Pashupati Vrat Samagri, Puja Vidhi, Mantra, Katha: पशुपति व्रत भगवान भोलेशंकर को समर्पित है। इस व्रत को पांच सोमवार करने का विधान है। जब आप कई सारी परेशानियों से घिरे हों, तब आपको इस व्रत को करना चाहिए। अगर आपको इस व्रत को करना है तो आप यहां से पूजा की सामग्री लिस्ट देखें। साथ ही यहां पूजा की पूरी विधि भी बताई गई है। पशुपति व्रत का मंत्र और कथा भी आप यहां से देख सकते हैं।
पशुपति व्रत सामग्री-
- पशुपति यंत्र या भगवान शिव की तस्वीर
- अगरबत्ती
- कपूर
- दीपक
- फल
- फूल
- मिठाई
- मंत्र पढ़ने के लिए पवित्र धागा या माला
- पंचामृत (दूध, दही, शहद, चीनी और घी का मिश्रण)
- गंगाजल
- नारियल और पान
- बेल
- रुद्राक्ष माला
- पशुपति यंत्र लगाने के लिए लाल या पीला कपड़ा
पशुपति व्रत मंत्र-
ॐ नमः शिवाय
नमो नीलकण्ठाय
ॐ पार्वतीपतये नमः
ॐ ह्रीं ह्रौं नमः शिवाय
ॐ नमो भगवते दक्षिणामूर्त्तये मह्यं मेधा प्रयच्छ स्वाहा
पशुपति व्रत पूजा विधि-
- पशुपति व्रत जिस सोमवार से शुरू करने जा रहे हैं उस दिन स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण कर पांच सोमवार व्रत करने का संकल्प लें।
- इसके बाद अपने घर के पास के शिव मंदिर में जाएं।
- साथ में पूजा की थाली भी लेकर जाएं। जिसमें धूप, दीप, चंदन, लाल चंदन, विल्व पत्र, पुष्प, फल, जल जरूर शामिल करें।
- मंदिर में शिवलिंग का अभिषेक करें।
- इसके बाद पूजा की थाली को घर आकर ऐसे ही रख दें।
- फिर शाम के समय स्नान कर फिर से स्वच्छ वस्त्र धारण करें और शिव मंदिर जाएं
- सुबह तैयार की गई पूजा थाली में मीठा प्रसाद और छः दीपक भी रख लें।
- प्रसाद को बराबर तीन भाग में बांट लें। जिनमें दो भाग भगवान शिव को चढ़ाएं और बचा हुआ एक भाग अपनी थाली में रख लें।
- इसके बाद आप जो 6 दिए लाएं हैं उनमें से पांच दिए भगवान शिव के समक्ष जलाएं।
- बचा हुआ दिया अपने घर पर ले जाएं और इस दिए को घर में प्रवेश करने से पहले मुख्य द्वार के दाहिने ओर जलाकर रख दें।
- फिर घर में प्रवेश करने के बाद भोग का एक भाग खुद ग्रहण करें। इस बात का ध्यान रखें कि ये प्रसाद किसी और को खाने के लिए नहीं देना है।
- इस व्रत में शाम में भोजन ग्रहण किया जा सकता है। बस इस बात का ध्यान रखें कि इस दिन मीठा भोजन खाना है।
पशुपति व्रत कथा-
एक बार की बात है, भगवान शिव नेपाल की मनोरम तपोभूमि से आकर्षित होकर कैलाश पर्वत छोड़कर यहाँ आ गये और यहीं विराजमान हो गए। इस क्षेत्र में वे तीन सींग वाले हिरण (चिंकारा) के रूप में विचरण करने लगे। इस कारण इस क्षेत्र को ‘पशुपति क्षेत्र’ या ‘मृगस्थली’ भी कहा जाता है। भगवान शिव की अनुपस्थिति से चिंतित होकर, ब्रह्मा और विष्णु उनकी खोज में निकल पड़े। वे रमणीय स्थलों में भ्रमण करते हुए, इसी क्षेत्र में पहुंचे। यहाँ उन्होंने एक देदीप्यमान, मोहक तीन सींग वाला हिरण विचरण करते देखा। उन्हें मृग रूपी शिव पर शक हुआ। योग विद्या के माध्यम से ब्रह्मा जी ने तुरंत पहचान लिया कि यह मृग नहीं, बल्कि भगवान आशुतोष हैं। वे तुरंत उछल पड़े और मृग के सींग को पकड़ने की कोशिश करने लगे। इससे मृग के सींग के 3 टुकड़े हो गए। उसी सिंह का एक पवित्र टुकड़ा टूटकर यहाँ पर भी गिर गया, जिसके फलस्वरूप महारुद्र जी का जन्म हुआ। वे आगे चलकर पशुपतिनाथ जी के नाम से प्रसिद्ध हुए। भगवान विष्णु ने भगवान शिव की इच्छानुसार, उन्हें मोक्ष प्रदान करने के बाद, नागमती के ऊंचे टीले पर एक लिंग स्थापित किया, जो पशुपति के रूप में प्रसिद्ध हुआ। यह पशुपति नाथ व्रत कथा पशुपतिनाथ मंदिर की स्थापना और भगवान शिव के यहां विराजमान होने की कहानी बताती है।
