Sugar Price : हमारे रसोईघर की मिठास यानी चीनी हाल के दिनों में कुछ महंगी हो गई है। 20 जुलाई 2026 को जो चीनी 48.18 रुपये प्रति किलो मिल रही थी, वह बढ़कर करीब 65 रुपये प्रति किलो पहुंच गई। यानी केवल एक महीने में कीमतों मे जबरदस्त उछाल देखने को मिली थी। हालांकि अगर पिछले दो सालों (2024 से 2026) का रिकॉर्ड देखें, तो कीमतें हर साल सिर्फ 3% ही बढ़ी थीं। इससे साफ है कि यह तेजी कुछ समय के लिए ही है।
चीनी के बढ़ते दामों पर सरकार का स्ट्राइक!
Sugar Price: कीमतें बढ़ने के मुख्य कारण
चीनी के दाम अचानक बढ़ने के पीछे कई कारण एक साथ सामने आए हैं:-
- फसल का नुकसान: अत्यधिक बारिश और जलभराव से खेतों में पानी भर गया। साथ ही रेड रॉट और टॉप बोरर जैसी बीमारियों ने गन्ने की फसल को नुकसान पहुँचाया।
- कम उत्पादन: इस वजह से देश में चीनी का उत्पादन अनुमानित 343 लाख मीट्रिक टन से घटकर लगभग 306 लाख मीट्रिक टन रह गया।
- त्योहारों की मांग: आने वाले त्योहारों की वजह से बाजार में चीनी की मांग अचानक बढ़ गई है।
- दुनियाभर में किल्लत: अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी चीनी की कमी चल रही है। दुनिया भर में लगभग 33 लाख मीट्रिक टन चीनी की कमी का अनुमान है। इस कारण विदेश में भी चीनी के दाम 16% तक बढ़ गए हैं।
- सट्टेबाजी और जमाखोरी: कुछ व्यापारियों और चीनी मिलों ने ज्यादा मुनाफा कमाने के लिए चीनी को छिपाकर रखना शुरू कर दिया।
Sugar Price: कीमतों को रोकने के लिए सरकार के कदम
बाजार में चीनी की कमी न हो और जमाखोरी रुके, इसके लिए सरकार ने तुरंत कई कड़े नियम लागू किए हैं:-
- स्टॉक सीमा लागू: देश के सभी चीनी डीलरों के लिए 400 टन से ज्यादा चीनी रखने पर रोक लगा दी गई है।
- थोक खरीदारों पर नियम: बड़े व्यापारियों और कारखानों को 15 दिन की जरूरत से ज्यादा चीनी रखने की इजाजत नहीं होगी।
- फिजिकल चेकिंग: सरकारी अधिकारी खुद मिलों में जाकर चीनी के असली स्टॉक की जांच कर रहे हैं।
- बाहर से आयात: देश में उपलब्धता बढ़ाने के लिए 10 लाख मीट्रिक टन कच्ची चीनी बिना किसी टैक्स के बाहर से मंगाने का फैसला लिया गया है।
- जल्दी पेराई शुरू: चीनी मिलों से कहा गया है कि वे 15 अक्टूबर से गन्ने की पेराई शुरू कर दें। इससे अक्टूबर में ही 10 लाख मीट्रिक टन से ज्यादा नई चीनी बाजार में आ जाएगी।
हालांकि कम उत्पादन और वैश्विक कारणों से चीनी महंगी हुई है, लेकिन देश में चीनी का पर्याप्त स्टॉक मौजूद है। अक्टूबर से नया पेराई सीजन शुरू होते ही बाजार में नई चीनी आ जाएगी। सरकार के इन सख्त कदमों से जल्द ही कीमतें नियंत्रण में आ जाएंगी और लोगों को राहत मिलेगी।
10 सालों में रिकॉर्ड उत्पादन और एफआरपी में बढ़ोतरी
पिछले 10 सालों में भारत में गन्ने की खेती और इसके उत्पादन में बड़ा उछाल आया है। वर्ष 2015-16 में देश में 348.44 मिलियन मीट्रिक टन गन्ने का उत्पादन हुआ था। कृषि मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2025-26 में यह उत्पादन बढ़कर 500 मिलियन मीट्रिक टन तक पहुँच गया है। यह लगभग 43.5 प्रतिशत की भारी बढ़ोतरी है। गन्ने की खेती का रकबा भी 49.27 लाख हेक्टेयर से बढ़कर 58.87 लाख हेक्टेयर हो गया है। हमारे देश में उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र सबसे ज्यादा गन्ना उगाने वाले राज्य हैं। गन्ना किसानों की मदद के लिए सरकार हर साल इसका 'उचित और लाभकारी मूल्य' यानी एफआरपी (FRP) तय करती है। चीनी सीजन 2026-27 के लिए सरकार ने एफआरपी 365 रुपये प्रति क्विंटल तय किया है। वर्ष 2016-17 में यह मूल्य केवल 230 रुपये प्रति क्विंटल था। इस तरह बीते सालों में किसानों को मिलने वाले दाम में 135 रुपये प्रति क्विंटल की बढ़ोतरी हुई है। इससे किसानों की कमाई बेहतर हुई है।
भारतीय चीनी का निर्यात और बफर स्टॉक
भारत न केवल अपनी जरूरतों के लिए चीनी बनाता है, बल्कि दूसरे देशों को भी भेजता है। वर्ष 2016-17 में भारत ने 0.47 लाख मीट्रिक टन चीनी बेची थी। वहीं वर्ष 2025-26 में यह निर्यात बढ़कर 8 लाख मीट्रिक टन हो गया। भारत मुख्य रूप से श्रीलंका, पश्चिम एशिया और पूर्वी अफ्रीका के देशों को चीनी बेचता है। निर्यात बढ़ने के बावजूद देश के भीतर चीनी का पर्याप्त बफर स्टॉक सुरक्षित रखा गया है।
पेट्रोल में एथेनॉल और किसानों को फायदा
आजकल पेट्रोल में एथेनॉल मिलाया जाता है। एथेनॉल एक प्रकार का ईंधन है जो गन्ने के रस और अनाज से बनता है। इससे भारत की विदेशी तेल पर निर्भरता कम होती है और प्रदूषण भी घटता है। कई लोगों को लगता है कि एथेनॉल बनाने से खाने वाली चीनी कम हो जाएगी, लेकिन ऐसा नहीं है। भारत में हर साल औसतन 300 से 340 लाख मीट्रिक टन चीनी बनती है। देश में सालाना चीनी की खपत लगभग 280 से 290 लाख मीट्रिक टन ही है। एथेनॉल बनाने के लिए चीनी का इस्तेमाल 2022-23 के 12% से घटकर 2025-26 में 9% रह गया है। अब 75% एथेनॉल मक्के और अन्य अनाजों से बनाया जा रहा है।
जब देश में बहुत ज्यादा चीनी बन जाती थी, तो मिलों के पास माल पड़ा रहता था। इससे मिलें किसानों को गन्ने का पैसा समय पर नहीं दे पाती थीं। अब अतिरिक्त गन्ने से एथेनॉल बनने लगा है। इससे मिलों की कमाई सुधरी है और किसानों को बकाया पैसा तुरंत मिल रहा है। अगस्त 2026 तक 97% गन्ना किसानों को उनका पैसा दिया जा चुका है।
