देशभर के करोड़ों किसानों के लिए अच्छी खबर है। आने वाले समय में खाद खरीदने के लिए किसानों के खाते में सीधे पैसा आ सकता है। दरअसल, इकोनॉमिक सर्वे में यह सुझाव दिया गया है। इकोनॉमिक सर्वे में कहा गया है कि यूरिया की खुदरा कीमत में ‘मामूली बढ़ोतरी’ हुई है जो मार्च 2018 से 242 रुपये प्रति 45 किलो बैग पर स्थिर है। साथ ही किसानों को प्रति एकड़ के हिसाब से उतनी ही रकम सीधे ट्रांसफर करने का सुझाव दिया गया है। गुरुवार को संसद में पेश किए गए सर्वे में कहा गया है कि इनपुट सब्सिडी से इनकम सपोर्ट की ओर इस प्रस्तावित बदलाव का मकसद खाद के इस्तेमाल में तीन दशक पुराने असंतुलन को ठीक करना है, जिससे मिट्टी की क्वालिटी खराब हो रही है और फसल की पैदावार कम हो रही है।
उर्वरक सब्सिडी
यूरिया जरूरत से ज्यादा इस्तेमाल कर रहे
आर्थिक समीक्षा में बताया गया है कि भारतीय किसान जरूरत से ज्यादा यूरिया (नाइट्रोजन) का इस्तेमाल कर रहे हैं। साल 2009-10 में जहां उर्वरकों का एनपीके अनुपात 4:3.2:1 था, वहीं 2023-24 में यह बिगड़कर 10.9:4.1:1 हो गया है। इसकी सबसे बड़ी वजह है सब्सिडी वाला सस्ता यूरिया, जिससे नाइट्रोजन का अत्यधिक उपयोग हो रहा है। जबकि कृषि वैज्ञानिकों के मुताबिक, ज्यादातर फसलों और मिट्टी के लिए 4:2:1 का संतुलित अनुपात सबसे बेहतर माना जाता है।
मिट्टी की सेहत और पैदावार दोनों पर असर
आर्थिक समीक्षा चेतावनी देती है कि ज्यादा नाइट्रोजन से मिट्टी की सेहत खराब होती है, जैविक तत्व कम होते हैं, सूक्ष्म पोषक तत्वों की कमी बढ़ती है और भूजल में नाइट्रेट का रिसाव बढ़ जाता है। कई इलाकों में अब ज्यादा खाद डालने के बाद भी पैदावार नहीं बढ़ रही, यानी समस्या खाद की कमी नहीं बल्कि गलत संतुलन है।
डायरेक्ट कैश ट्रांसफर का सुझाव
समीक्षा का कहना है कि उर्वरक नीति को सरकार द्वारा तय कीमतों की बजाय मिट्टी और फसल की असली जरूरत के आधार पर बदला जाना चाहिए। इसके लिए सुझाव दिया गया है कि किसानों को खाद के लिए सीधा पैसा (डायरेक्ट कैश ट्रांसफर) दिया जाए, ताकि वे जरूरत के हिसाब से सही पोषक तत्व चुन सकें।
सरकार के पास आधार से जुड़ी खाद बिक्री, रियल-टाइम निगरानी सिस्टम और पीएम-किसान जैसे डिजिटल प्लेटफॉर्म मौजूद हैं, जिससे इस सुधार को लागू करना संभव है। पहले इसे अलग-अलग कृषि क्षेत्रों में प्रयोग के तौर पर लागू करने और फिर पूरे देश में विस्तार का सुझाव दिया गया है।
