Guru Tara Ast 2026 : वैदिक ज्योतिष में बृहस्पति यानी गुरु को देवताओं का गुरु माना गया है। इन्हें धर्म, ज्ञान, विवाह, संतान, संस्कार और सभी प्रकार के शुभ व मांगलिक कार्यों का मुख्य कारक ग्रह माना जाता है। जब भी सौरमंडल में गुरु ग्रह सूर्य के अत्यधिक निकट पहुंच जाते हैं, तो सूर्य के तीव्र प्रकाश के कारण उनका तेज दिखाई देना बंद हो जाता है।
गुरु तारा हुए अस्त
ज्योतिष शास्त्र में इसी खगोलीय स्थिति को 'गुरु अस्त', 'गुरु तारा अस्त' या 'गुरु मौढ्य' कहा जाता है। वर्ष 2026 में यह महत्वपूर्ण ज्योतिषीय घटना 15 जुलाई की शाम 7 बजकर 59 मिनट पर होने जा रही है। इसके बाद गुरु देव लगभग 28 दिनों तक अस्त अवस्था में रहने के बाद 12 अगस्त की सुबह 5 बजकर 3 मिनट पर दोबारा उदय होंगे।
बन रहा है गुरु अस्त और देवशयनी एकादशी का दुर्लभ संयोग
इस वर्ष गुरु अस्त की यह अवधि धार्मिक दृष्टि से बेहद अनूठी और विशेष महत्व रखने वाली है। इसका कारण गुरु अस्त होने के ठीक दस दिन बाद यानी 25 जुलाई 2026 को देवशयनी एकादशी पड़ना है। सनातन धर्म में देवशयनी एकादशी का बड़ा महत्व है क्योंकि इसी दिन से भगवान विष्णु चार महीनों के लिए योगनिद्रा में चले जाते हैं और चातुर्मास का आरंभ होता है। ऐसे में इस साल गुरु अस्त और चातुर्मास का यह संयोग एक साथ बन रहा है, जिससे मुहूर्त शास्त्र के नियमों के अनुसार मांगलिक कार्यों पर दोहरी रोक लग जाएगी।
क्या है गुरु का अस्त होना
ज्योतिष शास्त्र और प्राचीन ग्रंथों में किसी ग्रह के अस्त होने का अर्थ उसकी भौतिक शक्ति का समाप्त होना बिल्कुल नहीं है, बल्कि इसका सीधा संबंध पृथ्वी से उसके दृश्यमान तेज और प्रभाव से है। जब गुरु सूर्य के बहुत पास आते हैं, तो सूर्य की रश्मियां उनके प्रभाव को ढक लेती हैं। हमारे प्राचीन प्रामाणिक मुहूर्त ग्रंथों जैसे बृहत्संहिता, मुहूर्त चिंतामणि, निर्णय सिंधु और धर्मसिंधु में स्पष्ट रूप से उल्लेख किया गया है कि गुरु और शुक्र के अस्त होने की स्थिति में ब्रह्मांड से मिलने वाली शुभ ऊर्जा कम हो जाती है। यही कारण है कि इस काल को किसी भी प्रकार के नए या मांगलिक कार्यों की शुरुआत के लिए अच्छा नहीं माना गया है।
गुरु अस्त के दौरान नहीं होते हैं ये मांगलिक कार्य
देवगुरु बृहस्पति को विवाह का मुख्य कारक ग्रह माना जाता है, इसलिए उनके अस्त रहने की पूरी अवधि में विवाह, सगाई, वर-वधू का मिलान और शादी-ब्याह से जुड़े तमाम मांगलिक संस्कार पूरी तरह से रोक दिए जाते हैं। ऐसी मान्यता है कि इस समय विवाह करने से वैवाहिक जीवन के शुभ फलों में कमी आ सकती है।
हालांकि, यदि कोई तिथि बहुत पहले से निर्धारित हो या कोई विशेष आपातकालीन परिस्थिति हो, तो स्थानीय परंपराओं या योग्य आचार्यों की विशेष अनुमति से अपवाद हो सकते हैं। इसके अलावा यज्ञोपवीत (उपनयन), विद्यारंभ और दीक्षा जैसे प्रमुख वैदिक संस्कारों के लिए भी पंचांगों में इस दौरान कोई मुहूर्त नहीं दिया जाता है।
नए घर में प्रवेश करना या दीर्घकालिक सुख-समृद्धि के लिए की जाने वाली वास्तु पूजा भी इस काल में टाल दी जाती है। इसके साथ ही नया व्यापार शुरू करना, किसी प्रतिष्ठान या कलश की स्थापना जैसे स्थायी कार्यों की शुरुआत भी वर्जित मानी जाती है।
धर्मशास्त्र और मुहूर्त ग्रंथों में केवल नए मांगलिक और बड़े संस्कारों को स्थगित करने बात कही गई है। इस दौरान दैनिक पूजा-पाठ, मंत्रों का जप, दान-पुण्य, नियमित अध्ययन, नौकरी, व्यापारिक लेन-देन, खेती-बाड़ी, यात्राएं, चिकित्सा से जुड़े कार्य, परीक्षाएं और सरकारी काम पहले की तरह ही सामान्य रूप से चलते रहते हैं। इन पर किसी भी प्रकार का कोई प्रतिबंध या पाबंदी लागू नहीं होती है।
गुरु उदय के बाद भी क्यों नहीं शुरू होंगे विवाह कार्य
इस वर्ष एक और महत्वपूर्ण बात यह है कि 12 अगस्त को जब गुरु देव का उदय हो जाएगा, तब भी तुरंत शादियों की शहनाइयां नहीं गूंजेंगी। इसका मुख्य कारण 25 जुलाई से शुरू हो रहा चातुर्मास है। शास्त्रों के नियमों के अनुसार, जब भगवान विष्णु योगनिद्रा में होते हैं, तब भी विवाह जैसे मांगलिक कार्य स्थगित रखे जाते हैं। इस कारण इस बार गुरु के उदय होने के बाद भी श्रद्धालुओं को मांगलिक कार्यों की शुरुआत के लिए चातुर्मास की समाप्ति यानी देवउठनी एकादशी तक का इंतजार करना होगा।
गुरु अस्त में करें ये काम
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार यह 28 दिनों का समय बाहरी तड़क-भड़क वाले आयोजनों की बजाय आत्मचिंतन, ज्ञानार्जन और गहरी आध्यात्मिक साधना के लिए सबसे उत्तम माना गया है। इस अवधि में भगवान विष्णु और देवगुरु बृहस्पति की विशेष आराधना करनी चाहिए। इस समय में विष्णु सहस्रनाम का पाठ करना, 'ॐ बृं बृहस्पतये नमः' मंत्र का नियमित जप करना, चने की दाल या केले जैसी पीली वस्तुओं का दान करना, ब्राह्मणों व जरूरतमंदों की निस्वार्थ सेवा करना बेहद फलदायी होता है। ज्योतिषीय दृष्टि से इसका प्रभाव हर व्यक्ति की व्यक्तिगत कुंडली और ग्रहों की दशा पर अलग हो सकता है, लेकिन सार्वजनिक रूप से यह काल अशुभ नहीं, बल्कि आत्मिक शुद्धि का एक पवित्र काल है।
डिसक्लेमर: यहां दी गई जानकारी ज्योतिष शास्त्र पर आधारित है और ज्योतिष विद्या के अच्छे जानकार लेखक द्वारा विश्लेषण करके दी गई है। यह केवल सूचना के लिए दी जा रही है। आपके ऊपर इसका प्रभाव आपकी व्यक्तिगत जन्मकुंडली में ग्रहों की स्थिति और महादशाओं पर भी निर्भर करेगा। Times Now Navbharat इसकी पुष्टि नहीं करता है।
