Ravi Pradosh Vrat Katha 2026 : भगवान शिव की आराधना के लिए प्रदोष व्रत को सबसे प्रभावशाली व्रतों में से एक माना जाता है। प्रत्येक माह कृष्ण और शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी तिथि को प्रदोष व्रत रखा जाता है। जब यह व्रत रविवार के दिन पड़ता है, तब इसे रवि प्रदोष व्रत कहा जाता है। धार्मिक मान्यता है कि इस दिन भगवान शिव और माता पार्वती की विधि-विधान से पूजा करने, प्रदोष व्रत कथा सुनने तथा शिव मंत्रों का जाप करने से जीवन के कष्ट दूर होते हैं और मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। इस वर्ष 12 जुलाई 2026 यानी आज आषाढ़ मास के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि पर रवि प्रदोष व्रत रखा जा रहा है। आइए जानते हैं रवि प्रदोष व्रत की पौराणिक कथा क्या है।
रवि प्रदोष व्रत कथा
आज प्रदोष व्रत का पूजा मुहूर्त
प्रदोष व्रत में भगवान शिव की पूजा प्रदोष काल में करना सबसे श्रेष्ठ माना गया है। प्रदोष काल: शाम 7 बजकर 22 मिनट से रात 9 बजकर 24 मिनट तक इस समय शिवलिंग का अभिषेक, बेलपत्र अर्पित करना, शिव चालीसा और प्रदोष व्रत कथा का पाठ विशेष फलदायी माना जाता है।
रवि प्रदोष व्रत कथा
पौराणिक मान्यता के अनुसार किसी नगर में एक अत्यंत निर्धन ब्राह्मण अपनी धर्मपरायण पत्नी और छोटे पुत्र के साथ रहता था। परिवार आर्थिक रूप से बेहद कमजोर था, लेकिन ब्राह्मणी भगवान शिव की अनन्य भक्त थी और प्रत्येक प्रदोष व्रत श्रद्धापूर्वक करती थी। वह पूरे नियम और भक्ति के साथ भगवान भोलेनाथ की पूजा करती और परिवार की सुख-समृद्धि की प्रार्थना करती थी।
एक दिन उनका पुत्र गंगा स्नान के लिए निकला। रास्ते में कुछ डाकुओं ने उसे घेर लिया और उससे पूछा कि उसके पिता का छिपा हुआ धन कहां रखा है। बालक ने विनम्रता से उत्तर दिया कि उसका परिवार अत्यंत गरीब है और उनके पास कोई धन नहीं है। चोरों ने जब उसकी पोटली देखी तो पूछा कि उसमें क्या है। बालक ने सच-सच बता दिया कि उसकी मां ने उसके लिए केवल रोटियां बांधकर दी हैं। बालक की सच्चाई और निर्धनता देखकर चोरों का हृदय पिघल गया। उन्होंने उसे बिना नुकसान पहुंचाए जाने दिया और किसी अन्य दिशा में चले गए।
राजा ने बना लिया बंदी
चलते-चलते बालक एक दूसरे नगर पहुंचा। यात्रा से थककर वह नगर के बाहर एक विशाल बरगद के पेड़ के नीचे सो गया। उसी समय राजकीय सैनिक चोरों की तलाश करते हुए वहां पहुंचे। उन्होंने सोते हुए बालक को ही चोर समझ लिया और बिना जांच-पड़ताल के उसे पकड़कर राजा के सामने प्रस्तुत कर दिया। राजा ने भी उसे अपराधी मानते हुए कारागार में बंद करने का आदेश दे दिया।
उधर, जब बालक शाम तक घर नहीं लौटा तो उसकी माता अत्यंत चिंतित हो गई। अगले दिन प्रदोष व्रत था। दुखी मन से भी उसने भगवान शिव का व्रत रखा और पूरे विश्वास के साथ भोलेनाथ से अपने पुत्र की कुशलता की प्रार्थना करने लगी। उसने शिवलिंग का अभिषेक किया, बेलपत्र अर्पित किए और आंखों में आंसू लेकर अपने बेटे की रक्षा की प्रार्थना की।
भोलेनाथ ने दी राजा को चेतावनी
भक्त की सच्ची भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उसी रात राजा को स्वप्न में दर्शन दिए। शिवजी ने कहा, 'जिस बालक को तुमने कारागार में बंद किया है, वह निर्दोष है। यदि उसे तुरंत मुक्त नहीं किया गया तो तुम्हारा राज्य और वैभव नष्ट हो जाएगा।'
सुबह होते ही राजा घबराकर कारागार पहुंचा और तुरंत उस बालक को सम्मान सहित रिहा कर दिया। जब बालक ने पूरी घटना सुनाई तो राजा को अपनी भूल का एहसास हुआ। उसने सैनिकों को ब्राह्मण के घर भेजकर उसके माता-पिता को राजमहल बुलवाया।
ब्राह्मण और उसकी पत्नी भयभीत होकर दरबार पहुंचे, लेकिन राजा ने उनसे क्षमा मांगी और कहा कि उनके पुत्र के साथ अन्याय हुआ है। प्रायश्चित स्वरूप राजा ने उस ब्राह्मण को पांच गांव दान में दिए, ताकि उसका परिवार सम्मान और सुख के साथ जीवन व्यतीत कर सके।
भगवान शिव की कृपा से उस निर्धन परिवार की दरिद्रता समाप्त हो गई। उनके जीवन में सुख, समृद्धि और सम्मान लौट आया। तभी से यह मान्यता प्रचलित हुई कि जो श्रद्धापूर्वक प्रदोष व्रत रखता है, भगवान शिव उसके संकट दूर कर उसकी मनोकामनाएं पूरी करते हैं।
क्यों खास है रवि प्रदोष व्रत
धार्मिक मान्यता है कि रवि प्रदोष व्रत करने से भगवान शिव के साथ सूर्य देव का भी आशीर्वाद प्राप्त होता है। इस दिन प्रदोष काल में शिवलिंग का अभिषेक, महामृत्युंजय मंत्र का जाप, शिव चालीसा और प्रदोष व्रत कथा का पाठ करने से रोग, शोक, आर्थिक संकट और मानसिक परेशानियां दूर होती हैं। शिवपुराण में भी प्रदोष काल को भगवान शिव की विशेष कृपा प्राप्त करने वाला समय बताया गया है।
