Budget 2027 Stock Market LTCG : पिछले 2 साल से भारतीय बाजार की हालत बेहद निराशाजनक है। खासतौर पर FII की बिकवाली ने बाजार के साथ ही निवेशकाें के भरोसे को झकझोर दिया है। अब भारतीय शेयर बाजार में रौनक लौटने का सवाल अब सिर्फ कंपनियों की कमाई और विदेशी निवेशकों की खरीदारी तक सीमित नहीं है।
विदेशी निवेशकों के लिए कैपिटल गेन में राहत संभव
बहरहाल, वित्त मंत्री (FM) निर्मला सीतारमण ने लॉन्ग टर्म कैपिटल गेन (LTCG) टैक्स पर बहस को स्वस्थ और उपयोगी चर्चा बताया था और कहा था कि वह इस विषय पर सुझाव सुनने के लिए सरकार इच्छुक है। उन्होंने यह भी बताया था कि घरेलू और विदेशी निवेशक LTCG टैक्स तथा सिक्योरिटीज ट्रांजैक्शन टैक्स (STT), दोनों पर सवाल और सुझाव रखते हैं।
अगर सरकार इन दोनों मोर्चों पर अगले बजट में निवेशकों के हित में कोई फैसला करती है, तो निश्चित रूप से यह भारतीय बाजार के लिए एक बूस्टर का काम करेगा।
दो साल से निवेशक निराश
भारतीय बाजार के सामने सबसे बड़ी चुनौती निवेशकों की उम्मीदों और वास्तविक रिटर्न के बीच बढ़ता अंतर है। रिपोर्ट में दिए गए इंडेक्स चार्ट के मुताबिक, पिछले दो वर्षों में Sensex करीब 7.9% और Nifty 50 लगभग 6.5% नीचे रहे। 2026 में भी 23 अक्टूबर तक के आंकड़ों में दोनों प्रमुख इंडेक्स साल की शुरुआत के मुकाबले काफी नीचे थे।
इसका असर उन रिटेल निवेशकों पर भी पड़ा है, जिन्होंने शेयर बाजार को नियमित कमाई बढ़ाने और लंबी अवधि में संपत्ति बनाने का माध्यम माना था। सरकार की चिंता इसलिए भी बढ़ी है क्योंकि बाजार में कमजोर रिटर्न के साथ निजी क्षेत्र में वेतन वृद्धि की सुस्ती भी निवेशकों के सेंटीमेंट पर असर डाल रही है।
LTCG Tax घटा तो कितना फायदा होगा?
फिलहाल शेयरों पर निर्धारित शर्तें पूरी होने पर LTCG टैक्स की दर 12.5% है। अगर सरकार इसे कम करती है, तो शेयर बेचने पर होने वाले पात्र लॉन्ग टर्म प्रॉफिट का बड़ा हिस्सा निवेशकों के पास बच सकता है।
मसलन, ₹1 लाख के टैक्स योग्य लॉन्ग टर्म कैपिटल गेन पर मौजूदा 12.5% दर से ₹12,500 टैक्स बनता है, अन्य लागू प्रावधानों को छोड़कर। दर घटने पर टैक्स का बोझ कम होगा और निवेश के बाद मिलने वाला वास्तविक रिटर्न बढ़ सकता है।
विदेशी निवेशकों के लिए क्या अहम?
विदेशी निवेशकों (FII) की एक बड़ी चिंता रुपये की कमजोरी और टैक्स की गणना से जुड़ी है। मान लीजिए, कोई विदेशी निवेशक $1,000 भारतीय शेयरों में लगाता है, जब डॉलर ₹80 का है। निवेश की शुरुआती कीमत ₹80,000 हुई। दो साल बाद शेयरों की कीमत रुपये में 10% बढ़कर ₹88,000 हो गई, लेकिन तब डॉलर ₹88 का हो गया।
अब निवेश की डॉलर में कीमत फिर भी $1,000 ही है। यानी रुपये में ₹8,000 का फायदा दिख रहा है, लेकिन डॉलर में निवेशक को कोई लाभ नहीं हुआ। रिपोर्ट के मुताबिक, चर्चा इस बात पर भी है कि विदेशी निवेशकों के लिए टैक्स की गणना डॉलर में वास्तविक लाभ के आधार पर हो। इससे मुद्रा की कमजोरी के कारण पैदा होने वाला टैक्स संबंधी असंतोष कम हो सकता है।
क्या टैक्स में राहत से लौटेगा विदेशी पैसा?
यही सबसे बड़ा सवाल है। विदेशी निवेशकों की बिकवाली को रोकने के लिए सिर्फ टैक्स कम करना पर्याप्त नहीं हो सकता। रिपोर्ट में तीन बड़ी चुनौतियों का जिक्र है। पहला, भारतीय शेयरों का वैल्यूएशन सुधार के बाद भी कुछ निवेशकों को महंगा लगना। दूसरा, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) से जुड़ी कंपनियों और निवेश अवसरों में भारत की सीमित मौजूदगी को लेकर चिंता। तीसरा, विकसित बाजारों में ऊंची ब्याज दरें, जो विदेशी निवेशकों के लिए दूसरे विकल्प आकर्षक बना सकती हैं।
