Jitiya Vrat Katha 2026: आज 3 अक्टूबर को जितिया यानी जीवित्पुत्रिका व्रत रखा जा रहा है। आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को रखा जाने वाला यह व्रत संतान की लंबी उम्र, सुख-समृद्धि और मंगलकामना के लिए किया जाता है। बिहार, झारखंड और उत्तर प्रदेश समेत कई क्षेत्रों में इस व्रत की विशेष मान्यता है। व्रत के दौरान माताएं निर्जला उपवास रखती हैं और जीवित्पुत्रिका व्रत की कथा सुनती-पढ़ती हैं। धार्मिक परंपरा में इस व्रत की कथा का संबंध राजा जीमूतवाहन, नाग शंखचूड़ और पक्षीराज गरुड़ से है।
जितिया व्रत कथा (Image AI Generated and Newsroom Verified)
मान्यता है कि जीमूतवाहन ने अपने त्याग और परोपकार से एक नाग के प्राण बचाने के लिए स्वयं को गरुड़ के सामने प्रस्तुत कर दिया था। आगे चलकर इसी कथा को जीवित्पुत्रिका व्रत की प्रमुख कथा के रूप में पढ़ा और सुना जाता है। मान्यता है कि इस कथा के बिना जीवित्पुत्रिका व्रत को अधूरा माना जाता है।
जितिया व्रत की पूरी कथा
प्राचीन काल की बात है। एक समय राजा जीमूतवाहन अपने साले मित्रावसु के साथ समुद्र के किनारे स्थित वन में भ्रमण कर रहे थे। इसी दौरान उन्होंने एक युवा पुरुष को अत्यंत व्याकुल अवस्था में अपनी ओर आते देखा। उसके पीछे एक वृद्धा स्त्री भी 'हाय पुत्र, हाय पुत्र' कहकर करुण विलाप करती हुई आ रही थी।
कुछ ही देर में सैनिक जैसा दिखाई देने वाला एक पुरुष उस युवक को समुद्र के किनारे एक ऊंची चट्टान के पास छोड़कर चला गया।
राजा जीमूतवाहन ने उस युवक से पूछा, 'तुम कौन हो? तुम्हें किस बात का दुख है? तुम्हारी माता तुम्हारे लिए इस प्रकार विलाप क्यों कर रही है?' युवक ने राजा जीमूतवाहन को अपनी पूरी कहानी सुनाई।
गरुड़ और नागों के बीच हुआ था समझौता
उसने बताया कि प्राचीन समय में महर्षि कश्यप की दो पत्नियां थीं—विनता और कद्रू। एक बार दोनों के बीच सूर्य के घोड़ों के रंग को लेकर विवाद हो गया। कद्रू ने कहा कि सूर्य के घोड़े काले हैं, जबकि विनता का कहना था कि वे सफेद हैं। दोनों ने शर्त लगा ली कि जिसकी बात गलत साबित होगी, वह दूसरी की दासी बन जाएगी।
कद्रू ने अपने नाग पुत्रों की सहायता से छल किया। नागों ने अपनी विषैली फुंकार से सूर्य के घोड़ों का रंग काला कर दिया। इस प्रकार कद्रू की बात सही दिखाई दी और शर्त के अनुसार विनता को उसकी दासी बनना पड़ा। जब यह बात विनता के पुत्र गरुड़ को पता चली तो उन्होंने अपनी माता को दासता से मुक्त कराने का संकल्प लिया। गरुड़ ने कद्रू से विनता को मुक्त करने का उपाय पूछा, तब नागों ने कहा कि यदि गरुड़ देवताओं के पास से अमृत लाकर उन्हें दे दें, तो वे उनकी माता विनता को दासता से मुक्त कर देंगे।
माता को दासता से मुक्त कराने के लिए गरुड़ अमृत प्राप्त करने निकल पड़े। उन्होंने अपने अद्भुत पराक्रम का प्रदर्शन किया। गरुड़ के पराक्रम से प्रसन्न होकर भगवान विष्णु ने उन्हें दर्शन दिए और वरदान मांगने को कहा। गरुड़ ने वरदान में मांगा कि नाग उनके भक्ष्य हों। भगवान विष्णु ने उन्हें यह वरदान दे दिया।
इसके बाद गरुड़ अमृत लेकर नागों के पास पहुंचे। इंद्र ने गरुड़ को सलाह दी कि नागों को अमृत पीने से रोकने के लिए वह उचित अवसर पर अमृत कलश वहां से उठा लेंगे। गरुड़ ने नागों से कहा, 'मैं अमृत ले आया हूं। पहले मेरी माता विनता को दासता से मुक्त करो। इसके बाद तुम अमृत का सेवन कर सकते हो। यदि तुम्हें मुझसे भय लगता है, तो मैं अमृत कलश को कुश के आसन पर रख देता हूं।' नागों ने उनकी बात स्वीकार कर ली। गरुड़ ने कुश के आसन पर अमृत कलश रख दिया और अपनी माता विनता को नागों की दासता से मुक्त करा लिया।
गरुड़ के वहां से जाते ही इंद्र ने अमृत कलश उठा लिया। नागों को जब इसका पता चला तो उन्होंने सोचा कि संभव है कि अमृत की कुछ बूंदें कुश पर गिर गई हों। वे कुश को चाटने लगे। इसी कारण उनकी जीभ दो भागों में विभाजित हो गई। गरुड़ को पहले ही भगवान विष्णु से नागों को अपना भक्ष्य बनाने का वरदान मिल चुका था। इसके बाद गरुड़ लगातार नागों का भक्षण करने लगे। उनके भय से नागलोक में हाहाकार मच गया।
गरुड़ के लगातार आक्रमण से नागों का अस्तित्व संकट में पड़ गया। नागों में भय व्याप्त हो गया। गर्भवती नागिनों के गर्भपात होने लगे और अनेक नाग भय के कारण प्राण गंवाने लगे। नागराज वासुकि ने विचार किया कि यदि यही स्थिति बनी रही तो पूरा नागलोक समाप्त हो जाएगा। गरुड़ को रोकना संभव नहीं था। इसलिए उन्होंने गरुड़ के साथ एक समझौता किया। नियम बनाया गया कि प्रतिदिन एक नाग स्वयं समुद्र के किनारे स्थित पर्वत पर गरुड़ के भोजन के लिए भेजा जाएगा। इसके बदले गरुड़ नागलोक में जाकर अन्य नागों का भक्षण नहीं करेंगे। गरुड़ ने इस व्यवस्था को स्वीकार कर लिया।
आज मेरी बारी है
नाग युवक ने राजा जीमूतवाहन को बताया, 'मेरा नाम शंखचूड़ है। नागराज वासुकि के बनाए नियम के अनुसार आज मेरी बारी है। मुझे गरुड़ के भोजन के लिए इस वध्यशिला पर लाया गया है। मेरी माता मेरे लिए विलाप कर रही है। इसी कारण मैं अत्यंत दुखी हूं।'
शंखचूड़ की बात सुनकर राजा जीमूतवाहन का हृदय करुणा से भर गया। उन्होंने कहा, 'नागराज वासुकि अपनी प्रजा की रक्षा करने के बजाय स्वयं अपनी प्रजा को गरुड़ के भोजन के लिए भेज रहे हैं। उन्हें सबसे पहले स्वयं को गरुड़ के सामने प्रस्तुत करना चाहिए था। किसी राजा का धर्म अपनी प्रजा की रक्षा करना है।'
फिर जीमूतवाहन ने कहा, 'तुम चिंता मत करो। आज मैं तुम्हारे स्थान पर अपना शरीर गरुड़ को अर्पित करूंगा। तुम्हारे प्राणों की रक्षा के लिए मैं अपना जीवन देने को तैयार हूं।' शंखचूड़ ने राजा को ऐसा करने से रोकते हुए कहा, 'हे महात्मा! मेरे जैसे साधारण प्राणी के लिए अपने अमूल्य जीवन का त्याग मत कीजिए। मैं अपने कुल के लिए कलंक नहीं बनना चाहता।' इसी बीच गरुड़ के आने का समय हो गया।
शंखचूड़ समुद्र तट पर स्थित भगवान शिव के गोकर्ण स्वरूप को अंतिम प्रणाम करने के लिए वहां से चला गया।
गरुड़ ने जीमूतवाहन को नाग समझकर उठा लिया
शंखचूड़ के वहां से जाते ही राजा जीमूतवाहन ने अपने मित्र मित्रावसु को किसी कार्य के बहाने वहां से भेज दिया। कुछ ही समय बाद गरुड़ वहां पहुंचे। उनके विशाल पंखों की गति से धरती तक कांपने लगी। जीमूतवाहन समझ गए कि गरुड़ आ चुके हैं। वह वध्यशिला पर जाकर लेट गए।
गरुड़ ने उन्हें नाग समझकर अपनी चोंच से उठाया और पहाड़ की चोटी पर ले गए। गरुड़ ने जीमूतवाहन के शरीर को घायल कर दिया और रक्त बहने लगा। लेकिन इतना कष्ट सहने के बाद भी जीमूतवाहन के चेहरे पर भय नहीं था। वह प्रसन्न दिखाई दे रहे थे। उसी समय आकाश से पुष्पों की वर्षा होने लगी। गरुड़ यह देखकर आश्चर्यचकित हो गए।
शंखचूड़ ने बताया सच
गरुड़ ने जीमूतवाहन को देखकर सोचा कि यह कोई साधारण नाग नहीं है। मेरे द्वारा घायल किए जाने के बाद भी यह भयभीत नहीं है और इसके चेहरे पर प्रसन्नता है। गरुड़ ने उसका भक्षण करना रोक दिया और पूछा, 'तुम नाग नहीं हो। सत्य बताओ, तुम कौन हो?' जीमूतवाहन ने कहा, 'मैं नाग ही हूं। तुम अपना भोजन पूरा करो। किसी महान व्यक्ति को किसी कार्य को बीच में छोड़ना उचित नहीं है।' तभी दूर से शंखचूड़ की आवाज आई। वह पुकार रहा था, 'हे गरुड़! इसे मत खाइए। यह नाग नहीं है। आपका वास्तविक भक्ष्य मैं हूं। इसे छोड़ दीजिए।' शंखचूड़ की बात सुनकर गरुड़ को अपनी भूल का पता चला।
उन्हें मालूम हुआ कि जीमूतवाहन नाग नहीं बल्कि विद्याधरों के राजा हैं और उन्होंने शंखचूड़ की रक्षा के लिए स्वयं अपने प्राणों का त्याग करने का संकल्प लिया था। गरुड़ को अपने किए पर अत्यंत पश्चात्ताप हुआ। उन्होंने सोचा कि उन्होंने एक ऐसे महात्मा को घायल कर दिया जो दूसरों के प्राण बचाने के लिए अपना जीवन देने आया था।
गरुड़ पश्चात्ताप में अपने प्राण त्यागने तक का विचार करने लगे, तब जीमूतवाहन ने उन्हें समझाया, 'हे पक्षीराज! अपने प्राण देने से मेरे कष्ट का समाधान नहीं होगा। यदि तुम्हें वास्तव में अपने कर्म पर पश्चात्ताप है तो आज से नागों का भक्षण करना छोड़ दो। जिन नागों का तुमने पहले भक्षण किया है, उनके लिए पश्चात्ताप करो। यही तुम्हारे लिए प्रायश्चित्त होगा।' जीमूतवाहन की करुणा से गरुड़ अत्यंत प्रभावित हुए। उन्होंने जीमूतवाहन की बात को गुरु की आज्ञा के समान माना और नागों का भक्षण हमेशा के लिए छोड़ने का निर्णय लिया।
माता गौरी ने किया अमृत का सिंचन
गरुड़ पूर्व में मारे गए नागों को पुनर्जीवित करने के लिए अमृत लेने चले गए। इधर जीमूतवाहन की पत्नी मलयवती की भक्ति से प्रसन्न होकर माता गौरी ने स्वयं वहां प्रकट होकर जीमूतवाहन के शरीर पर अमृत का सिंचन किया। माता गौरी की कृपा से जीमूतवाहन स्वस्थ हो गए। उनके शरीर की शोभा और भी बढ़ गई। देवताओं ने प्रसन्न होकर उनका गुणगान किया। जब गरुड़ अमृत लेकर लौटे तो उन्होंने समुद्र के किनारे अमृत की वर्षा कर दी। अमृत के प्रभाव से वहां पड़े नागों के कंकाल भी जीवित हो उठे। इस प्रकार सभी नागों को गरुड़ के भय से हमेशा के लिए मुक्ति मिल गई।
जीमूतवाहन को मिला अक्षय यश
जीमूतवाहन के इस महान त्याग और परोपकार से नागलोक में आनंद छा गया। ऐसा प्रतीत हुआ मानो पूरा नागलोक अपने रक्षक के दर्शन के लिए वहां एकत्र हो गया हो। जीमूतवाहन के माता-पिता, पत्नी और सभी संबंधी अत्यंत प्रसन्न हुए। नागराज शंखचूड़ भी उनके प्रति कृतज्ञ होकर नागलोक लौट गया। जीमूतवाहन के त्याग और परोपकार की कीर्ति तीनों लोकों में फैल गई।
माता गौरी की कृपा से उनके विरोधी रहे संबंधियों के मन का वैर भी समाप्त हुआ। इसके बाद जीमूतवाहन अपनी पत्नी मलयवती और प्रिय मित्र मित्रावसु के साथ अपनी प्राचीन राजधानी लौट गए, बाद में उन्होंने लंबे समय तक विद्याधरों के चक्रवर्ती राजा के रूप में राज्य किया। जीमूतवाहन की कृपा के कारण ही एक वृद्ध माता का पुत्र बच पाया। इस कारण जो भी मां जितिया व्रत रखती है और इस दिन जीमूतवाहन की इस कथा पढ़ती या सुनती है, उसकी संतान भी दीर्घायु हो जाती है।
॥ इति श्री जीवित्पुत्रिका व्रत कथा सम्पूर्ण ॥
