Mutual Fund Stocks Investment : म्यूचुअल फंड में निवेश करने वाले कई निवेशक फंड मैनेजर की निवेश रणनीति पर पूरी तरह भरोसा नहीं करते। लेकिन जैसे ही किसी फंड की नई फैक्टशीट सामने आती है, उनकी नजर सबसे पहले इस बात पर जाती है कि फंड मैनेजर ने कौन सा शेयर खरीदा और किस शेयर में बिकवाली की। इसके बाद कई निवेशक उन्हीं शेयरों को अपने पोर्टफोलियो में शामिल करने की कोशिश करने लगते हैं। यानी फंड मैनेजर पर भरोसा आधा-अधूरा, लेकिन उसके शेयर खरीदने की नकल पूरी।
सिर्फ फंड का एक्शन देखकर नहीं करें निवेश
यही सोच विजय मंत्री ने एक बेहद आसान उदाहरण के जरिए समझाई है। उनका कहना है कि निवेशकों को फंड मैनेजर के पोर्टफोलियो से सिर्फ कुछ शेयर चुनकर कॉपी करने के बजाय यह देखना चाहिए कि क्या उन्हें फंड मैनेजर की इन्वेस्टमेंट फिलोसॉफी, प्रक्रिया और लंबे समय तक उसे लागू करने की क्षमता पर भरोसा है। इसे उन्होंने इसे शेफ और खाने की मिसाल से समझाते हुए कहा, “सामग्री कॉपी मत करो… अगर शेफ पर भरोसा है तो पूरा खाना खाओ!”
एक ही शेयर पर हो सकती है अलग राय
म्यूचुअल फंड की दुनिया में एक ही शेयर को लेकर अलग-अलग फंड हाउस का नजरिया अलग होना कोई असामान्य बात नहीं है। विजय मंत्री इसे समझाते हुए बकहते हैं कि पिछली तिमाही में बजाज फाइनेंस को SBI म्यूचुअल फंड ने खरीदा, जबकि निप्पॉन इंडिया म्यूचुअल फंड और UTI म्यूचुअल फंड की ओर से बिक्री हुई। वहीं, इंफोसिस में निप्पॉन इंडिया की खरीदारी देखने को मिली, जबकि ICICI प्रूडेंशियल और आदित्य बिड़ला सन लाइफ की ओर से बिक्री हुई। इसी तरह मारुति सुजुकी में मिराए एसेट और DSP की खरीदारी के सामने निप्पॉन इंडिया की बिकवाली देखने को मिली।
क्यों सही नहीं यह तरीका?
दरअसल, किसी फंड में जुड़े स्टॉक्स के आधार पर अगर आप निवेश का फैसला करते हैं, तो आपको यह नहीं पता है कि फंड मैनेजर का इसके पीछे क्या इरादा है। किसी म्यूचुअल फंड ने किसी कंपनी में अपनी हिस्सेदारी बढ़ाई, तो इसका मतलब यह नहीं कि आम निवेशक भी उसी समय वही शेयर खरीद ले। इसकी सबसे बड़ी वजह है कि निवेशक को उस ट्रांजैक्शन का पूरा संदर्भ पता नहीं होता। मसलन, फंड ने शेयर किस कीमत पर खरीदा? पोर्टफोलियो में उस शेयर का वजन कितना है? निवेश की अवधि कितनी है? फंड का मैंडेट क्या है? रिस्क लिमिट कितनी है? उसी समय फंड ने और कौन से शेयर खरीदे या बेचे? फंड में पैसे का प्रवाह कैसा रहा? इन सभी सवालों के जवाब आम निवेशक के पास अक्सर नहीं होते। यानी उसे फैसला सिर्फ एक छोटे हिस्से के रूप में दिखाई देता है। पूरी तस्वीर नहीं।
शेयर क्यों खरीदा, यही असली सवाल
विजय मंत्री के मुताबिक सिर्फ यह जानना कि “फंड ने खरीद लिया” पर्याप्त जानकारी नहीं है। असली सवाल होना चाहिए कि उसने क्यों खरीदा, कितने समय के लिए खरीदा और पोर्टफोलियो में उस शेयर की भूमिका क्या है? इसे लेकर ही विजय मंत्री कहते हैं कि अगर किसी शेफ का खाना आपको पसंद आता है, तो सिर्फ उसकी प्लेट में पड़ा एक टुकड़ा उठाकर घर पर वही खाना बनाने की कोशिश नहीं करें। क्योंकि, आपको पता नहीं होता कि उसने किस सामग्री की कितनी मात्रा इस्तेमाल की, किस क्रम में डाली, कितनी देर पकाया और किस वजह से उस सामग्री को चुना। निवेश में भी यही बात लागू होती है।
शेयर नहीं, सोच कॉपी करें
विजय मंत्री की बात का असली मतलब यही है कि अगर आपको किसी फंड मैनेजर पर भरोसा है तो उसके पोर्टफोलियो से दो-चार शेयर चुनकर नकल करने की बजाय उसके पूरे निवेश दृष्टिकोण को समझिए। वह किन कंपनियों को चुनता है? क्यों चुनता है? कब खरीदता है? कब बेचता है? गिरते बाजार में क्या करता है? महंगे वैल्यूएशन पर उसका रवैया क्या रहता है? इन सवालों के जवाब से आपको पता चलेगा कि वह आपके लिए सही फंड मैनेजर है या नहीं।
डिस्क्लेमर: TIMES NOW नवभारत किसी स्टॉक, म्यूचुअल फंड, आईपीओ या कमोडिटी में निवेश की सलाह नहीं देता है। यहां पर केवल जानकारी दी गई है। निवेश से पहले अपने वित्तीय सलाहकार की राय जरूर लें।
