No-cost EMI का सच जान लें, इस तरह चुपके से आपकी जेब में लगती है सेंध

नो-कॉस्ट EMI हमेशा बुरा ऑप्शन नहीं होता है। अगर कोई खास शुरुआती डिस्काउंट नहीं है, प्रोसेसिंग फीस कम है, और पेमेंट को किस्तों में बांटने से कैश फ्लो मैनेज करने में मदद मिलती है, तो यह समझदारी भरा हो सकता है। हमेशा देखें कि अगर आप पूरा पेमेंट एक साथ करते हैं तो कुल कितना खर्च होगा, और EMI के जरिए पेमेंट करने पर आपको असल में कितना पेमेंट करना होगा, जिसमें फीस और छूटे हुए ऑफर्स भी शामिल हैं।

ई-कॉमर्स की दुनिया में No-cost EMI काफी पॉपुलर है। तमाम कंपनियां उपभोक्ताओं को आकर्षित करने के लिए मोबाइल से लेकर टीवी और दूसरी होम अप्लायंसेज पर नो-कॉस्ट ईएमआई ऑफर करती है। सुनने में यह बहुत ही आकर्षक लगता कि बिना ब्याज चुकाए आप अपनी पसंद का सामान खरीद सकते हैं। हालांकि, जैसा यह दिखता है, वैसा होता नहीं है। इसके पीछे बड़ा झोल है जो सीधे आपकी जेब पर सेंध लगाता है। आइए इस नो-कॉस्ट ईएमआई के सच से आपको रूबरू कराते हैं।

No-Cost EMI

समझें नो-कॉस्ट ईएमआई का बड़ा झोल

नो-कॉस्ट ईएमआई कैसे काम करता है?

आपको बता दें कि नो-कॉस्ट ईएमआई के ज्यादातर मामलों में, लोन पर इंटरेस्ट लगता है। फर्क सिर्फ इतना है कि सेलर या प्लेटफ़ॉर्म इसे खुद उठा लेता है और उस रकम को डिस्काउंट के तौर पर दिखाता है। फिर उस डिस्काउंट को बैंक द्वारा EMI पीरियड में लिए गए इंटरेस्ट के साथ एडजस्ट किया जाता है। कागज पर, सब कुछ बराबर हो जाता है। असल जिंदगी में, यह सेटअप अक्सर फाइनल डील को हल्के-फुल्के तरीकों से बदल देता है।

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