पाकिस्तान ने सऊदी अरब और तुर्की के साथ हाल ही में साइन किए गए नए रक्षा समझौते को पूरी तरह 'रक्षात्मक' करार दिया है। पाकिस्तान के विदेश मंत्री इशाक डार ने कहा कि यह समझौता किसी भी देश के खिलाफ नहीं है और क्षेत्र के अन्य देश भी इसके सिद्धांतों को स्वीकार करने पर इसमें शामिल हो सकते हैं।
पाकिस्तान-सऊदी-तुर्की का बड़ा रक्षा समझौता
मक्का संयुक्त रक्षा समझौते पर हुआ हस्ताक्षर
सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान, तुर्की के राष्ट्रपति रेसेप तैयप एर्दोगन और पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने शुक्रवार को मक्का संयुक्त रक्षा समझौते पर हस्ताक्षर किए। अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते सैन्य तनाव के बीच इस बड़े सुरक्षा गठबंधन को बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है। समझौते के मुताबिक तीनों में से किसी भी एक देश पर होने वाला सशस्त्र हमला तीनों देशों पर हमला माना जाएगा। पाकिस्तान के विदेश मंत्री इशाक डार ने कहा कि यह प्रावधान संयुक्त राष्ट्र चार्टर के अनुच्छेद 51 के तहत व्यक्तिगत और सामूहिक आत्मरक्षा के अधिकार के अनुरूप है।
किसी देश के खिलाफ नहीं है समझौता
इशाक डार ने सोशल मीडिया पर कहा कि यह समझौता “पूरी तरह रक्षात्मक” है। उन्होंने स्पष्ट किया कि इसका मकसद किसी अन्य देश को निशाना बनाना नहीं है। तुर्की के विदेश मंत्री हाकान फिदान भी इससे पहले कह चुके हैं कि समझौता ईरान या किसी अन्य देश के खिलाफ नहीं है। पाकिस्तान ने कहा कि क्षेत्र के अन्य देश भी इसमें शामिल हो सकते हैं, बशर्ते वे इसके सिद्धांतों को स्वीकार करें और अपने मतभेदों को शांतिपूर्ण तरीके से सुलझाने के लिए प्रतिबद्ध हों।
पुराने रक्षा समझौतों पर नहीं पड़ेगा असर
इशाक डार ने कहा कि यह समझौता पाकिस्तान, सऊदी अरब और तुर्की के बीच पहले से मौजूद किसी द्विपक्षीय या बहुपक्षीय समझौते को खत्म या उसकी जगह नहीं लेता। पाकिस्तान क्षेत्र के अन्य देशों के साथ भी स्थायी शांति और स्थिरता की दिशा में काम करता रहेगा।
तीनों देशों की अलग-अलग सैन्य ताकत
इस समझौते में शामिल तीनों देशों की सैन्य और रणनीतिक क्षमताएं अलग-अलग हैं। पाकिस्तान मुस्लिम जगत का एकमात्र परमाणु हथियार संपन्न देश है। सऊदी अरब के पास मजबूत आर्थिक संसाधन और गहरा क्षेत्रीय प्रभाव है, जबकि नाटो सदस्य तुर्की के पास बड़ी सैन्य क्षमता और तेजी से विकसित हो रहा रक्षा उद्योग है।
क्या यह NATO जैसा गठबंधन है?
पाकिस्तान के रक्षा विशेषज्ञों ने इस समझौते को NATO जैसा सैन्य गठबंधन मानने से परहेज करने की सलाह दी है। इस्लामाबाद के रक्षा विश्लेषक अब्दुल्ला खान के अनुसार, समझौता ऐसे समय हुआ है जब क्षेत्रीय तनाव बढ़ा हुआ है, लेकिन इसे ईरान या किसी अन्य देश के खिलाफ लक्षित कदम के तौर पर नहीं देखा जाना चाहिए।
गौरतलब है कि पाकिस्तान और सऊदी अरब के बीच लंबे समय से सैन्य संबंध हैं। दोनों देशों ने सितंबर 2025 में भी अलग से एक पारस्परिक रक्षा समझौता किया था। वहीं पाकिस्तान और तुर्की के बीच भी पिछले कुछ सालों में रक्षा और सैन्य उद्योग के क्षेत्र में सहयोग लगातार बढ़ा है।
