जब कोई व्यक्ति बैंक या वित्तीय संस्थान से लोन लेता है, तो उसे तय समय पर EMI चुकानी होती है। अगर किसी महीने किस्त नहीं भरी जाती, तो लोन खाते में बकाया दर्ज हो सकता है। लगातार भुगतान नहीं करने पर इसका असर क्रेडिट स्कोर और भविष्य में लोन लेने की क्षमता पर पड़ सकता है। लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि हर बार EMI नहीं चुका पाने वाला व्यक्ति विलफुल डिफॉल्टर बन जाता है। Loan Default और Wilful Default के बीच सबसे बड़ा अंतर भुगतान न करने की वजह और उधार लेने वाले की मंशा का होता है।
Loan Default क्या होता है?
जब कोई व्यक्ति आर्थिक परेशानी के कारण लोन की EMI नहीं चुका पाता, तो इसे सामान्य तौर पर Loan Default कहा जाता है। इसकी वजह नौकरी छूटना, कारोबार में नुकसान, बीमारी, अचानक आया बड़ा खर्च या आमदनी कम होना हो सकती है। ऐसे मामलों में व्यक्ति के पास लोन चुकाने की इच्छा होती है, लेकिन आर्थिक स्थिति कमजोर होने के कारण वह भुगतान नहीं कर पाता। हालांकि, EMI में देरी होने पर बैंक पेनल्टी लगा सकता है और इसकी जानकारी क्रेडिट ब्यूरो को भी दी जा सकती है। इससे क्रेडिट स्कोर खराब हो सकता है।
Wilful Default क्या होता है?
Wilful Default यानी जानबूझकर लोन नहीं चुकाना। यह सामान्य डिफॉल्ट से ज्यादा गंभीर स्थिति है। RBI के नियमों के मुताबिक, अगर कर्ज लेने वाला व्यक्ति भुगतान करने की क्षमता होने के बावजूद जानबूझकर पैसा नहीं चुकाता, तो उसे विलफुल डिफॉल्टर घोषित किया जा सकता है। इसके अलावा, लोन की रकम को तय उद्देश्य के बजाय दूसरे काम में लगाना, पैसों को गलत तरीके से दूसरी जगह भेजना या बैंक की अनुमति के बिना गिरवी रखी संपत्ति बेच देना भी इसके दायरे में आ सकता है।
दोनों के बीच पांच बड़े अंतर
पहला अंतर भुगतान न करने की वजह है। सामान्य डिफॉल्ट में आर्थिक मजबूरी हो सकती है, जबकि विलफुल डिफॉल्ट में जानबूझकर भुगतान नहीं किया जाता। दूसरा अंतर भुगतान की क्षमता का है। तीसरा अंतर लोन के इस्तेमाल का है। चौथा अंतर बैंक की कार्रवाई का है। सामान्य डिफॉल्ट में बैंक रिकवरी प्रक्रिया शुरू कर सकता है, जबकि विलफुल डिफॉल्ट में अतिरिक्त सख्त नियम लागू हो सकते हैं। पांचवां अंतर भविष्य में लोन मिलने की संभावना का है। सामान्य डिफॉल्ट भी क्रेडिट रिकॉर्ड को नुकसान पहुंचाता है, लेकिन विलफुल डिफॉल्टर पर संस्थागत वित्त पाने से जुड़ी ज्यादा सख्त पाबंदियां लग सकती हैं।
Wilful Defaulter बनने पर क्या होगा असर?
RBI के 2025 के निर्देशों के अनुसार, 25 लाख रुपये या उससे अधिक के बकाया वाले विलफुल डिफॉल्टर की जानकारी क्रेडिट इन्फॉर्मेशन कंपनियों को दी जाती है। ऐसे लोगों को बैंक और वित्तीय संस्थान अतिरिक्त लोन देने से रोक सकते हैं। कुछ मामलों में नाम सूची से हटने के बाद भी नए कारोबार के लिए पांच साल तक फंडिंग पर रोक लग सकती है। इसलिए अगर आप आर्थिक परेशानी में हैं, तो बैंक से संपर्क करके रीपेमेंट या लोन रिस्ट्रक्चरिंग के विकल्पों पर बात करें।
