलियन डॉलर के बॉन्ड मार्केट में हलचल मच गई है, जिसका असर भारतीय वित्तीय बाजार पर भी पड़ सकता है।

RBI on Middle East

आरबीआई आखिर क्यों मांग रहा है हिसाब?

केंद्रीय बैंक यह समझना चाहता है कि अगर युद्ध लंबा खिंचता है, तो भारतीय बैंकों पर इसका कितना बुरा असर पड़ सकता है। बैंकों का पैसा वहां कई रूपों में फंसा हो सकता है। इसमें सबसे पहले वे भारतीय कंपनियां आती हैं जिनका बड़ा कारोबार मिडल ईस्ट में फैला हुआ है। इसके अलावा, वहां से भारी मात्रा में आयात-निर्यात (Import-Export) करने वाली कंपनियां और वहां रह रहे एनआरआई (NRI) ग्राहकों के होम लोन जैसे रिटेल लोन भी जोखिम के दायरे में हैं। हालांकि बैंकों का सीधा निवेश वहां कम हो सकता है, लेकिन कई भारतीय कंपनियां अपने रेवेन्यू के लिए पूरी तरह खाड़ी देशों पर निर्भर हैं। अगर उनका काम रुकता है, तो वे बैंकों का कर्ज नहीं चुका पाएंगी, जिससे बैंकों का एनपीए (NPA) बढ़ सकता है।

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