Gangapur Puja Time, Vidhi 2026 (गणगौर पूजा मुहूर्त, विधि) LIVE: गणगौर के पूजा गीत, आज गणगौर का पूजा टाइम, गणगौर के फोटोज - यहां देखें इस पर्व की सारी जानकारी
गणगौर की पूजा सामग्री
- माता गौरी और भगवान शिव (ईसर-गौरी) की मिट्टी या लकड़ी की प्रतिमा
- पूजा की चौकी और साफ लाल या पीला कपड़ा
- कलश (जल से भरा हुआ) और आम/आशोक के पत्ते
- रोली (कुमकुम), हल्दी और अक्षत (चावल)
- मेहंदी (हाथों पर लगाने और अर्पित करने के लिए)
- फूल (खासकर ताजे और सुगंधित) और फूलों की माला
- धूप, दीप (दीया) और अगरबत्ती
- घी या तेल (दीपक जलाने के लिए)
- नारियल
- फल (मौसमी फल)
- मिठाई (घर की बनी या बाजार की)
- श्रृंगार सामग्री (चूड़ी, बिंदी, सिंदूर, काजल, चुनरी आदि)
- पानी का लोटा और चम्मच (अर्घ्य देने के लिए)
- गेहूं या जौ (पूजन में रखने के लिए)
- पान, सुपारी और इलायची
- लाल धागा (मौली)
- पूजा की थाली
- कपास (बत्ती बनाने के लिए)
- गंगाजल (यदि उपलब्ध हो)
- व्रत कथा की पुस्तक या प्रिंटआउट
गणगौर व्रत में क्या न करें?
- अपशब्द से बचें
- गरीबों को खाली हाथ न जाने दें
- सोने से बचें
- तासमिक आहार से बचें
गणगौर व्रत का महत्व
मान्यता है की इस व्रत के दौरान केवल एक समय भोजन करने का विधान होता है। सुहागिन महिलाएं अपनी पति की लंबी आयु के लिए यह व्रत विधि-विधान से करती हैं। इस दिन महिलाएं सोलह श्रृंगार करती हैं और भगवान शिव व माता पार्वती से खुशहाल वैवाहिक जीवन की कामना करती हैं। ऐसी मान्यता है की चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को व्रत व शिवजी-पार्वती माता की पूजा करने से दांपत्य जीवन मधुर बना रहता है। इसे गौरी तृतीया के नाम से भी जाना जाता है। यह व्रत मुख्य तौर पर राजस्थान, मध्य प्रदेश, राजस्थान और उत्तर प्रदेश की सीमा से लगने वाले शहरों में मनाया जाता है।गणगौर व्रत 2026 पूजा विधि
- इस दिन सुबह जल्दी उठकर स्नानादि करें और साफ वस्त्र धारण कर लें।
- गणगौर व्रत की पूजा करने के लिए भगवान शिव और माता पार्वती की मूर्ति मिट्टी से बनाई जाती है।
- पूजा घर में चारों ओर गंगाजल का छिड़काव करें और सबसे पहले माता पार्वती को रोली, कुमकुम से तिलक लगाएं।
- भगवान शिव का चंदन से तिल करें और घी का दीपक अवश्य जलाएं।
- माता पार्वती को वस्त्र व श्रृंगार का सामान अर्पित करें। इसके बाद, फल, मिठाई आदि का भोग लगाएं। साथ ही, दूर्वा भी अर्पित करें।
- भगवान शिव और माता पार्वती की विधि-विधान से पूजा करने के साथ-साथ व्रत कथा का पाठ भी अवश्य करना चाहिए।
ओड़ो कोड़ो- गणगौर के गीत
ओड़ो कोड़ो छ रावलो ये राई चन्दन को रोखये कुण गौरा छै पातला ऐ कुणा माथ ऐ मोल
ईसरदास जी गोरा छ पातला ऐ ब्रह्मा माथे मोल
बाई थारो काई को रूसणो ये काई को सिंगार
बाई म्हारे सोना को रूसणों ऐ मोतिया रो सिंगार
अब जाऊँ म्हारे बाप के ऐ ल्याउली नौसर हार
चौसर हार गढ़ाए ,पाटे पुवाए गोरक सुधों मूंदडो,
गोरा ईसरदास जी ब्रह्मदास जी जोगो मूंदडो,
वाकी रानिया होए बाई बेटिया होए आठ गढ़ाए
पाटे पुवाए गोरक सुधो मूंदडो
गोरा चाँद, सूरज, महादेव पार्वती जोगो मूंदडो
गोरा मालन, माली, पोल्या – पोली जोगो मूंदडो मूंदड़ो,
(इस गीत को गाते समय आपको अपने घर वालों के नाम लेने है )
गणगौर की तिथि 2026
हिंदू पंचांग के अनुसार, इस साल चैत्र महीने के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि 21 मार्च 2026 को सुबह 02 बजकर 30 मिनट पर शुरू होगी। वहीं, इसका समापन इसी दिन रात में 11 बजकर 56 मिनट पर हो जाएगा। पंचांग को देखते हुए 21 मार्च दिन शनिवार को गणगौर व्रत किया जा रहा है।गणगौर पूजा मंत्र
'ॐ ह्रीं गौरीपतये स्वाहा' मंत्र का जाप देवी गौरी को फूल, हल्दी, कुमकुम और पवित्र जल अर्पित करते समय करना है।गणगौर पूजा सामग्री लिस्ट
- लकड़ी की चौकी
- तांबे का कलश
- गणगौर माता की प्रतिमा
- दो मिट्टी के बर्तन
- मिट्टी के दीये
- काली मिट्टी या होली की राख
- कुमकुम
- चावल
- पूजा थाली
- फूल
- घास
- दो मिट्टी के कुंडे/गमले
- हल्दी
- मेहन्दी
- गुलाल
- अबीर
- मिठाई
- चावल
- मूंग
- माता की चुनरी
- काजल
- लाल या पीले रंग का कपड़ा
- घी
- आम के पत्ते
- पानी से भरा बर्तन
- पान के पत्ते
- बेताल और अशोक चले जाते हैं
- गणगौर के कपड़े
- गेहूं
- लकड़ी की टोकरी
- नारियल
गणगौर पर पति को डंडे से क्यों पीटती है पत्नियां?
गणगौर पूजा पर पत्नियां एक ओर जहां पति की लंबी आय़ु के लिए व्रत रखती हैं तो वहीं दूसरी ओर डंडे लाठी से उनकी पिटाई भी करती हैं। इस रस्म के पछे स्थानीय लोगों की गहरी आस्था भी जुड़ी है। परंपरा के अनुसार, गुड़ तोड़ने की प्रथा है, जिसके लिए एक ऊंची लकड़ी के सिरे में नारियल या गुड़ लगी पोटली को बांधा जाता है। इस पोटली को पतियों की टोली को लेना होता है। वहीं दूसरी ओर महिलाएं पुरुषों को पोटली लेने से रोकती है। पोटली लेने से रोकने के लिए पत्नियां इमली के पेड़ की लकड़ी से मारती है। अपने बचाव के लिए पुरुष भी ढाल का इस्लेमाल करते हैं। खेल की यह प्रकिया पूरे सात बार होती है, जिसमें पुरुषों को चोट भी लगती है। स्थानीय लोगों की मान्यता है कि, पतियों को लगा चोट माता का आशीर्वाद होता है।म्हारा हरया ए ज्वारा ऐ, गेन्हूला सरस बध्या गीत
म्हारा हरया ए ज्वारा ऐ, गेन्हूला सरस बध्यागोरा ईसरदास जी रा बायां ऐ वाकी रानी सींच लिया
गोरा ब्रह्मदास जी रा बायां ऐ वाकी रानी सींच लिया
वे तो सींच न जाने ये आड़ा ऊबा सरस बध्या
बाई रो सरस पोटलों ये, गेंहूडा सरस बध्या
म्हारा हरिया ए ज्वारा ये गेन्हुला सरस बध्या
गोरा चाँद सूरज बाया ये वाकी रानी सींच लिया
वे तो सींच न जाने ये आड़ा ऊबा सरस बध्या
बाई रो सरस पोटलो ये गेन्हुला सरस बध्या
मालीदास जी, पोलीदास जी बाया ऐ वाकी रानी सींच लिया
वे तो सींच न जाने ये आड़ा ऊबा सरस बध्या
(यहां आपको सभी घर वालों के नाम लेने हैं )
गणगौर व्रत की कथा
एक समय की बात है भगवान शिव और देवी पार्वती नारद मुनि के साथ पृथ्वी भ्रमण पर आए। संयोग से वह चैत्र मास की शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि थी। माता पार्वती ने भगवान शिव से अनुमति लेकर नदी में स्नान करने का निश्चय किया। स्नान के पश्चात माता पार्वती ने नदी के किनारे बालू से एक पार्थिव शिवलिंग बनाया और पूरी श्रद्धा एवं विधि-विधान के साथ उसका पूजन किया। पूजन में माता ने बालू से बने पदार्थों का भोग अर्पित किया और उसी में से थोड़े कणों को प्रसाद के रूप में ग्रहण किया।पूजन के बाद उन्होंने विधिपूर्वक प्रदक्षिणा की और पूरे विधि विधान के साथ पूजा संपन्न की। माता पार्वती की भक्ति और समर्पण से भगवान शिव अत्यंत प्रसन्न हुए और उसी पार्थिव शिवलिंग से प्रकट होकर उन्हें वरदान दिया। भगवान शिव ने कहा कि इस दिन जो स्त्री उनका पूजन और माता पार्वती का व्रत करेगी, उसके पति को लंबी आयु और सुखमय वैवाहिक जीवन मिलेगा। साथ ही वह स्त्री अंततः मोक्ष को प्राप्त होगी। यह वरदान देकर भगवान शिव वहां से अंतर्ध्यान हो गए।
पूजा में समय लग जाने के कारण माता पार्वती लौटने में थोड़ी देर हो गईं। जब वे भगवान शिव के पास पहुंचीं, तो वहां देवर्षि नारद भी उपस्थित थे। भगवान शिव ने उनसे देरी का कारण पूछा। माता पार्वती ने विनम्रता से उत्तर दिया कि नदी किनारे उनके मायके के लोग मिल गए थे। उन्होंने आग्रह करके माता को दूध-भात ग्रहण करने और थोड़ी देर विश्राम करने को कहा।
भगवान शिव ने मुस्कुराते हुए कहा कि वे भी उस भोजन का स्वाद लेना चाहते हैं और तुरंत नदी की ओर चल पड़े। माता पार्वती मन ही मन चिंतित हो गईं और भगवान शिव से प्रार्थना करने लगीं कि वे उनकी प्रतिष्ठा और व्रत की रक्षा करें।
नदी तट पर पहुंचने पर माता पार्वती ने एक विशाल और भव्य महल देखा। महल में प्रवेश करने पर उनके भाई-भौजाई और कुटुम्ब जन वहां उपस्थित थे। उन्होंने भगवान शिव का भव्य सत्कार किया और उनकी स्तुति की। प्रसन्न होकर भगवान शिव वहां दो दिन तक रुके। तीसरे दिन माता पार्वती ने शिव जी से आग्रह किया कि अब उन्हें लौटना है, लेकिन शिव जी और अधिक समय रुके रहना चाहते थे। माता पार्वती ने अकेले ही वहां से प्रस्थान किया, और अंततः भगवान शिव देवर्षि नारद के साथ उनके पीछे-पीछे चल पड़े।
चलते-चलते भगवान शिव को याद आया कि उन्होंने अपनी माला वहीं छोड़ दी है। माता पार्वती माला लेने जा रही थीं, लेकिन शिव जी ने उन्हें रोकते हुए देवर्षि नारद को भेजा। नारद जी जब नदी किनारे पहुंचे, तो उन्होंने देखा कि वहां कोई महल नहीं है। जगह पर घना जंगल था, जिसमें कई हिंसक जानवर विचरण कर रहे थे। नारद जी यह देखकर आश्चर्यचकित रह गए।
तभी अचानक बिजली चमकी और नारद जी को एक वृक्ष पर भगवान शिव की माला लटकी दिखाई दी। उन्होंने माला उठाई और भगवान शिव को पूरी घटना सुनाई। नारद जी ने आश्चर्य व्यक्त किया कि यह कैसे संभव हुआ कि महल और लोग गायब होकर जंगल में बदल गए।
इस पर भगवान शिव मुस्कुराए और बोले कि यह उनकी नहीं, बल्कि माता पार्वती की लीला है। उन्होंने अपने पूजन और व्रत को गुप्त रखने के लिए यह मायावी दृश्य रचा। माता पार्वती ने विनम्रता से कहा कि यह सब उनकी नहीं, बल्कि भगवान शिव की कृपा से संभव हुआ।
देवर्षि नारद ने माता पार्वती की भक्ति और पतिव्रत धर्म की सराहना करते हुए कहा कि वे पतिव्रताओं में सर्वोत्तम हैं। उनके स्मरण मात्र से स्त्रियों को अटल सौभाग्य प्राप्त होता है। नारद जी ने आगे कहा कि गुप्त पूजन सामान्य पूजा से अधिक फलदायी होता है। जो महिलाएं अपने पति की भलाई और मंगलकामना के लिए गुप्त रूप से पूजा और व्रत करेंगी, उन्हें भगवान शिव का आशीर्वाद मिलेगा। इसी प्रकार जो कन्याएं यह व्रत करेंगी, उन्हें मनचाहा जीवनसाथी मिलेगा।
सूर्य को अर्घ्य देने का गीत
अल खल नदी जाय यो पाणी कहा जायआदो जाती अणया गलया आदो ईसर न्हासी
ईसर थे घरा पदारो गौरा जायो बैटो
अरदा लाओ परदा ल्याओ बन्दर बाल लगाओ
सार कीए सूई भाभी पाट काए तागा
सीम दरजी बेटा ईसर जी का बागा
सीमा लार सीमा आला मोत्या की लड़-जड़ पोउला थे चालो म्हे आवला।
गणगौर को पानी पिलाने का गीत
म्हारी गोर तिसांई जी, राज घटियांरो मुकुट करो।
म्हारी गँवरा पानीडो सो पाय घटियांरो मुकुट करो
म्हारी गवर तिसांई ओ राज घाटयांरो मुकुट करो।
ब्रह्मदास जी रा ईशरदास जी ओ राज घाटयांरो मुकुट करो।
म्हारी गवरा पानीड़ो पिलाय घांटा रो मुकुट करो।
म्हारी गवरा तिसाई ओ राज घांटा रो मुकुट करो।
(यहां आपको बह्मदास जी की जगह अपने पिता और ईशरदास जी की जगह अपने पुत्र का नाम लेना हैं )
गणगौर के गीत
गोर ए गणगौर माता खोल किंवाडीगोर ए गणगौर माता खोल किंवाडी,
बाहर ऊबी थारी पूजन वाली,
पूजो ए पुजावो संइयो कांई-कांई मांगा,
मांगा ए म्हें अन-धन लाछर लिछमी जलहर जामी बाबुल मांगा,
रातां देई मांयड, कान्ह कंवर सो बीरो मांगा, राई (रुक्मणी) सी भौजाई,
ऊंट चढ्यो बहनोई मांगा, चूनडवाली बहना,
पून पिछोकड फूफो मांगा, मांडा पोवण भूवा,
लाल दुमाल चाचो मांगा, चुडला वाली चाची,
बिणजारो सो मामो माँगा, बिणजारी सी मामी,
इतरो तो देई माता गोरजा ए, इतरो सो परिवार,
दे ई तो पीयर सासरौ ए,
सात भायां री जोड
परण्यां तो देई माता पातळा (पति)
ए सारां में सिरदार
गणगौर 2026 फोटो
गणगौर को पानी प्यान का गीत इन हिंदी
म्हारी गोर ती साईं ओ,राज घाट्यांरी मुकुट करो।
ब्रह्मदास बीरा,
ईसरदास राज घाट्यांरी मुकुट करो।
ब्रह्मदासजी रा कानीराम,
राज घाट्यांरी मुकुट करो।
म्हारी गोरां न पाणीड़ा प्याई ओ,
राज घाट्यांरी मुकुट करो।
गणगौर शुभ मुहूर्त 2026
- ब्रह्म मुहूर्त - 05:07 AM से 05:54 AM
- प्रातः सन्ध्या - 05:31 AM से 06:42 AM
- अभिजित मुहूर्त - 12:21 PM से 01:10 PM
- गोधूलि मुहूर्त - 06:48 PM से 07:12 PM
- सायाह्न सन्ध्या - 06:50 PM से 08:01 PM
- अमृत काल - 05:58 PM से 07:27 PM
गणगौर की फोटो
नीव ढलती बेलड़ी जी गणगौर गीत
नीव ढलती बेलड़ी जी,मालन फुलड़ा सा ल्याय, ईसरदास थारो कोटडया जी,
मालन फुलड़ा सा ल्याय, कानीराम थारो आरती जी।
आरतडदात धाम सुपारी लागी डोड़ा स जी,
डोड़ा राज कोट चिणाए, झीलो म्हारी चूनड़ी जी।
गायां जाई छ ठाणम जी, बहुवां जाई छ साल, झीलो म्हारी चूनड़ी जी,
गायां जाया बाछड़ा जी, बहूवां जाया छ पूत, झीलो म्हारी चूनड़ी जी।
गायां खाया खोपरा जी बहूवां खाई छ सूट, झीलो म्हारी चूनड़ी जी,
गायां क गल घूघरा जी बहूवां कागल हार, झीलो म्हारी चूनड़ी जी।
गोरल जायो द पूत जी कुण खिलायगी जी, खिलासी रोवां ननद झाबर क पालण जी,
आँख मोड़ नाक मोड़ कड़ मोड़ घूमर घाल,बाड़ी न रुन्दल जी।
बाड़ी म लाल किवाड़, झीली म्हारी चूनड़ी जी, आवगा ब्रह्मदासजी रा पूत पाजोव थारी मन राली जी।
माता पार्वती जी की आरती
जय पार्वती माता जय पार्वती माताब्रह्म सनातन देवी शुभ फल कदा दाता।
जय पार्वती माता जय पार्वती माता।
अरिकुल पद्मा विनासनी जय सेवक त्राता
जग जीवन जगदम्बा हरिहर गुण गाता।
जय पार्वती माता जय पार्वती माता।
सिंह को वाहन साजे कुंडल है साथा
देव वधु जहं गावत नृत्य कर ताथा।
जय पार्वती माता जय पार्वती माता।
सतयुग शील सुसुन्दर नाम सती कहलाता
हेमांचल घर जन्मी सखियन रंगराता।
जय पार्वती माता जय पार्वती माता।
शुम्भ निशुम्भ विदारे हेमांचल स्याता
सहस भुजा तनु धरिके चक्र लियो हाथा।
जय पार्वती माता जय पार्वती माता।
सृष्टि रूप तुही जननी शिव संग रंगराता
नंदी भृंगी बीन लाही सारा मदमाता।
जय पार्वती माता जय पार्वती माता।
देवन अरज करत हम चित को लाता
गावत दे दे ताली मन में रंगराता।
जय पार्वती माता जय पार्वती माता।
श्री प्रताप आरती मैया की जो कोई गाता
सदा सुखी रहता सुख संपति पाता।
जय पार्वती माता मैया जय पार्वती माता।
ओड़ो कोड़ो- गणगौर के गीत
ओड़ो कोड़ो छ रावलो ये राई चन्दन को रोखये कुण गौरा छै पातला ऐ कुणा माथ ऐ मोल
ईसरदास जी गोरा छ पातला ऐ ब्रह्मा माथे मोल
बाई थारो काई को रूसणो ये काई को सिंगार
बाई म्हारे सोना को रूसणों ऐ मोतिया रो सिंगार
अब जाऊँ म्हारे बाप के ऐ ल्याउली नौसर हार
चौसर हार गढ़ाए ,पाटे पुवाए गोरक सुधों मूंदडो,
गोरा ईसरदास जी ब्रह्मदास जी जोगो मूंदडो,
वाकी रानिया होए बाई बेटिया होए आठ गढ़ाए
पाटे पुवाए गोरक सुधो मूंदडो
गोरा चाँद, सूरज, महादेव पार्वती जोगो मूंदडो
गोरा मालन, माली, पोल्या – पोली जोगो मूंदडो मूंदड़ो
गणगौर के गीत
म्हारा हरया ए ज्वारा ऐ, गेन्हूला सरस बध्यागोरा ईसरदास जी रा बायां ऐ वाकी रानी सींच लिया
गोरा ब्रह्मदास जी रा बायां ऐ वाकी रानी सींच लिया
वे तो सींच न जाने ये आड़ा ऊबा सरस बध्या
बाई रो सरस पोटलों ये, गेंहूडा सरस बध्या
म्हारा हरिया ए ज्वारा ये गेन्हुला सरस बध्या
गोरा चाँद सूरज बाया ये वाकी रानी सींच लिया
वे तो सींच न जाने ये आड़ा ऊबा सरस बध्या
बाई रो सरस पोटलो ये गेन्हुला सरस बध्या
मालीदास जी, पोलीदास जी बाया ऐ वाकी रानी सींच लिया
वे तो सींच न जाने ये आड़ा ऊबा सरस बध्या
(यहां आपको सभी घर वालों के नाम लेने हैं )
सूर्य को अर्घ्य देने का गीत
अल खल नदी जाय यो पाणी कहा जायआदो जाती अणया गलया आदो ईसर न्हासी
ईसर थे घरा पदारो गौरा जायो बैटो
अरदा लाओ परदा ल्याओ बन्दर बाल लगाओ
सार कीए सूई भाभी पाट काए तागा
सीम दरजी बेटा ईसर जी का बागा
सीमा लार सीमा आला मोत्या की लड़-जड़ पोउला थे चालो म्हे आवला।
गणगौर को पानी पिलाने का गीत
म्हारी गोर तिसांई जी, राज घटियांरो मुकुट करो।
म्हारी गँवरा पानीडो सो पाय घटियांरो मुकुट करो
म्हारी गवर तिसांई ओ राज घाटयांरो मुकुट करो।
ब्रह्मदास जी रा ईशरदास जी ओ राज घाटयांरो मुकुट करो।
म्हारी गवरा पानीड़ो पिलाय घांटा रो मुकुट करो।
म्हारी गवरा तिसाई ओ राज घांटा रो मुकुट करो।
(यहां आपको बह्मदास जी की जगह अपने पिता और ईशरदास जी की जगह अपने पुत्र का नाम लेना हैं )
गणगौर पूजा सामग्री लिस्ट
- तांबे का कलश
- काली मिट्टी या होली की राख
- गणगौर माता की प्रतिमा
- दो मिट्टी के बर्तन
- मिट्टी के दीये
- कुमकुम
- चावल
- हल्दी
- मेहंदी
- गुलाल
- अबीर
- काजल
- लकड़ी की चौकी/बाजोट/पाटा
- लाल या पीले रंग का कपड़ा
- घी
- पूजा थाली
- फूल
- घास
- दो मिट्टी के कुंडे/गमले
- आम के पत्ते
- पानी से भरा बर्तन
- पान के पत्ते
- बेताल और अशोक के पत्ते
- गणगौर के कपड़े
- गेहूं
- लकड़ी की टोकरी
- नारियल
- मिठाई
- चावल
- मूंग
- माता की चुनरी
गणगौर व्रत का महत्व
यह पर्व केवल विवाहित महिलाओं के लिए ही नहीं, बल्कि अविवाहित लड़कियों के लिए भी विशेष महत्व रखता है। वे अच्छे वर की प्राप्ति के लिए माता गौरी से प्रार्थना करती हैं। यह कथा हमें सिखाती है कि सच्ची भक्ति, समर्पण और प्रेम ही जीवन में सबसे बड़ा सौभाग्य है। गणगौर का यह पर्व आज भी उसी आस्था और विश्वास के साथ मनाया जाता है, जहां हर महिला माता गौरी से अपने सुहाग की लंबी उम्र और सुख-समृद्धि की कामना करती है।गणगौर की कथा
गणगौर की कहानी उस समय की है जब भगवान शिव, माता पार्वती और नारद मुनि पृथ्वी भ्रमण के लिए निकले थे। संयोग से वह दिन चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि थी, जिसे गौरी तृतीया या गणगौर भी कहा जाता है। जब गांव वालों को उनके आगमन की खबर मिली, तो पूरे गांव में उत्साह की लहर दौड़ गई। सबसे पहले गांव की निर्धन महिलाएं जल, फूल और फल लेकर शिव-पार्वती की सेवा में पहुंचीं। उनके पास भले ही भौतिक साधन कम थे, लेकिन उनकी भक्ति और श्रद्धा अपार थी। उनकी सच्ची सेवा देखकर माता पार्वती भाव-विभोर हो गईं। उन्होंने अपने हाथों से जल लेकर उन महिलाओं पर 'सुहाग रस' छिड़कते हुए आशीर्वाद दिया कि उनका सुहाग सदा अटल रहेगा। इसके कुछ देर बाद गांव की धनी महिलाएं भी तरह-तरह के पकवान और भेंट लेकर वहां पहुंचीं। यह देखकर भगवान शिव ने मुस्कुराते हुए माता पार्वती से कहा “आप तो सारा सुहाग रस पहले ही बांट चुकी हैं, अब इन्हें क्या देंगी?” इस पर माता पार्वती ने गूढ़ भाव से उत्तर दिया “जो निर्धन महिलाएं थीं, उन्हें मैंने बाहरी सुहाग दिया है, लेकिन इन महिलाओं को मैं अपने समान सौभाग्य का आशीर्वाद दूंगी।” यह कहकर माता पार्वती ने अपनी उंगली से रक्त की बूंदें निकालकर उन महिलाओं पर छिड़क दीं। मान्यता है कि जिस महिला पर जितनी बूंदें गिरीं, उसे उतना ही अखंड सौभाग्य प्राप्त हुआ। इस तरह माता ने भक्ति के अनुसार सभी को सुहाग का वरदान दिया। इसके बाद माता पार्वती स्नान के लिए नदी तट पर गईं। वहां उन्होंने बालू से एक शिवलिंग बनाकर उसकी विधि पूर्वक पूजा की। उनकी श्रद्धा से प्रसन्न होकर स्वयं भगवान शिव उस शिवलिंग से प्रकट हुए और बोले “जो भी स्त्री इस तिथि को श्रद्धा से मेरी और गौरी की पूजा करेगी, उसे अखंड सौभाग्य प्राप्त होगा।” कथा में एक रोचक मोड़ तब आता है जब माता पार्वती वापस लौटने में देर कर देती हैं और भगवान शिव उनसे कारण पूछते हैं। माता मुस्कुराकर कहती हैं कि उन्हें नदी किनारे अपने भाई-भाभी मिल गए थे, जिन्होंने उनका आतिथ्य किया। भगवान शिव उनकी बात समझ जाते हैं, लेकिन लीला को आगे बढ़ाते हुए वे खुद भी उनसे मिलने की इच्छा जताते हैं। जब वे नदी तट पर पहुंचते हैं, तो वहां एक भव्य महल और पार्वती के “भाई-भाभी” दिखाई देते हैं। कुछ समय वहां बिताने के बाद जब वे लौटते हैं, तो शिवजी अपनी माला वहीं भूल जाने का बहाना करते हैं और नारद मुनि को उसे लाने भेजते हैं। नारद मुनि जब वापस उस स्थान पर पहुंचते हैं, तो वहां न कोई महल होता है और न ही कोई व्यक्ति वहां सिर्फ जंगल और एक पेड़ पर लटकी शिवजी की माला। यह देखकर वे आश्चर्यचकित हो जाते हैं। जब वे माला लेकर लौटते हैं और यह बात बताते हैं, तो शिव और पार्वती मुस्कुरा उठते हैं। तब नारद जी को स्पष्ट होता है कि यह सब एक दिव्य माया थी, जो प्रेम, विश्वास और लीला का अद्भुत उदाहरण है।गणगौर माता की आरती
आरती कीजिए गणगौर ईसर जी कीगौरी शंकर शिव पार्वती की -2
देसी घी को दीप जलायो
तोड़ तोड़ फूलडा हार बनायो
लाला फूला की थाने हार पहनायो
आरती कीजिए.........
महिमा थारी सब कोई गावे
खीर ढोकला को भोग लगावे
भंडार उसके भर देते हो
आरती कीजिए.......
ईसर म्हारा छैल छबीला
गोरा म्हारी रूप की रानी
सुंदर जोड़ी पर वारी वारी जाऊं
आरती कीजिए..............
जो कोई आपकी शरण में आवे
सर्व सुहाग परम पथ पावे
आरती कीजिए..........
गणगौर शोभायात्रा क्या है
गणगौर पर्व के अंतिम दिन यानी चैत्र शुक्ल की तृतीया पर प्रतिमाओं की यात्रा निकाली जाती है। इसे बड़े उत्साह और धूमधाम से मनाते हैं।क्या अविवाहित लड़कियां भी गणगौर करती हैं
हां, वे अच्छे वर की कामना के लिए व्रत रखती हैं। यह उनके लिए भी उतना ही महत्वपूर्ण माना जाता है।गणगौर पूजा क्यों की जाती है?
गणगौर को प्रेम और समर्पण का पर्व माना जाता है। गणगौर का व्रत और पूजन मुख्य रूप से सुखी वैवाहिक जीवन और अच्छे वर की प्राप्ति के लिए किया जाता है।गणगौर क्या है?
यह माता गौरी और भगवान शिव की पूजा का प्रमुख पर्व है। यह दांपत्य सुख और प्रेम का प्रतीक माना जाता है।क्या आज 21 मार्च को गणगौर है
गणगौर का पर्व होली के बाद शुरू होता है। मुख्य पूजा का दिन चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया को होता है। पंचांग के अनुसार 21 को यह तिथि है। इस नाते आज गणगौर का पर्व मनाया जा रहा है।नवरात्रि पर कैसे सजाएं घर का मुख्य द्वार, जानिए तोरण, स्वास्तिक से लेकर दीपक जलाने की पूरी विधि
नवरात्रि में किस दिन माता को क्या चढ़ाएं? 9 देवियों के लिए भोग, फूल और मंत्र की पूरी जानकारी
आ गए इन 4 राशियों के अच्छे दिन, अपने नक्षत्र में पहुंच गए शनिदेव
नवरात्रि के 9 दिन मोटा लाभ कमाएंगे इन 6 राशियों के लोग, ग्रहों की स्थिति बना रही है शुभ योग
Aaj Kaun Si Amavasya Hai: आज अमावस्या कितने बजे तक है, 10 अक्टूबर 2026 को कौन सी अमावस्या है, सर्वपितृ अमावस्या की पूजा का मुहूर्त क्या है
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