भारत में काम करने वाले कर्मचारियों के लिए 'छुट्टी' सिर्फ काम से ब्रेक नहीं है, बल्कि यह एक कानूनी अधिकार है। अब नए लेबर कोड्स (Labour Codes) आने के बाद, छुट्टियों को जमा करने और उनके बदले पैसे लेने (Leave Encashment) के नियम बदल रहे हैं। आपको बता दें कि फिलहाल दो तरह के नियम चल रहे हैं: पुराने राज्य के नियम और नए केंद्रीय लेबर कोड। नए कोड के तहत, हर 20 दिन काम करने पर 1 दिन की 'अर्जित छुट्टी' मिलेगी। हालांकि, छुट्टियों को आगे ले जाने की एक सीमा होगी ताकि वे असीमित रूप से जमा न हों।
नए लेबर कोड्स
भारतीय कानूनों में तीन तरह की छुट्टियां हैं:
- अर्जित अवकाश: यह आपके काम किए गए दिनों के आधार पर जुड़ती है। इसका आर्थिक महत्व है क्योंकि इसे कैश कराया जा सकता है।
- बीमारी और Casual Leave: ये अचानक जरूरत या बीमारी के लिए होती हैं। ये साल के अंत में खत्म हो जाती हैं और इनके बदले पैसे नहीं मिलते।
- राष्ट्रीय और त्योहारों की छुट्टियां: ये सरकार द्वारा तय की गई फिक्स्ड छुट्टियां होती हैं।
पहले क्या नियम थे?
कर्मचारियों के नौकरी छोड़ने पर लीव एनकैशमेंट (छुट्टियों के बदले पैसे लेने) का प्रावधान पहले के फ्रेमवर्क में भी मौजूद था, लेकिन 'अर्न्ड लीव्स' (कमाई गई छुट्टियों) से जुड़े नियम पूरे भारत में काफी अलग-अलग हैं। पिछले फ्रेमवर्क के तहत, जब लेबर कोड लागू नहीं हुए थे, तब छुट्टियों से जुड़ी नीतियां राज्यों के खास कानूनों, जैसे कि 'शॉप्स एंड एस्टैब्लिशमेंट्स एक्ट' और 'फैक्ट्रीज़ एक्ट, 1948' से चलती थीं।
नए लेबर कोड में क्या बदला है?
पहले ज्यादातर कंपनियों में नौकरी छोड़ते समय ही छुट्टियों के पैसे मिलते थे। अब नए नियमों के अनुसार, अगर आपकी छुट्टियां 30 दिन से ज्यादा हो जाती हैं, तो आप साल के अंत में उन अतिरिक्त छुट्टियों के बदले पैसे मांग सकते हैं। इसके अलावा इस्तीफा, रिटायरमेंट या छंटनी होने पर बची हुई सभी 'अर्जित छुट्टियों' का पैसा मिलना अनिवार्य है। अब छुट्टियों के पैसों की गणना नए लेबर कोड में दी गई 'मजदूरी' (Wage) की परिभाषा के आधार पर होगी, जो पुरानी व्यवस्था से थोड़ी अलग हो सकती है।
ककर्मचारियों और कंपनियों के लिए क्या है खास?
कर्मचारियों के लिए: अब छुट्टियां सिर्फ 'आराम' का जरिया नहीं बल्कि 'आर्थिक सुरक्षा' का हिस्सा हैं। आपको अपनी भूमिका और राज्य के नियमों के हिसाब से अपने अधिकारों को समझना चाहिए। वहीं, कंपनियों को अब अपनी पुरानी नीतियों को केंद्र और राज्य के नए कानूनों के साथ मिलाना होगा ताकि कोई कानूनी विवाद न हो।
नए लेबर कानून की प्रमुख बातें
- 30 दिन से ज्यादा छुट्टी होने पर साल के अंत में पैसा लेने का हक।
- हर 20 दिन के काम पर 1 दिन की छुट्टी।
- बीमार और कैजुअल लीव को कैश नहीं कराया जा सकता।
- नौकरी छोड़ने पर बची हुई 'अर्जित छुट्टियों' का पूरा हिसाब जरूरी।
अगर मैनेजमेंट छुट्टी देने से मना कर दे तो क्या होगा?
विशेषज्ञों के अनुसार, कर्मचारियों के हक में एक अहम नियम यह है कि अगर कोई कर्मचारी छुट्टी के लिए अर्जी देता है और मालिक उसे नामंजूर कर देता है, तो ऐसी छुट्टी को बिना किसी ऊपरी सीमा के आगे बढ़ाया जा सकता है। यह नियम मालिकों को कर्मचारियों की छुट्टी की अर्जियों को मनमाने ढंग से नामंजूर करने से रोकता है। अभी, राज्यों के अपने-अपने कानूनों के तहत, कर्मचारी अपनी नौकरी खत्म होने पर ही छुट्टियों को कैश करवा सकते हैं। हालांकि, तेलंगाना जैसे कुछ राज्यों में, 'नॉन-एग्ज़ेम्प्ट' (non-exempt) कर्मचारियों को अपनी नौकरी के दौरान ही अर्जित छुट्टियों को कैश करवाने का हक होता है।
