IBC Amendment Bill 2025: देश के Insolvency and Bankruptcy Code (IBC) में अगले शीत सत्र में बड़े बदलाव देखने को मिल सकते हैं। सेंट्रल गवर्नमेंट इस शीतकालीन सत्र के दौरान ये कदम बढ़ा सकती है। साल 2016 में लागू होने के बाद से आईबीसी में कई अहम सुधार किए गए हैं। हालांकि, इस बार का प्रस्तावित IBC Amendment Bill 2025 अब तक का सबसे बड़ा संशोधन के तौर पर माना जा रहा है। इंडस्ट्री और कानून विशेषज्ञों का मानना है कि इस बार का सुधार 'ईज ऑफ डूइंग बिज़नेस' के असली मकसद को धरातल पर उतार सकता है। खासतौर पर वह प्रावधान जो किसी कंपनी के प्रमोटर या उसके ब्लड रिलेशन को सेक्शन 29A दिवालिया प्रक्रिया (Insolvency Process) में भाग लेने से रोकता है।
आईसीएआई ने संसदीय समिति के सामने सुझाव प्रस्तुत किए (फोटो-Istock)
आईसीएआई ने संसदीय समिति के सामने सुझाव प्रस्तुत किए
पीटीआई/ भाषा के हवाले से चार्टर्ड अकाउंटेंट्स की शीर्ष संस्था आईसीएआई ने गुरुवार को दिवालियापन कानून में प्रस्तावित संशोधनों पर संसदीय समिति के समक्ष अपने सुझाव प्रस्तुत किए। भाजपा सदस्य बैजयंत पांडा की अध्यक्षता वाली प्रवर समिति, दिवाला और शोधन अक्षमता संहिता (संशोधन) विधेयक, 2025 पर विचार कर रही है, जिसे 12 अगस्त को लोकसभा में पेश किया गया था। एक सूत्र ने बताया कि भारतीय चार्टर्ड अकाउंटेंट्स संस्थान (आईसीएआई) ने दिवाला और शोधन अक्षमता संहिता (आईबीसी) के तहत प्रक्रियाओं को और बेहतर बनाने के उद्देश्य से संशोधनों पर प्रवर समिति के समक्ष अपने सुझाव प्रस्तुत किए।
सेक्शन 29A के प्रावधान
इनसॉल्वेंसी और बैंकरप्सी कोड (IBC) का सेक्शन 29A एक अहम प्रावधान माना जा रहा है, जो तय करता है कि कौन व्यक्ति या संस्था दिवालिया कंपनी की Resolution Process (पुनर्गठन प्रक्रिया) में भाग ले सकती है और कौन नहीं? इस सेक्शन के तहत कंपनी के प्रमोटर और उसके ब्लड रिलेटिव को उस कंपनी की बोली (Bidding) प्रक्रिया में भाग लेने से रोक दिया गया है।
जी न्यूज के हवाले से सरकार का उद्देश्य था कि किसी दिवालिया कंपनी के प्रमोटर या उससे जुड़े लोग फिर से उसी कंपनी पर नियंत्रण न पा लें, लेकिन इंडस्ट्री का कहना है कि यह प्रावधान 'एक्सट्रीमली ब्रॉड (Extremely Broad) है। यानी इसमें ऐसे लोग भी फंस जाते हैं, जिनका कंपनी से कोई सीधा बिजनेस संबंध नहीं होता, सिर्फ पारिवारिक रिश्ता होता है।
सेक्शन 29A में हो सुधार की आवश्यकता
मीडिया रिपोर्ट्स के हवाले से कई इंडस्ट्री बॉडीज और कॉरपोरेट लॉ विशेषज्ञों का मानना है कि इस सेक्शन में अब बदलाव का समय आ गया है। इंडस्ट्री चाहती है कि अगर किसी रिश्तेदार का कंपनी से कोई वित्तीय या प्रबंधकीय संबंध नहीं है, तो उसे केवल 'ब्लड रिलेशन' की वजह से IBC प्रक्रिया से बाहर न रखा जाए।
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, मदान लॉ ऑफिस के मैनेजिंग पार्टनर जीपी मदान का कहना है कि IBC में रिलेटेड पार्टी की परिभाषा बहुत बड़ी है। अगर कोई व्यक्ति केवल पारिवारिक रूप से जुड़ा है, न कि व्यवसायिक रूप से तो उसे बोली प्रक्रिया से बाहर करना उचित नहीं। फंडिंग और वित्तीय स्रोत की जांच करके निर्णय लेना ज़्यादा न्यायसंगत तरीका होगा
