डॉनल्ड ट्रंप की टैरिफ नीतियों के खौफ और वैश्विक बाजार में सप्लाई की किल्लत के चलते कॉपर (तांबा) की कीमतों ने लंदन मेटल एक्सचेंज यानी LME पर नया इतिहास रच दिया है। कई हफ्तों से जारी लगातार तेजी के बाद कॉपर के दाम अब तक के सबसे ऊंचे स्तर पर पहुंच गए हैं, जिसने पिछले सभी रिकॉर्ड तोड़ दिए हैं। LME पर तीन महीने वाले बेंचमार्क कॉपर फ्यूचर्स 0।8 प्रतिशत की छलांग लगाकर 14,533 डॉलर प्रति टन के रिकॉर्ड स्तर पर जा पहुंचे हैं। इस बेजोड़ तेजी के पीछे सबसे बड़ा कारण अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा रिफाइंड मेटल के आयात पर भारी टैरिफ बढ़ाए जाने की गहरी आशंका है, जिसके चलते ग्लोबल ट्रेड और कमोडिटी मार्केट में जबरदस्त हलचल मची हुई है।
रिकॉर्ड तोड़ ऊंचाई पर पहुंचा कॉपर, बाजार में हलचल
क्यों आया कॉपर में उछाल?
विश्लेषकों के मुताबिक, इस साल भारी मात्रा में कॉपर अमेरिका भेजा गया है ताकि ट्रेडर्स वहां की ऊंची कीमतों का फायदा उठा सकें। डिपार्टमेंट ऑफ कॉमर्स को व्हाइट हाउस को यह रिपोर्ट सौंपनी थी कि अमेरिकी बाजार में प्राइमरी कॉपर के आयात पर टैरिफ लगाना जरूरी है या नहीं, जिसकी समयसीमा बीते कई महीनों से चल रही है। इस अनिश्चितता के माहौल ने वैश्विक बाजार को पूरी तरह प्रभावित किया है। नतीजा यह हुआ कि दुनिया भर में कॉपर का कुल स्टॉक होने के बावजूद, उसका एक बहुत बड़ा हिस्सा अमेरिका में जाकर डंप हो गया है। इसके विपरीत, LME के बड़े ग्लोबल नेटवर्क में कॉपर की उपलब्धता काफी कम हो गई है, जिससे शॉर्ट पोजीशन रखने वाले ट्रेडर्स पर भारी दबाव बन गया है और कीमतों में यह ऐतिहासिक उछाल देखने को मिला है।
इसलिए भी बढ़ी हैं कीमतें
केवल टैरिफ का डर ही नहीं, बल्कि पिछले एक साल में कॉपर की कीमतों में 17 प्रतिशत की कुल तेजी के पीछे स्ट्रक्चरल मांग और सप्लाई का बड़ा अंतर भी मुख्य वजह है। दुनिया की पुरानी और बड़ी खदानें आज के आधुनिक दौर में तेजी से बढ़ते इस्तेमाल की रफ्तार के साथ तालमेल बिठाने में नाकाम साबित हो रही हैं। आज के तकनीकी युग में डेटा सेंटर, रिन्यूएबल एनर्जी सेक्टर, पावर ग्रिड और इलेक्ट्रिक वाहनों यानी EV में कॉपर का इस्तेमाल बेहिसाब बढ़ गया है। इंडस्ट्री के अनुमान के मुताबिक, एक इलेक्ट्रिक वाहन में सामान्य पेट्रोल-डीजल इंजन वाले पारंपरिक वाहनों की तुलना में लगभग छह गुना ज्यादा कॉपर की जरूरत होती है। इस वजह से इसकी डिमांड हमेशा हाई बनी हुई है। दूसरी ओर, उत्पादन से जुड़ी चुनौतियों के कारण अगस्त महीने में दुनिया के सबसे बड़े कॉपर उत्पादक देश चिली से होने वाली शिपमेंट भी एक साल से अधिक के सबसे निचले स्तर पर आ गई है।
इन कंपनियों की बल्ले बल्ले
इस रिकॉर्ड तेजी का सबसे बड़ा फायदा दुनिया की दिग्गज खनन कंपनियों को मिला है। रियो टिंटो ग्रुप, बीएचपी ग्रुप, ग्लेनकोर पीएलसी और जिजिन माइनिंग ग्रुप जैसी बड़ी कंपनियों ने अपनी हालिया अर्निंग रिपोर्ट्स में शानदार मुनाफा दर्ज किया है, जिसमें उनके कॉपर बिजनेस का प्रदर्शन सबसे आगे रहा है। कुल मिलाकर, ट्रंप के टैरिफ प्लान का डर, ग्रीन एनर्जी की बढ़ती मांग और ग्लोबल सप्लाई चेन में आ रही रुकावटों ने मिलकर कॉपर को कमोडिटी बाजार का नया किंग बना दिया है, जिससे आने वाले दिनों में भी कीमतों के उतार-चढ़ाव पर निवेशकों की पैनी नजर बनी रहेगी।
