EPS Pnsion : कर्मचारी पेंशन योजना (EPS-1995) के तहत अधिक पेंशन पाने का इंतजार कर रहे लाखों सेवानिवृत्त कर्मचारियों और पेंशनभोगियों के लिए राहत की नई उम्मीद जगी है। भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के राज्यसभा सांसद अजीत माधवराव गोपछड़े ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिखकर ईपीएस की उच्च पेंशन प्रक्रिया में आ रही प्रशासनिक और कानूनी बाधाओं को दूर करने की मांग की है। हालांकि सरकार का दावा रहा है कि सुप्रीम कोर्ट के फैसले को लागू कर दिया गया है, लेकिन हकीकत यह है कि हजारों पेंशनभोगी अब भी ईपीएफओ (EPFO) के चक्कर काटने को मजबूर हैं।
पेंशनभोगियों के लिए राहत की आहट
क्या है ईपीएस अंशदान का पूरा मामला और सुप्रीम कोर्ट का फैसला?
कर्मचारी भविष्य निधि (EPF) के सामान्य नियमों के अनुसार, नियोक्ता (कंपनी) कर्मचारी के मूल वेतन और महंगाई भत्ते (DA) का 8.33 प्रतिशत हिस्सा ईपीएस पेंशन फंड में जमा करता है। अब तक पेंशन की गणना के लिए अधिकतम वेतन सीमा 15,000 रुपये तय थी, जिससे पेंशन फंड में अधिकतम योगदान 1,250 रुपये ही हो पाता था। अगर इस सीमा को बढ़ाकर 25,000 रुपये किया जाता है, तो यह योगदान करीब 2,083 रुपये प्रति माह होगा। सुप्रीम कोर्ट ने 4 नवंबर 2022 को एक ऐतिहासिक निर्णय दिया था, जिसमें पात्र कर्मचारियों को अपनी वास्तविक (बिना सीमा वाली) सैलरी पर अंशदान देकर उच्च पेंशन पाने का अधिकार दिया गया था। इस फैसले के सालों बाद भी प्रशासनिक पेचीदगियों के कारण बेहद कम पेंशनभोगियों को वास्तव में बढ़ी हुई पेंशन का लाभ मिल पाया है।
पैरा 26(6) की शर्त और ईपीएफओ का दोहरा रवैया
मिंट की रिपोर्ट के मुताबिक बीजेपी सांसद ने अपने पत्र में उन 5 मुख्य कारणों को रेखांकित किया है, जिनके कारण उच्च पेंशन का लाभ अटक रहा है। सबसे बड़ी वजह श्रम मंत्रालय का मई 2023 का एक ज्ञापन है, जिसमें ईपीएफ योजना के पैरा 26(6) का हवाला दिया गया है। श्रम मंत्रालय ने खुद स्वीकार किया था कि पैरा 26(6) के तहत कर्मचारियों और नियोक्ताओं को उच्च वेतन पर योगदान का विकल्प देना होता है और ईपीएफओ को इसकी अनुमति देनी होती है। हालांकि, ईपीएफओ ने कभी इसका कोई औपचारिक फॉर्मेट जारी ही नहीं किया और न ही अपने क्षेत्रीय कार्यालयों से इसकी अनुमति दी, जबकि कर्मचारी और नियोक्ता लगातार वास्तविक सैलरी पर ही योगदान जमा करते रहे। अब इसी तकनीकी आधार पर आवेदनों को खारिज या अटकाया जा रहा है।
संसद में मिला आश्वासन और कोर्ट कचहरी का बढ़ता झंझट
सांसद गोपछड़े ने ध्यान दिलाया कि 6 अगस्त 2026 को उनके द्वारा राज्यसभा में पूछे गए एक सवाल के जवाब में सरकार ने कहा था कि सुप्रीम कोर्ट का फैसला छूट प्राप्त और गैर-छूट प्राप्त दोनों प्रकार के ट्रस्टों पर समान रूप से लागू किया गया है। इसे संसदीय आश्वासन संख्या 271/72 के रूप में दर्ज किया गया था, लेकिन धरातल पर यह वादा अब तक अधूरा और लंबित पड़ा हुआ है। प्रशासनिक ढील का नतीजा यह है कि पेंशनभोगी अलग-अलग राज्यों के उच्च न्यायालयों का रुख करने को मजबूर हैं। मुकदमों की बढ़ती संख्या यह साबित करती है कि ईपीएफओ के नियमों में स्पष्टता की कमी है, जिससे सरकारी दावों के उलट पेंशनभोगियों को इंसाफ नहीं मिल पा रहा है।
पीएमओ के समक्ष रखी गई प्रमुख मांगें
ईपीएस उच्च पेंशन की प्रक्रिया को पारदर्शी, निष्पक्ष और सुगम बनाने के लिए सांसद गोपछड़े ने प्रधानमंत्री कार्यालय (PMO) से हस्तक्षेप की अपील करते हुए छह ठोस मांगें रखी हैं:-
- पैरा 26(6) की बाधा हटाएं:- ईपीएफ योजना के पैरा 26(6) से जुड़ी सभी प्रशासनिक और तकनीकी शर्तों को तुरंत खत्म किया जाए।
- समान व्यवहार लागू हो:- छूट प्राप्त और गैर-छूट प्राप्त दोनों प्रकार के संस्थानों के आवेदकों के साथ एक समान नीति अपनाई जाए।
- मुकदमों से राहत दें:- एक ऐसी संस्थागत प्रणाली बनाई जाए, जो सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट के फैसलों को समान मामलों वाले सभी आवेदकों पर खुद ब खुद लागू करे, ताकि बुजुर्गों को अदालतों के चक्कर न लगाने पड़ें।
- वित्तीय समीक्षा की जाए:- ईपीएस-1995 के योगदान ढांचे का विस्तृत एक्ट्यूआरियल और वित्तीय मूल्यांकन कराया जाए।
- समयबद्ध निपटारा हो:- लंबित पड़े सभी उच्च पेंशन आवेदनों को निपटाने के लिए एक निश्चित समय-सीमा तय की जाए।
- संसदीय आश्वासन पूरा हो:- राज्यसभा में दिए गए संसदीय आश्वासन संख्या 271/72 को पूरी पारदर्शिता के साथ समय पर पूरा किया जाए।
पीएसयू के पेंशनभोगियों में असमानता और वित्तीय स्थिरता की समीक्षा
पत्र में एक ही कंपनी के अलग-अलग ट्रस्टों में हो रहे भेदभाव का मुद्दा भी उठाया गया है। भेल (BHEL) और सेल (SAIL) जैसी सार्वजनिक क्षेत्र की प्रमुख कंपनियों के कुछ ट्रस्ट अपने सेवानिवृत्त कर्मचारियों को उच्च पेंशन का भुगतान कर रहे हैं, जबकि उन्हीं कंपनियों के अन्य पीएसयू ट्रस्ट अपने सेवानिवृत्त कर्मियों को समान लाभ देने से साफ मना कर रहे हैं। इससे सेवानिवृत्त कर्मचारियों में भारी निराशा और असंतोष है। इसके साथ ही सांसद ने ईपीएस-1995 के पूरे वित्तीय और actuarial ढांचे की नए सिरे से गहन समीक्षा करने का सुझाव दिया है, ताकि पेंशन फंड की दीर्घकालिक वित्तीय स्थिरता भी बनी रहे और पेंशनभोगियों के जायज हक से कोई समझौता न हो।
