Lessons From South Korea stock market crash : हाल ही में साउथ कोरिया के शेयर बाजार (कोस्पी इंडेक्स) में आई भारी गिरावट ने दुनिया भर के निवेशकों का ध्यान अपनी ओर खींचा है। इस साल जून में अपने उच्चतम स्तर (ऑल-टाइम हाई) पर पहुंचने के बाद कोस्पी इंडेक्स सिर्फ 6 हफ्तों के भीतर करीब 40% तक टूट गया। जुलाई के महीने में ही बाजार में चार बार 'सर्किट ब्रेकर' लगाने पड़े, ताकि घबराहट में हो रही बिकवाली पर लगाम लगाई जा सके। साउथ कोरियाई बाजार में आई इस ऐतिहासिक गिरावट की मुख्य वजह लेवरेज (उधार का पैसा), कुछ ही कंपनियों में पोर्टफोलियो का अति-केन्द्रीकरण और FOMO (पिछड़ जाने का डर) से प्रेरित व्यवहारिक गलतियां थीं। भारतीय शेयर बाजार के मौजूदा माहौल को देखते हुए, यह घटनाक्रम भारतीय निवेशकों के लिए कई महत्वपूर्ण सबक पेश करता है।
साउथ कोरियाई शेयर बाजार में भारी गिरावट से क्या सीखना चाहिए?
उधार के पैसे (लेवरेज) का जानलेवा जोखिम
साउथ कोरियाई बाजार में तेजी और उसके बाद हुई तबाही का सबसे बड़ा कारण 'लेवरेज्ड एटीएफ' (Leveraged ETFs) थे। मई के अंत में कोरियाई एसेट मैनेजर्स ने सैमसंग और एसके हाइनिक्स (SK Hynix) जैसी दिग्गज टेक कंपनियों पर आधारित 16 लेवरेज्ड एटीएफ पेश किए। इन फंड्स में खुदरा निवेशकों ने भारी पैसा लगाया। लेवरेज्ड फंड्स शेयर के दाम बढ़ने पर और अधिक खरीदारी करते हैं और गिरने पर जबरन बिकवाली करते हैं। जब जून के अंत में अमेरिकी टेक कंपनियों द्वारा एआई पर अत्यधिक खर्च और निराशाजनक नतीजों के कारण एसके हाइनिक्स का शेयर तीन दिनों में 27% गिर गया, तो इन फंड्स में मार्जिन कॉल ट्रिगर हो गए। इससे बाजार में पैनिक सेलिंग शुरू हो गई।
भारत में हालांकि लेवरेज्ड एटीएफ की अनुमति नहीं है, लेकिन यहां 'मार्जिन ट्रेडिंग फैसिलिटी' (MTF) के जरिए ब्रोकर निवेशकों को शेयर खरीदने के लिए पैसे उधार देते हैं। मिंट की रिपोर्ट के मुताबिक भारत के प्रमुख ब्रोकिंग प्लेटफॉर्म 'जरोधा' के सह-संस्थापक नितिन कामथ ने साउथ कोरियाई संकट पर चिंता जताते हुए कहा कि भारत में तेजी से बढ़ता एमटीएफ बुक ब्रोकर्स और निवेशकों दोनों के लिए बड़ा जोखिम बन सकता है। विशेष रूप से स्मॉल-कैप और मिड-कैप शेयरों में एमटीएफ का उपयोग अधिक होता है। जब बाजार गिरता है, तो बिना लेवरेज वाला निवेशक इंतजार कर सकता है, लेकिन उधार लेकर दांव लगाने वाले निवेशक के पास यह विकल्प नहीं होता; ब्रोकर नुकसान की भरपाई के लिए उनके शेयर खुद-ब-खुद बेच देते हैं।
इंडेक्स में छिपा कॉसेंट्रेशन और फर्जी डायवर्सिफिकेशन
साउथ कोरिया के इस संकट ने पैसिव इन्वेस्टिंग (इंडेक्स फंड) से जुड़े एक बड़े भ्रम को भी तोड़ दिया है। जिन निवेशकों ने जून में एक सामान्य कोरियाई इंडेक्स फंड (Kospi Index Fund) में यह सोचकर पैसा लगाया था कि वे एक विविधतापूर्ण (Diversified) पोर्टफोलियो में निवेश कर रहे हैं, उनका आधा से ज्यादा पैसा केवल दो सेमीकंडक्टर कंपनियों में लगा हुआ था। चूंकि अधिकांश मार्केट-कैप-वेटेड इंडेक्स सबसे बड़ी कंपनियों को अधिक वजन देते हैं, इसलिए जब कोई विशेष सेक्टर बहुत ज्यादा भागता है, तो इंडेक्स का बड़ा हिस्सा उन्हीं कुछ शेयरों पर निर्भर हो जाता है। भारतीय निवेशकों को भी पैसिव फंड्स या एटीएफ में पैसा लगाने से पहले उनके फैक्टशीट और इंडेक्स डिस्क्लोजर को ध्यान से देखना चाहिए। केवल किसी इंडेक्स फंड को खरीद लेने का मतलब यह नहीं होता कि आपका पैसा सुरक्षित और विविध है। यदि इंडेक्स किसी एक या दो सेक्टर या कंपनियों से अत्यधिक प्रभावित है, तो उन कंपनियों या सेक्टर में आने वाली गिरावट पूरे इंडेक्स को डुबो सकती है।
FOMO का डर और केवल घरेलू बाजार पर निर्भरता
साउथ कोरिया के इस क्रैश में व्यवहारिक मनोविज्ञान और 'FOMO' (Fear of Missing Out - यानी दूसरों को कमाते देख पीछे छूट जाने का डर) की भी बड़ी भूमिका रही। सोशल मीडिया पर ऐसे कई कोरियाई निवेशकों के किस्से सामने आए, जिन्होंने घर खरीदने के लिए रखी अपनी जीवन भर की जमापूंजी को सिर्फ इसलिए दो शेयरों और लेवरेज्ड फंड्स में लगा दिया, क्योंकि वे दूसरों को रातों-रात अमीर बनते देख खुद को अलग-थलग महसूस कर रहे थे। बाजार गिरते ही उनकी पूंजी आधी से भी कम रह गई और वे अपने घर की अगली किस्त तक चुकाने में असमर्थ हो गए। इसके अलावा, कोरियाई निवेशकों ने अपने पूरे पोर्टफोलियो को केवल अपने देश के बाजार तक ही सीमित रखा। जब किसी देश की अर्थव्यवस्था या बाजार को झटका लगता है, तो अंतरराष्ट्रीय विविधता ही निवेशकों को बड़े नुकसान से बचाती है। अंतरराष्ट्रीय बाजारों में निवेश केवल ज्यादा रिटर्न के लिए नहीं, बल्कि किसी एक देश के जोखिम से बचने के लिए किया जाता है।
मूल सिद्धांतों पर लौटना ही एकमात्र बचाव
साउथ कोरियाई बाजार का यह तजुर्बा भारतीय निवेशकों के लिए एक चेतावनी की तरह है कि वे निवेश के बुनियादी सिद्धांतों को कभी न भूलें। एसेट एलोकेशन, पोर्टफोलियो री-बैलेंसिंग और वास्तविक विविधीकरण ही अनिश्चित बाजारों में पूंजी की रक्षा कर सकते हैं। समय-समय पर अपने पोर्टफोलियो को री-बैलेंस करते रहना चाहिए ताकि किसी एक सेक्टर या एसेट क्लास में अत्यधिक बढ़त होने पर मुनाफा वसूल कर जोखिम को नियंत्रित किया जा सके। जैसा कि नोबेल पुरस्कार विजेता हैरी मार्कोविट्ज ने कहा था कि निवेश की दुनिया में डायवर्सिफिकेशन ही एकमात्र फ्री लंच है।
