हजारों ख्वाहिशें ऐसी कि हर ख्वाहिश पे दम निकले, बहुत निकले मिरे अरमान लेकिन फिर भी कम निकले...
नोबेल शांति पुरस्कार जीतने के लिए ट्रंप ने पूरी कोशिश की।(फोटो सोर्स: टाइम्स नाउ डिजटल)
दुनिया के सबसे शक्तिशाली देश के नेता डोनाल्ड ट्रंप (Donald Trump) भी कुछ इसी लहजे में दुनिया के आगे अपना दर्द बयां कर रहे हैं। खुद को दुनिया का सबसे बड़ा 'पीसमेकर' यानी शांति दूत मान लेने वाले ट्रंप ने एड़ी-चोटी का जोर लगा दिया कि किसी भी हाल में नैतिकता और जिम्मेदारी का सबसे प्रतीक यानी नोबेल शांति पुरस्कार (Noble Peace Prize) उन्हें मिल जाए।
इस पुरस्कार के लिए ट्रंप की तड़प तो देखिए कि उन्होंने यहां तक कह डाला कि अगर नोबेल समिति यह मेडल उन्हें नहीं देती है तो यह अमेरिका का अपमान होगा।
हाल ही में ट्रंप ने कहा, "अगर इजरायल-गाजा संघर्ष को समाप्त कराने की उनकी योजना कामयाब हो जाती है तो उन्होंने कुछ ही महीनों में आठ संघर्षों को सुलझा लिया है। यह शानदार है, कोई ऐसा कभी नहीं कर पाया। फिर भी, ‘क्या आपको नोबेल पुरस्कार मिलेगा?’ बिल्कुल नहीं। वो इसे किसी ऐसे व्यक्ति को देंगे जिसने कुछ भी नहीं किया। वो इसे ऐसे व्यक्ति को देंगे जिसने डोनाल्ड ट्रंप के विचारों और युद्ध को सुलझाने के लिए क्या किया गया, इस पर कोई किताब लिखी है, हां, नोबेल पुरस्कार किसी लेखक को मिलेगा। लेकिन देखते हैं क्या होता है।’’
भले ही ट्रंप ये मान चुके हैं कि फिलहाल इस धरती पर इस इस पुरस्कार के लिए उनसे ज्यादा एलिजबल यानी योग्य व्यक्ति कोई नहीं है, लेकिन विशेषज्ञों की राय अमेरिकी राष्ट्रपति की ख्वाहिश से बिल्कुल अलग है।
सबसे बड़ा सवाल है कि दुनिया में शांति स्थापित करने के लिए ट्रंप की इस तथाकथित प्रयासों के बावजूद आखिर क्यों उन्हें नोबेल शांति पुरस्कार नहीं मिल सकता? आइए जानते हैं कि इस पुरस्कार को पाने के हकदार किसे माना जाता है।
दरअसल, नॉर्वे की संसद ने पांच सदस्यीय कमेटी की स्थापना की है। पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट ओस्लो की निदेशक नीना ग्रेगर ने कहा कमिटी में विशेषज्ञों की टीम सैकड़ों या हजारों नामों की छंटनी करते हैं। वे देखते हैं कि उम्मीदवार का शांति में कितना योगदान रहा। वहीं, उनके योगदान का असर कितना लंबा होगा।
यह प्रोसेस कई महीनों तक चलती है। ये भी सुनिश्चित किया जाता है कि क्या नाम के पीछे राजनीतिक जोर तो नहीं है। इसके बाद कमेटी बंद कमरे में बैठकर वोटिंग करती है। सबसे ज्यादा वोट पाने वाला विजेता होता है।
हेनरी जैक्सन सोसाइटी के इतिहासकार और रिसर्च फेलो थियो जेनोउ ने कहा कि ट्रंप की पहलों का अभी तक कोई स्थायी प्रभाव नहीं दिखा है। जेनोउ के हवाले से एपी ने कहा, "मुझे नहीं लगता कि वे दुनिया का सबसे प्रतिष्ठित पुरस्कार किसी ऐसे व्यक्ति को देंगे जो जलवायु परिवर्तन में विश्वास नहीं करता।"
नोबेल शांति पुरस्कार मेडल की फोटो।(फोटो सोर्स: noble peace prize x handle)
नोबेल प्राइज पाने की इतनी बेताबी क्यों?
हालांकि, सबसे बड़ा सवाल है कि जिस शख्स ने राष्ट्रपति चुनाव से पहले अमेरिका को फिर से महान देश बनाने का सपना दिखाया था उसके एक मात्र सपना नोबेल पुरस्कार पाना ही क्यों रह गया? इसके पीछे सबसे बड़ी वजह कोई और नहीं बल्कि अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा हैं।
ओबामा की तरह उन्होंने दूसरी बार राष्ट्रपति बनने के लिए साम-दाम, दंड-भेद हर पैंतरा अपना लिया। उनका कोशिश कामयाब भी हो गई, लेकिन फिर भी एक चीज जो ओबामा के पास है वो उनके पास अब तक नहीं है यानी नोबेल शांति पुरस्कार।
अमेरिकी यूनिवर्सिटी की अंतरराष्ट्रीय संबंधों की प्रोफेसर गैरेट मार्टिन ने कहा है कि ट्रंप को लगता है कि अगर ओबामा को यह पुरस्कार मिल सकता है तो उन्हें क्यों नहीं?
पाकिस्तान-इजरायल ने दिखाए सुनहरे सपने
ट्रंप के इस ख्वाहिश को पंख देने में इजरायल और पाकिस्तान और कंबोडिया जैसे देशों का बड़ा हाथ है। इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू और पाकिस्तानी प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने ट्रंप को इस पुरस्कार के लिए नॉमिनेट कर दिया।
दोनों नेताओं ने ट्रंप को नॉमिनेट करने से पहले ये भी नहीं सोचा नोबेल शांति पुरस्कारों के लिए किसी को नॉमिनेट करने की समयसीमा 31 जनवरी 2025 थी, यानी ट्रंप के 20 जनवरी को राष्ट्रपति बनने के 11 दिन बाद यह समय सीमा समाप्त हो गई।
इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामि नेतन्याहू ने ट्रंप को नोबेल शांति पुरस्कार के लिए किया नामित।(फोटो सोर्स: AP)
पाकिस्तान अपने आर्थिक हित साधने के लिए ट्रंप को इस पुरस्कार के योग्य बता रहा है। यहां तक कि पाकिस्तानी फील्ड मार्शल असीम मुनीर की ट्रंप से मुलाकात के बाद पाकिस्तान की सरकार ने उनको नोबेल पीस प्राइज के लिए नॉमिनेट कर दिया था।
पाकिस्तान का दावा था कि भारत-पाकिस्तान सैन्य झड़प के दौरान ट्रंप ने कूटनीतिक पहल और मध्यस्थता की और एक बड़ा युद्ध टालने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। वहीं, सैन्य कार्रवाई ऑपरेशन सिंदूर में मुंह की खाने के बाद पाकिस्तान सीने ने भारत के सामने सीजफायर के लिए गिड़गिड़ाया था। भारत का साफ कहना है कि सैन्य कार्रवाई को रोकने में ट्रंप की कोई भूमिका नहीं है।
पाकिस्तान ने भी ट्रंप को किया नोबेल शांति पुरस्कार के लिए नामित।(फोटो सोर्स: AP)
अनगिनत झूठे दावे करते गए ट्रंप...
आर्मेनिया और अजरबैजान (Armenia-Azerbaijan) के बीच संघर्ष के खत्म कराने के लिए ट्रंप ने दोनों नेताओं को वॉशिंगटन बुलाया, लेकिन किसी समझौते पर दस्तखत नहीं हुए। फिर भी ट्रंप ने घोषणा कर दी कि मैंने दोनों देशों के बीच सुलह करा दिया।
वहीं, पिछले कुछ दिनों पहले जब प्राचीन शिव मंदिर के निकट सीमा को लेकर विवाद को लेकर कंबोडिया और थाईलैंड के बीच गोलीबारी की घटना घटी तो ट्रंप ने उसे युद्ध करार दे दिया।
इसके बाद अमेरिकी राष्ट्रपति ने दावा किया कि उनकी वजह से दोनों देशों ने संघर्ष विराम का फैसला किया। हालांकि, सच्चाई ये है कि आसियान (ASEAN) देशों की पहल पर दोनों देशों ने शांति की पहल की।
ट्रंप ने कभी मिस्र और इथियोपिया के बीच युद्ध रुकवाने का दावा किया तो कभी सर्बिया-कोसोवो, रवांडा और कांगो के बीच सीमा विवाद सुलझाने को लेकर अपनी पीठ थपथपाई।
काम कर गया ट्रंप का गाजा पीस प्लान
इस बात में कोई दो राय नहीं है कि ट्रंप का गाजा पीस प्लान काम करता दिख रहा है। इजरायल बंधकों को रिहा करने के लिए अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की धमकी काम कर गई है। हमास सभी बंधकों को चाहे वे जिंदा हों या मृत सभी को रिहा करने के लिए तैयार हो गया है। उम्मीद जताई जा रही है कि जल्द ही गाजा पट्टी में शांति बहाल हो सकती है। इजरायल-हमास संघर्ष को खत्म कराने में ट्रंप की अहम भूमिका मानी जा रही है।
संघर्षविराम को लेकर हमास ने मान ली ट्रंप की बात।(फोटो सोर्स: AP)
व्हाइट हाउस की प्रेस सेक्रेटरी की मानें तो विश्व शांति के लिए ही ट्रंप ने ईरान की न्यूक्लियर फैसिलिटीज पर स्ट्राइक का आदेश दिया था। हालांकि, अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञों ने कहा कि अमेरिका ने ऐसा करके इजरायल-ईरान यु्द्ध की आग में घी डालने का काम किया था।
नोबेल शांति पुरस्कार के विजेता की घोषणा 10 अक्टूबर को होगी।(फोटो सोर्स: noble peace prize x handle)
नोबेल शांति पुरस्कार की घोषणा 10 अक्टूबर को होगी। पुरस्कार किसे मिलेगा यह सिर्फ नोबेल कमिटी ही जानती है। दुनिया की निगाहें अब 10 अक्टूबर पर टिकी है, जब विजेता के नाम का ऐलान होगा। दुनिया के सबसे शक्तिशाली इंसान को भी इस दिन का बेसब्री से इंतजार होगा...
