Jagannath Rath Yatra: छेरा पहरा की रस्म क्या है, रथ यात्रा में गजपति महाराज क्यों लगाते हैं सोने की झाड़ू? जानिए खास सेवा का महत्व

Jagannath Rath Yatra: जगन्नाथ रथ यात्रा में होने वाली छेरा पहरा की रस्म क्या है? गजपति महाराज सोने की झाड़ू यानी कनक मार्जनी से रथ क्यों साफ करते हैं, यह परंपरा कब होती है, इसका इतिहास, कांची अभियान की लोककथा और धार्मिक महत्व क्या है? आसान भाषा में जानिए पूरी जानकारी।

Jagannath Rath Yatra: पुरी की जगन्नाथ रथ यात्रा की पहचान केवल भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और देवी सुभद्रा के विशाल रथों से नहीं है, बल्कि इससे जुड़ी सदियों पुरानी परंपराओं से भी है। इनमें सबसे खास रस्म है 'छेरा पहरा' (chhera pahara), जिसे देखने के लिए लाखों श्रद्धालु हर साल इंतजार करते हैं। इस रस्म में ओडिशा के गजपति महाराज स्वयं भगवान के रथों पर सोने की झाड़ू लगाते हैं। पहली नजर में यह दृश्य किसी को भी हैरान कर सकता है कि एक राजा झाड़ू क्यों लगा रहा है। लेकिन जब इसके पीछे छिपे इतिहास, परंपरा और आध्यात्मिक संदेश को समझते हैं, तब पता चलता है कि यह केवल एक रस्म नहीं, बल्कि सेवा, विनम्रता और समानता का जीवंत प्रतीक है। आइए जानते हैं कि छेरा पहरा क्या है, इसमें क्या-क्या होता है और इसका महत्व इतना बड़ा क्यों माना जाता है।

Jagannath Rath Yatra chhera pahra

भगवान जगन्नाथ के रथ के आगे क्यों राजा लगाते हैं सोने की झाड़ू

छेरा पहरा क्या है और यह रस्म कब होती है

'छेरा पहरा' ओड़िया भाषा का शब्द है। 'छेरा' का अर्थ झाड़ू लगाना और 'पहरा' का मतलब सेवा करना माना जाता है। यह रस्म तब निभाई जाती है, जब भगवान जगन्नाथ, भगवान बलभद्र और देवी सुभद्रा अपने-अपने रथों पर विराजमान हो जाते हैं और रथ यात्रा शुरू होने वाली होती है।

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