भारत पेट्रोल-डीजल पर निर्भरता कम करने के लिए इलेक्ट्रिक व्हीकल के बाद अब ग्रीन हाइड्रोजन को भविष्य के अहम ईंधन विकल्प के तौर पर देख रहा है। सरकार ने 2023 में नेशनल ग्रीन हाइड्रोजन मिशन (NGHM) शुरू किया था। इस मिलशन का लक्ष्य, भारत को ग्रीन हाइड्रोजन के उत्पादन, इस्तेमाल और एक्सपोर्ट का ग्लोबल हब बनाना है। ग्रीन हाइड्रोजन मिशन के तहत 2030 तक हर साल कम से कम 50 लाख टन (5 MMT) ग्रीन हाइड्रोजन उत्पादन क्षमता तैयार करने का लक्ष्य है। इस दिशा में सफलता मिली है। हाल ही पीएम नरेंद्र मोदी ने ग्रीन हाइड्रोजन से चलने वाली ट्रेन को हरी झंडी दिखाकर रवाना किया था। ग्रीन हाइड्रोजन से चलने वाली कार का इस्तेमाल केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी करते हैं।
लेकिन इलेक्ट्रिक मोबिलिटी के मुकाबले ग्रीन हाइड्रोजन की राह अलग और ज्यादा चुनौतीपूर्ण है। जहां EV के लिए चार्जिंग इंफ्रास्ट्रक्चर और बैटरी की लागत बड़ी चुनौती है, वहीं ग्रीन हाइड्रोजन के सामने ऊंची उत्पादन लागत, कम मांग, स्टोरेज-ट्रांसपोर्ट इंफ्रास्ट्रक्चर और पक्के खरीदारों की कमी सबसे बड़ी बाधाएं हैं।
ग्रीन हाइड्रोजन क्या है?
ग्रीन हाइड्रोजन ऐसा हाइड्रोजन है, जिसे रिन्यूएबल एनर्जी से पैदा हुई बिजली की मदद से पानी को इलेक्ट्रोलिसिस के जरिए हाइड्रोजन और ऑक्सीजन में अलग करके बनाया जाता है। अगर इस्तेमाल होने वाली बिजली नवीकरणीय स्रोतों से आती है, तो इससे जीवाश्म ईंधन आधारित हाइड्रोजन की तुलना में कार्बन उत्सर्जन काफी कम किया जा सकता है। यही वजह है कि इसे उन सेक्टरों के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है, जहां सीधे बिजली या बैटरी से डीकार्बोनाइजेशन मुश्किल है।
₹19,744 करोड़ का मिशन शुरू
भारत ने जनवरी 2023 में नेशनल ग्रीन हाइड्रोजन मिशन शुरू किया था। इसमें SIGHT कार्यक्रम के लिए ₹17,490 करोड़, पायलट प्रोजेक्ट के लिए ₹1,466 करोड़, R&D के लिए ₹400 करोड़ और अन्य मिशन गतिविधियों के लिए ₹388 करोड़ रखे गए हैं। सितंबर 2026 में सरकार की ओर से दी गई जानकारी के अनुसार, SIGHT के तहत 8.62 लाख टन प्रति वर्ष ग्रीन हाइड्रोजन उत्पादन क्षमता और 3,000 MW प्रति वर्ष इलेक्ट्रोलाइजर मैन्युफैक्चरिंग क्षमता के लिए इंसेंटिव दिए जा चुके हैं।
भारत का लक्ष्य सिर्फ घरेलू बाजार नहीं
भारत ग्रीन हाइड्रोजन को केवल घरेलू ईंधन के तौर पर नहीं देख रहा। मिशन का एक बड़ा लक्ष्य एक्सपोर्ट मार्केट भी है। MNRE के अनुसार, 2030 तक वैश्विक स्तर पर ग्रीन हाइड्रोजन और उसके डेरिवेटिव की मांग 100 MMT से अधिक हो सकती है और भारत लगभग 10% वैश्विक बाजार हासिल करने की क्षमता देखता है। सरकार के मुताबिक मिशन के लक्ष्यों से 2030 तक करीब ₹8 लाख करोड़ से अधिक निवेश, 6 लाख से ज्यादा रोजगार और करीब 50 MMT सालाना CO₂ उत्सर्जन में कमी की संभावना है।
EV के बाद क्या हाइड्रोजन बनेगा विकल्प?
भारत में EV का विस्तार मुख्य रूप से पैसेंजर व्हीकल, दोपहिया, तीनपहिया और शहरी मोबिलिटी में दिखाई दे रहा है। ग्रीन हाइड्रोजन का रास्ता अलग है। EV जहां “बिजली को सीधे वाहन में इस्तेमाल” करता है, वहीं ग्रीन हाइड्रोजन रिन्यूएबल बिजली को एक ऐसे ईंधन में बदलने की कोशिश है जिसे ट्रांसपोर्ट और अलग-अलग औद्योगिक क्षेत्रों में इस्तेमाल किया जा सके।
कहां ग्रीन हाइड्रोजन ज्यादा उपयोगी होगा?
जानकारों का कहना है कि रिफाइनरी, फर्टिलाइजर, स्टील, शिपिंग और लंबी दूरी के परिवहन जैसे क्षेत्रों में ग्रीन हाइड्रोजन ज्यादा उपयोगी हो सकता है। सरकार के मिशन में ग्रीन अमोनिया और ग्रीन मेथनॉल जैसे हाइड्रोजन डेरिवेटिव को भी शामिल किया गया है।
पेट्रोल-डीजल के बाद हाइड्रोजन क्यों?
भारत की ऊर्जा जरूरतों में तेल की बड़ी भूमिका है और पेट्रोल-डीजल से निकलने वाले कार्बन उत्सर्जन को कम करना बड़ा लक्ष्य है। इलेक्ट्रिक वाहन खासकर कार और दोपहिया जैसे सेगमेंट में एक विकल्प बन रहे हैं। लेकिन हर तरह के परिवहन को बैटरी से चलाना आसान नहीं है। भारी ट्रक, लंबी दूरी का परिवहन, शिपिंग और कुछ औद्योगिक प्रक्रियाओं में ज्यादा ऊर्जा घनत्व और तेज रिफ्यूलिंग की जरूरत होती है। ऐसे क्षेत्रों में हाइड्रोजन या उससे बने ईंधन भविष्य में उपयोगी हो सकते हैं।
इसलिए ग्रीन हाइड्रोजन को EV का सीधा प्रतिस्पर्धी नहीं, बल्कि EV के साथ चलने वाला अगला ऊर्जा विकल्प समझना ज्यादा सही होगा।
ग्रीन हाइड्रोजन की राह में चुनौती भी
ग्रीन हाइड्रोजन की राह में अभी सबसे बड़ी चुनौती मांग है। यह जरूर है कि केंद्रीय सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी ग्रीन हाइड्रोजन से चलने वाली टोयोटा मिराई (Toyota Mirai) कार का इस्तेमाल करते हैं। लेकिन यह देशभर में गिनती के हैं। कीमत अधिक होने और हाइड्रोजन की आसान उपलब्धता नहीं होने से इसका बड़े पैमाने पर प्रोडक्शन नहीं हो रहा है। हालांकि, गडकरी कई बार बोल चुके हैं कि वो हाइड्रोजन का कॉस्ट कम कर इसे बड़ी आबादी के लिए उपब्ध कराएंगे। हाल ही में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हरियाणा के जींद रेलवे स्टेशन से पहली हाइड्रोजन ट्रेन को हरी झंडी दिखाकर रवाना किया था।
हालांकि, ये सारे कदम अभी शुरुआती दौर में इंडस्ट्री का तर्क है कि केवल उत्पादन क्षमता तैयार करने से बाजार नहीं बनेगा। कंपनियां तभी बड़े पैमाने पर निवेश करेंगी, जब उन्हें यह भरोसा हो कि तैयार होने वाला हाइड्रोजन खरीदने वाले ग्राहक मौजूद हैं। इसके लिए बड़े कदम उठाने होंगे।
भारत की नई ऊर्जा रणनीति
दूसरी बड़ी चुनौती इसकी लागत है
ग्रीन हाइड्रोजन की कीमत अभी पेट्रोल, डीजल और सीएनजी के मुकाबले काफी अधिक है। एक रिपोर्ट के मुताबिक, अभी उत्पादन लागत लगभग ₹500 से ₹600 प्रति किलोग्राम है जो दूसरे ईंधन के मुकाबले काफी अधिक है। रिलायंस की ओर से भी यह कहा गया है कि ग्रीन हाइड्रोजन को व्यापक स्तर पर व्यावहारिक बनाने के लिए इसकी कीमत करीब $1 प्रति किलोग्राम से नीचे लाना महत्वपूर्ण होगा। अगर उत्पादन लागत तेजी से घटती है, सरकार मांग पैदा करने के लिए स्पष्ट नियम बनाती है और स्टोरेज-ट्रांसपोर्ट इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार होता है, तो ग्रीन हाइड्रोजन भारत की ऊर्जा अर्थव्यवस्था में बड़ा बदलाव ला सकता है।
