Sawan (Shravan) Month katha: श्रावण मास आते ही शिव मंदिरों में जलाभिषेक शुरू हो जाता है और चारों ओर हर-हर महादेव का जयकारा सुनाई देने लगता है। लेकिन सावन में शिव को जल क्यों चढ़ाया जाता है और सोमवार का व्रत क्यों रखा जाता है? इन परंपराओं के पीछे समुद्र मंथन में शिव के विषपान और माता पार्वती की कठिन तपस्या की पौराणिक कथाएं हैं। आइए, सरल शब्दों में जानते हैं श्रावण मास की पूरी कहानी।
श्रावण मास की कथा, क्या है सावन महीने की पौराणिक कहानी
समुद्र मंथन से शुरू होती है सावन की कथा
पौराणिक कथा के अनुसार, एक बार महर्षि दुर्वासा ने देवराज इंद्र को एक दिव्य माला भेंट की, जिसे इंद्र ने अपने ऐरावत हाथी के मस्तक पर रख दिया। ऐरावत ने माला सूंड से उतारकर भूमि पर फेंक दी और चलते हुए उसे पैरों से रौंद दिया। इस अनादर से क्रोधित महर्षि दुर्वासा ने इंद्र सहित सभी देवताओं को शक्तिहीन होने का श्राप दे दिया।
समय के साथ देवताओं का तेज और सामर्थ्य घटने लगा, जिसका लाभ उठाकर असुरों ने स्वर्ग पर अपना वर्चस्व बढ़ाना शुरू कर दिया। भयभीत देवता भगवान विष्णु की शरण में पहुंचे, जिन्होंने उन्हें अपनी शक्तियां वापस पाने के लिए क्षीरसागर का मंथन करने की सलाह दी। दुर्बल हो चुके देवता अकेले यह कार्य नहीं कर सकते थे, इसलिए उन्हें असुरों की सहायता लेनी पड़ी।
मंदराचल पर्वत को मथनी और वासुकि नाग को रस्सी बनाकर समुद्र मंथन आरंभ हुआ। सभी को अमृत की प्रतीक्षा थी, लेकिन समुद्र से सबसे पहले अत्यंत विषैला हलाहल निकला, जिसके प्रभाव से पूरी सृष्टि संकट में पड़ गई। तब देवता भगवान शिव की शरण में पहुंचे।
संसार की रक्षा के लिए महादेव ने हलाहल विष का पान कर लिया, लेकिन माता पार्वती ने उसे उनके कंठ से नीचे नहीं उतरने दिया। विष के प्रभाव से शिव का कंठ नीला पड़ गया और वे ‘नीलकंठ’ कहलाए। मान्यता है कि विष की तीव्र गर्मी शांत करने के लिए देवताओं ने शिव पर जल अर्पित किया और इसी प्रसंग से श्रावण मास में महादेव के जलाभिषेक की परंपरा को जोड़कर देखा जाता है।
सावन में शिव को जल क्यों चढ़ाया जाता है
मान्यता है कि हलाहल विष के ताप से भगवान शिव का शरीर गर्म होने लगा था। उन्हें शीतलता देने के लिए देवताओं ने उन पर जल अर्पित किया। इसी कथा से सावन में शिवलिंग पर जल चढ़ाने की परंपरा को जोड़कर देखा जाता है।
श्रद्धालु पवित्र नदियों से जल लाकर महादेव का अभिषेक करते हैं। कांवड़ यात्रा का भाव भी इसी आस्था से जुड़ा है। भक्त मानते हैं कि सावन में जल, गंगाजल और बेलपत्र अर्पित करने से शिव प्रसन्न होते हैं।
माता पार्वती की तपस्या की कहानी
श्रावण मास की दूसरी कथा माता पार्वती से जुड़ी है। देवी सती ने अपने पिता दक्ष के यज्ञ में भगवान शिव का अपमान होने पर योगाग्नि में शरीर त्याग दिया था। इसके बाद उन्होंने पर्वतराज हिमालय के घर पार्वती के रूप में जन्म लिया।
माता पार्वती भगवान शिव को पति के रूप में प्राप्त करना चाहती थीं। इसके लिए उन्होंने कठोर तपस्या की। प्रचलित मान्यता है कि श्रावण मास में की गई उनकी साधना से प्रसन्न होकर शिव ने उन्हें पत्नी के रूप में स्वीकार करने का वरदान दिया।
इसी कथा के कारण विवाह योग्य कन्याएं सावन सोमवार का व्रत रखती हैं। विवाहित महिलाएं भी सुखी दांपत्य और परिवार की मंगलकामना के लिए शिव-पार्वती की पूजा करती हैं।
सावन का नाम श्रावण क्यों पड़ा
श्रावण इस महीने का शास्त्रीय नाम है, जबकि सावन उसी का बोलचाल में प्रचलित रूप है। मान्यता है कि इस मास की पूर्णिमा के आसपास चंद्रमा श्रवण नक्षत्र में रहता है। श्रवण नक्षत्र से संबंध होने के कारण इस महीने को श्रावण कहा गया।
इसलिए सावन और श्रावण अलग-अलग महीने नहीं हैं। दोनों एक ही मास के नाम हैं।
श्रावण मास भगवान शिव को क्यों प्रिय है
समुद्र मंथन की कथा भगवान शिव के त्याग और लोककल्याण को दर्शाती है। वहीं माता पार्वती की तपस्या प्रेम, धैर्य और दृढ़ संकल्प का संदेश देती है। इन्हीं कथाओं के कारण श्रावण मास को शिव और शक्ति की उपासना का विशेष समय माना जाता है।
इस महीने भक्त सोमवार का व्रत रखते हैं, शिवलिंग का जलाभिषेक करते हैं, बेलपत्र चढ़ाते हैं और ‘ॐ नमः शिवाय’ मंत्र का जाप करते हैं।
क्या संदेश देती है श्रावण मास की कथा
श्रावण की कथा केवल पूजा की परंपरा नहीं बताती, बल्कि जीवन का गहरा संदेश भी देती है। शिव का विषपान सिखाता है कि सामर्थ्य का उपयोग दूसरों की रक्षा के लिए होना चाहिए। माता पार्वती की तपस्या बताती है कि धैर्य और दृढ़ संकल्प से कठिन लक्ष्य भी प्राप्त किए जा सकते हैं।
शिव पर चढ़ती जलधारा मन के क्रोध, अहंकार और नकारात्मकता को शांत करने का प्रतीक है। इसलिए सावन केवल महादेव को जल चढ़ाने का महीना नहीं, बल्कि अपने भीतर के ताप को शांत करने और जीवन में संयम अपनाने का अवसर भी है।
