Smallcap and Midcap Vs Largecap : जब भी शेयर मार्केट में गिरावट आती है, तो सबसे पहले Midcap और Smallcap शेयर बिकवाली के निशाने पर आते हैं। क्योंकि, इन्हें अक्सर महंगा, हाई-रिस्क और लो-लिक्विड वाला माना जाता है। लेकिन, पिछले 20 सालों का डेटा रिटर्न की ऐसी कहानी सुनाता है, जो तमाम निवेशकों की धारणा बदल सकता है। इस डेटा से पता चलता है कि जब भी भारतीय मार्केट में Bullrun यानी तेजी का दौर आता है, तो मिडकैप और स्मॉलकैप स्टॉक्स ही निवेशकों की पूंजी को सबसे ज्यादा बढ़ाते हैं। वहीं, लार्जकैप (Largecap) स्टॉक्स ने बुरे समय में सिर्फ नुकसान कम करने का काम किया है।
तेजी में बाजार से आगे भागते हैं ये शेयर
हाल ही में, एडलवाइस एसेट मैनेजमेंट के प्रेसिडेंट निरंजन अवस्थी ने इस ट्रेंड को आंकड़ों के जरिये साबित करते हुए बताया कि अगर आपको भारत की इकॉनमी पर भरोसा है, तो मिडकैप और स्मॉलकैप स्टॉक्स से दूर रहना लंबे समय में आपके रिटर्न को नुकसान पहुंचा सकता है। 2006 से 2025 तक के कैलेंडर ईयर रिटर्न पर नज़र डालने से साफ पता चलता है कि अच्छे मार्केट में मिड-कैप और स्मॉल-कैप स्टॉक्स ने लगातार लार्ज-कैप स्टॉक्स से बेहतर परफॉर्म किया है।
20 साल के कैलेंडर ईयर रिटर्न बताते हैं कि मजबूत बुल मार्केट में मिडकैप और स्मॉलकैप ने हर बार लार्जकैप को पीछे छोड़ा। जब 2008-09 का वैश्विक वित्तीय संकट आया और उसके बाद 2009 में भारतीय बाजार में जबरदस्त रिकवरी आई, तो निफ्टी 100 (लार्जकैप) जहां 84.9% बढ़ा, वहीं, निफ्टी मिडकैप 150 ने 113.9% की छलांग लगाई और निफ्टी स्मॉलकैप 250 में 117.4% का उछाल देखने को मिला। यानी जिसने मिडकैप और स्मॉलकैप में निवेश किया, उसे लार्जकैप की तुलना में कहीं ज्यादा रिटर्न मिला।
हर बुल मार्केट में दोहराई गई कहानी
सिर्फ 2009 ही नहीं, इसके बाद भी लगभग हर मजबूत तेजी वाले साल में यही ट्रेंड देखने को मिला। हर बार तस्वीर एक जैसी रही कि बाजार में तेजी आई तो सबसे ज्यादा रिटर्न मिडकैप और स्मॉलकैप ने दिए।
| साल | Largecap (Nifty 100) | Midcap 150 | Smallcap 250 |
|---|---|---|---|
| 2009 | 84.9% | 113.9% | 117.4% |
| 2014 | 34.9% | 62.7% | 71.7% |
| 2017 | 34.2% | 56.6% | 60.2% |
| 2021 | 26.4% | 48.2% | 63.3% |
| 2023 | 20.7% | 45.3% | 50.2% |
| 2024 | 13.0% | 24.5% | 27.2% |
गिरावट में बदल जाती है कहानी
तेजी के मार्केट में मिड और स्मॉलकैप सबसे ज्यादा रिटर्न देते हैं, इसका मतलब यह नहीं कि मिडकैप और स्मॉलकैप हमेशा बेहतर रहते हैं। क्योंकि, डेटा से यह भी साफ पता चलता है कि जब बाजार में बड़ी गिरावट आती है, तब सबसे ज्यादा नुकसान भी इन्हीं कैटेगरी में होता है।
| साल | Largecap | Midcap | Smallcap |
|---|---|---|---|
| 2008 | -53.1% | -64.9% | -68.6% |
| 2011 | -24.5% | -30.2% | -34.3% |
| 2018 | 2.6% | -12.6% | -26.1% |
आखिर ऐसा क्यों होता है?
तेजी के दौर में निवेशकों का जोखिम लेने का भरोसा बढ़ता है। ऐसे समय में छोटी और मध्यम कंपनियों की कमाई तेजी से बढ़ती है, जिसका असर उनके शेयरों पर भी दिखता है। वहीं, बड़ी कंपनियां पहले से ही स्थापित होती हैं, इसलिए उनमें ग्रोथ की रफ्तार अपेक्षाकृत सीमित रहती है। इसके उलट जब बाजार में डर का माहौल बनता है, तब निवेशक सुरक्षित विकल्प चुनते हैं। ऐसे में लार्जकैप शेयर कम गिरते हैं जबकि मिडकैप और स्मॉलकैप में तेज बिकवाली देखने को मिलती है।
क्या करें निवेशक?
निरंजन अवस्थी का कहना है कि असली सवाल यह नहीं है कि लार्जकैप बेहतर हैं या स्मॉलकैप। सवाल यह है कि आपको भारत की अर्थव्यवस्था पर कितना भरोसा है। अगर आपको लगता है कि अगले कई वर्षों तक भारत दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में रहेगा, तो आपके पोर्टफोलियो में मिडकैप और स्मॉलकैप की अच्छी हिस्सेदारी होनी चाहिए। लेकिन अगर आपको आर्थिक सुस्ती या बाजार में लंबी कमजोरी की आशंका है, तो लार्जकैप बेहतर सुरक्षा दे सकते हैं।
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