Vamana Jayanti 2026 Date: भगवान विष्णु के वामन अवतार का प्राकट्य पर्व इस साल 23 सितंबर 2026, बुधवार को मनाया जाएगा। वामन जयंती को वामन द्वादशी भी कहा जाता है। यह पर्व भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की द्वादशी तिथि को मनाया जाता है। इस दिन भगवान विष्णु के वामन स्वरूप की पूजा, व्रत, कथा और दान करने का विधान है।
साल 2026 में वामन जयंती कब है (Image AI Generated and Newsroom Verified)
पंचांग के अनुसार भाद्रपद माह के शुक्ल पक्ष की द्वादशी तिथि 22 सितंबर की रात करीब 9:43-9:44 बजे शुरू होगी और 23 सितंबर की रात करीब 10:50-10:51 बजे समाप्त होगी। सूर्योदय के समय द्वादशी तिथि होने के कारण वामन जयंती का व्रत 23 सितंबर को रखा जाएगा।
वामन जयंती 2026 का पूजा मुहूर्त
शास्त्रों भगवान वामन का प्राकट्य श्रवण नक्षत्र और अभिजीत मुहूर्त में हुआ था। 2026 में श्रवण नक्षत्र 23 सितंबर की सुबह करीब 9:09 बजे तक रहेगा। इसके बाद धनिष्ठा नक्षत्र शुरू हो जाएगा। 23 सितंबर को अभिजीत मुहूर्त करीब 11:47 बजे से 12:36 बजे तक रहेगा। इस दौरान आप भगवान वामन का पूजा कर सकते हैं।
कैसा है भगवान वामन का स्वरूप
वामन देव को बाल ब्राह्मण के रूप में पूजा जाता है। उनके हाथ में छत्र और कमंडल है। अगर आपके घर में भगवान वामन की प्रतिमा हो तो उसी का पूजन करें। प्रतिमा उपलब्ध न हो तो भगवान विष्णु के चित्र के सामने भी पूजा की जा सकती है।
वामन जयंती की पूजा विधि
सुबह ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान करें और साफ वस्त्र पहनें। पूजा घर को साफ करके भगवान वामन की प्रतिमा या तस्वीर स्थापित करें। एक चौकी पर पीला या लाल कपड़ा बिछाकर भगवान वामन को विराजमान करें। इसके बाद पूजा स्थान और प्रतिमा पर गंगाजल का छिड़काव करें। सबसे पहले भगवान गणेश का स्मरण करें। इसके बाद भगवान विष्णु के वामन स्वरूप का ध्यान करके पूजा शुरू करें। भगवान को जल, पंचामृत, चंदन, अक्षत, पीले फूल, तुलसीदल, धूप और दीप अर्पित करें। प्रतिमा धातु की हो तो जल या पंचामृत से अभिषेक कर सकते हैं। तस्वीर पर अभिषेक न करें।
इसके बाद भगवान वामन को पीले वस्त्र या पीले फूल अर्पित करें। पीली मिठाई, खीर, केले और दूसरे सात्त्विक व्यंजन का भोग लगाएं। इसके साथ भगवान विष्णु के मंत्र ॐ नमो भगवते वासुदेवाय का जाप करें। पूजा में पंचोपचार या षोडशोपचार विधि अपना सकते हैं। परंपरा के अनुसार भगवान वामन के सामने 52 पेड़े और 52 रुपये या सामर्थ्य के अनुसार दक्षिणा रखें। भोग लगाने के बाद भगवान वामन की आरती करें और वामन जयंती की कथा का पाठ करें। पूजा के बाद दही, चावल, चीनी और दक्षिणा किसी ब्राह्मण को दान करने का विधान भी रखा जाता है। सामर्थ्य के अनुसार अन्न, वस्त्र और अन्य उपयोगी वस्तुओं का दान किया जा सकता है।
वामन जयंती की व्रत विधि
वामन जयंती पर श्रद्धालु अपनी क्षमता के अनुसार व्रत रखते हैं। सुबह स्नान करके व्रत का संकल्प लें और भगवान विष्णु के वामन स्वरूप का ध्यान करें। दिनभर भगवान विष्णु का नाम स्मरण करें। फल, दूध और दूसरे फलाहारी पदार्थ ग्रहण कर सकते हैं। पूजा के बाद भगवान को भोग लगाएं। ब्राह्मण को दही, चावल, चीनी और दक्षिणा दान करके व्रत का पारण किया जाता है। कठोर व्रत रखने वाले लोग अपने परिवार और गुरु-परंपरा के नियम के अनुसार पारण करें।
भगवान विष्णु ने क्यों लिया था वामन अवतार
भगवान विष्णु का वामन अवतार की कथा राजा बलि से जुड़ी है। राजा बलि प्रह्लाद के पौत्र और विरोचन के पुत्र थे। उन्होंने अपनी शक्ति और तप से तीनों लोकों पर अधिकार कर लिया था, जिससे देवराज इंद्र सहित देवताओं का स्वर्ग पर अधिकार समाप्त हो गया था।
देवताओं की प्रार्थना पर भगवान विष्णु ने अदिति और ऋषि कश्यप के पुत्र के रूप में वामन अवतार लिया। वामन देव छोटे कद के ब्राह्मण के रूप में राजा बलि के यज्ञ स्थल पर पहुंचे। उस समय बलि अश्वमेध यज्ञ कर रहे थे।
वामन देव ने राजा बलि से मांगी तीन पग भूमि
वामन देव ने राजा बलि से दान में केवल तीन पग भूमि मांगी। राजा बलि ने इसे सहज ही स्वीकार कर लिया, लेकिन उनके गुरु शुक्राचार्य ने वामन देव को पहचान लिया और बलि को सावधान किया, लेकिन राजा बलि अपने दिए हुए वचन से पीछे नहीं हटे। वचन मिलते ही वामन देव ने विराट रूप धारण कर लिया। पहले पग में उन्होंने पृथ्वी को नाप लिया और दूसरे पग में देवलोक को। अब तीसरा पग रखने के लिए कोई स्थान शेष नहीं बचा। राजा बलि समझ चुके थे कि उनके सामने स्वयं भगवान विष्णु खड़े हैं। उन्होंने अपना सिर आगे कर दिया और कहा कि भगवान अपना तीसरा पग उनके सिर पर रखें। वामन देव ने बलि के सिर पर तीसरा पग रखा। इसके बाद भगवान विष्णु ने राजा बलि को पाताल लोक भेज दिया गया। भगवान विष्णु ने बलि की वचनबद्धता और भक्ति से प्रसन्न होकर उन्हें उनके लोक में रहने का वरदान दिया।
वामन जयंती की पूजा से क्या फल मिलता है
वामन जयंती पर भगवान विष्णु की पूजा करने से घर में सुख-समृद्धि, शांति और भगवान की कृपा बनी रहती है। व्रत और पूजा के साथ दान करने से धार्मिक पुण्य प्राप्त होता है।
