Economic Survey on 90-hour work week debate: भारत में हफ्ते में 70-90 घंटे काम करने को लेकर चल रही बहस के बीच आर्थिक समीक्षा 2025 ने चौंकाने वाली सिफारिश की है। रिपोर्ट के अनुसार, 55-60 घंटे से अधिक काम करना शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव डाल सकता है।
आर्थिक समीक्षा 2025 के अनुसार, 60 घंटे से ज्यादा काम करने से मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य प्रभावित हो सकता है।
ज्यादा काम, ज्यादा खतरा!
लंबे वर्किंग आवर्स को आमतौर पर अधिक उत्पादकता का संकेत माना जाता है, लेकिन आर्थिक समीक्षा में प्रकाशित डब्ल्यूएचओ (WHO) और आईएलओ (ILO) की रिपोर्ट के मुताबिक, अत्यधिक काम करने से मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य को गंभीर नुकसान हो सकता है।
12 घंटे से अधिक डेस्क पर बैठने वालों को मानसिक तनाव और अन्य स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है। लगातार ओवरटाइम करने से दिल की बीमारियां, स्ट्रोक और अन्य गंभीर समस्याएं होने की संभावना बढ़ जाती है।
रिसर्च क्या कहती है?
आर्थिक समीक्षा ने पेगा एफ और नफ्राडी बी (2021) के अध्ययन का हवाला देते हुए बताया कि 55 घंटे से ज्यादा काम करने वाले लोगों में स्ट्रोक और हृदय रोग का खतरा बढ़ जाता है। डेस्क जॉब करने वाले लोगों को मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी समस्याएं ज्यादा होती हैं। अत्यधिक काम करने से नींद में कमी, तनाव और अवसाद जैसी समस्याएं बढ़ती हैं।
क्या हो सकता है समाधान?
- फ्लेक्सिबल वर्किंग आवर्स लागू किए जाएं
- वर्क-लाइफ बैलेंस को प्राथमिकता दी जाए
- 4-दिन वर्क वीक और हाइब्रिड मॉडल को अपनाया जाए
- मेंटल हेल्थ सपोर्ट और ब्रेक कल्चर को बढ़ावा दिया जाए
कौन से लोग हैं सबसे ज्यादा प्रभावित?
- आईटी और कॉर्पोरेट सेक्टर में काम करने वाले कर्मचारी।
- स्टार्टअप और फ्रीलांसर्स।
- हेल्थकेयर और सर्विस इंडस्ट्री के कर्मचारी।
- लंबे समय तक डेस्क जॉब करने वाले लोग।
क्या कहती है आर्थिक समीक्षा?
भारत में वर्क कल्चर लगातार बदल रहा है, लेकिन अत्यधिक काम करने का दबाव कर्मचारियों के स्वास्थ्य पर बुरा असर डाल सकता है। सरकार और कंपनियों को संतुलित वर्क-लाइफ बैलेंस बनाने के लिए नए कदम उठाने चाहिए। दुनियाभर में कंपनियां 4-दिन के वर्किंग वीक जैसे विकल्प अपना रही हैं, जिससे उत्पादकता और सेहत दोनों बेहतर हो सकती हैं।
