मीडिया को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहा जाता है। प्रेस लोगों से जुड़े मुद्दों को प्रमुखता से तो उठाता ही है, यह सत्ता और संस्थाओं की जवाबदेही भी तय करता है लेकिन जब इसी चौथे स्तंभ पर प्रहार होने लगे तो लोकतंत्र की आजादी खतरे में पड़ जाती है। प्रेस की आजादी पर यह हमला यदि दुनिया के सबसे 'पावरफुल' और विश्व के सबसे पुराने लोकतंत्र के मुखिया की तरफ से हो तो सवाल और भी गंभीर हो जाते हैं। हाल ही में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक नहीं बल्कि तीन मीडिया संस्थानों CNN, MS NOW और POLITICO पर बैन लगा दिया। इन तीनों मीडिया संस्थानों को व्हाइट हाउस में प्रवेश पर रोक लगा दी गई।
ट्रंप प्रशासन ने तीन मीडिया संस्थानों पर लगाया है बैन।
ट्रंप चाहते हैं मीडिया वही दिखाए जैसा वह सोचते हैं!
मीडिया का काम सत्ता से असहज सवाल पूछना और सरकार की जवाबदेही तय करना है, न कि केवल सरकार के पक्ष में खबरें दिखाना। लेकिन ट्रंप को यह पसंद नहीं। वह चाहते हैं कि मीडिया वही दिखाए जैसा वह सोचते और देखते हैं। मीडिया के तल्ख सवाल उन्हें पसंद नहीं। जब किसी एक मीडिया संस्थान को निशाना बनाया जाता है, तो इसका असर पूरे पत्रकारिता तंत्र पर पड़ सकता है। अमेरिकी मीडिया की सामूहिक प्रतिक्रिया यह संदेश देती है कि प्रेस की स्वतंत्रता किसी एक संगठन का नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक व्यवस्था का साझा अधिकार है।
प्रेस की स्वतंत्रता पर बहस तेज
वॉशिंगटन से लेकर नई दिल्ली तक प्रेस की स्वतंत्रता पर बहस तेज है। अमेरिका में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और मीडिया के बीच टकराव ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा किया है कि सत्ता और स्वतंत्र पत्रकारिता के बीच दूरी कितनी जरूरी है। लेकिन इस विवाद का सबसे अहम पहलू अमेरिकी मीडिया की वह एकजुटता रही, जिसमें ट्रंप समर्थक माने जाने वाले फॉक्स न्यूज समेत प्रमुख टीवी नेटवर्क ने भी व्हाइट हाउस की पूल कवरेज रोक दी।
ट्रंप और मीडिया का टकराव पहले भी सामने आ चुका है
यह पहली बार नहीं है जब ट्रंप प्रशासन और किसी बड़े अमेरिकी समाचार संगठन के बीच पहुंच को लेकर विवाद हुआ हो। 2025 में एसोसिएटेड प्रेस को व्हाइट हाउस के कुछ कार्यक्रमों और एयर फोर्स वन की कवरेज से उस समय सीमित किया गया जब AP ने ट्रंप प्रशासन द्वारा पसंद किए गए 'गल्फ ऑफ अमेरिका' नाम को अपनी संपादकीय शैली में अपनाने से इनकार किया और 'गल्फ ऑफ मेक्सिको' का इस्तेमाल जारी रखा।
ट्रंप ने सार्वजनिक रूप से कहा था कि AP की पहुंच तब तक प्रतिबंधित रहेगी जब तक वह नाम नहीं बदलता। मामला अदालत पहुंचा और एक संघीय न्यायाधीश ने व्हाइट हाउस को AP की पहुंच बहाल करने का आदेश देते हुए कहा कि सरकार पत्रकारों को उनके दृष्टिकोण के आधार पर अलग नहीं कर सकती। बाद की अपीलीय कार्यवाही में इस मामले पर अलग कानूनी दृष्टिकोण भी सामने आया, इसलिए यह विवाद पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ। इस पूरे घटनाक्रम में एक अहम बात सामने आती है-मीडिया संगठन भले ही एक-दूसरे के प्रतिद्वंद्वी हों, लेकिन जब सवाल पत्रकारों की संस्थागत पहुंच और स्वतंत्र रिपोर्टिंग के अधिकार का हो, तो वे साझा मंच पर खड़े हो सकते हैं।
भारत से तुलना क्यों की जा रही?
भारत और अमेरिका की संवैधानिक व्यवस्थाएं, मीडिया बाजार और राजनीतिक संस्थाएं अलग हैं। इसलिए दोनों देशों को एक जैसा बताना सही नहीं होगा। लेकिन प्रेस की स्वतंत्रता से जुड़े कुछ सवाल दोनों जगह दिखाई देते हैं। भारत में भी पत्रकारों और मीडिया संगठनों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई, जांच और हिरासत को लेकर प्रेस स्वतंत्रता संगठनों ने चिंता जताई है। किसी न्यूजरूम पर कार्रवाई केवल उस संस्था तक सीमित नहीं रहती। यदि दूसरे मीडिया संगठन उसे सिर्फ प्रतिस्पर्धी मानकर चुप रहें, तो भविष्य में वही प्रक्रिया उनके खिलाफ भी इस्तेमाल हो सकती है।
अमेरिकी मॉडल से भारत के लिए सबसे बड़ा सवाल क्या है?
अमेरिका के हालिया घटनाक्रम में सबसे उल्लेखनीय बात सिर्फ ट्रंप और मीडिया के बीच विवाद नहीं, बल्कि दूसरे मीडिया संस्थानों की प्रतिक्रिया है। CNN से असहमति रखने वाला कोई अमेरिकी मीडिया संगठन भी यह कह सकता है कि वह CNN की पत्रकारिता से सहमत नहीं है। लेकिन सवाल यह है कि क्या सरकार को किसी मीडिया संस्थान को उसकी रिपोर्टिंग या संपादकीय रुख के कारण सरकारी कार्यक्रमों से बाहर करने की अनुमति दी जानी चाहिए? अमेरिकी मीडिया संगठनों ने इस मामले में जिस तरह सामूहिक प्रतिक्रिया दी, उसने इसी सिद्धांत को केंद्र में रखा। CNN, MS NOW या POLITICO की किसी खबर से सहमत होना जरूरी नहीं था; मुद्दा प्रेस को सरकारी पहुंच देने या रोकने के सिद्धांत का था। भारत में भी यही सवाल अलग परिस्थितियों में पूछा जा सकता है-जब किसी मीडिया संस्थान पर छापा पड़े, किसी पत्रकार के खिलाफ मामला दर्ज हो या किसी संगठन की सरकारी पहुंच प्रभावित हो, तब बाकी मीडिया संस्थानों की भूमिका क्या होनी चाहिए?एक और फर्क, भारत में मीडिया का ढांचा
भारत का मीडिया परिदृश्य अमेरिका से काफी अलग है। यहां टेलीविजन, डिजिटल मीडिया, अखबार, क्षेत्रीय मीडिया और सोशल मीडिया का विशाल और विविध नेटवर्क है। साथ ही मीडिया स्वामित्व, सरकारी विज्ञापन, कानूनी कार्रवाई और डिजिटल प्लेटफॉर्म जैसे मुद्दे भी पत्रकारिता के माहौल को प्रभावित करते हैं। इसलिए अमेरिका में हुई टीवी पूल की एक घटना को भारत में हूबहू दोहराए जाने की उम्मीद करना उचित नहीं होगा। लेकिन इससे एक संस्थागत सवाल जरूर निकलता है-क्या मीडिया संस्थान केवल अपनी प्रतिस्पर्धा देखते हैं या प्रेस की स्वतंत्रता के साझा सिद्धांत की भी रक्षा करते हैं?
प्रेस की स्वतंत्रता का मतलब जवाबदेही से छूट नहीं
स्वतंत्र मीडिया का अर्थ यह नहीं है कि पत्रकार या समाचार संगठन कानून से ऊपर हैं। गलत रिपोर्टिंग, मानहानि या अन्य वास्तविक कानूनी उल्लंघनों के खिलाफ कानूनी प्रक्रिया उपलब्ध रहनी चाहिए। लेकिन विवाद तब पैदा होता है जब कानूनी या प्रशासनिक कार्रवाई को पत्रकारिता की आलोचना के बजाय पत्रकारिता को दबाने के माध्यम के रूप में इस्तेमाल किए जाने का आरोप लगता है। इसीलिए प्रेस की स्वतंत्रता और मीडिया की जवाबदेही दोनों को साथ देखना जरूरी है।
अमेरिका की घटना भारत के लिए क्यों महत्वपूर्ण है?
ट्रंप और अमेरिकी मीडिया का मौजूदा विवाद अंततः सिर्फ अमेरिका की राजनीति या व्हाइट हाउस की प्रेस ब्रीफिंग का मुद्दा नहीं है। यह उस बड़े सवाल का हिस्सा है कि लोकतंत्र में सत्ता की निगरानी कौन करेगा और पत्रकारों को सत्ता से असहज सवाल पूछने की कितनी स्वतंत्रता होगी। अमेरिका में हालिया घटनाक्रम का सबसे बड़ा संदेश शायद यही है कि मीडिया की स्वतंत्रता केवल किसी एक संस्थान का अधिकार नहीं है। यदि एक मीडिया हाउस पर दबाव पड़ता है और बाकी संस्थान केवल अपनी पहुंच या व्यावसायिक लाभ देखते हैं, तो इसका असर पूरे मीडिया तंत्र पर पड़ सकता है।
भारत के लिए भी बहस यहीं से शुरू होती है। सवाल किसी एक सरकार, पार्टी या मीडिया संस्थान के पक्ष या विपक्ष का नहीं, बल्कि उस व्यवस्था का है जिसमें पत्रकार सत्ता से सवाल पूछ सकें, सरकार अपनी नीतियों का जवाब दे और मीडिया भी अपनी गलतियों के लिए जवाबदेह रहे। क्योंकि लोकतंत्र में मजबूत प्रेस का अर्थ सरकार-विरोधी प्रेस नहीं होता। इसका अर्थ ऐसा प्रेस होता है जो सरकार के पक्ष में हो या विपक्ष में, लेकिन सत्ता से सवाल पूछने की स्वतंत्रता बनाए रखे।
