Diwali Significance in Hindi: हमारे अधिकांश पर्व-त्योहार हमारे सांस्कृतिक जीवन के अभिन्न हिस्से की तरह अनंत काल से चले आ रहे हैं। उनके संदर्भ में तरह-तरह की पौराणिक कहानियां प्रचलित हैं। दीपावली त्योहार भी उनमें एक है। हम इसे कब से मना रहे हैं, पता नहीं है। 'दीप' शब्द का अर्थ है दीपक और 'आवली' का अर्थ है 'दीपों की पंक्ति'। इसलिए हम कहते हैं कि "दीपावली" दीपों का अर्थात रोशनी का त्योहार है। इस दिन लोग दीपों अथवा दीयों को क्रमबद्ध तरीके से जलाते और सजाते हैं। पहले उन्हें भगवान कृष्ण व अन्य देवताओं को अर्पित करते हैं, फिर अपने घर और घर की चहारदीवारी पर पंक्तियों में सजाते हैं। हिंदू कैलेंडर में दीपावली को त्योहार नववर्ष के रूप में भी मनाया जाता है।
Diwali Signficance in Hindi
दो महत्वपूर्ण प्रागैतिहासिक घटनाएं
दीपावली को लेकर मुख्य रूप से दो पौराणिक कथाएं प्रचलित हैं। एक त्रेता युग की है और दूसरी द्वापर युग की। त्रेता युग की कथा के मुताबिक लंका विजय व वनवास का काल पूरा कर भगवान राम का अयोध्या में प्रवेश के साथ इस त्योहार की शुरुआत हुई थी। श्रीमद् भागवत(9.10.45-46) में भगवान श्रीरामचन्द्र की अयोध्या वापसी का वर्णन करते हुए कहा गया है, भ्रात्राभिनन्दित: सोऽथ सोत्सवां प्राविशत् पुरीम् यानि "तब भगवान रामचन्द्र ने अपने भाई भरत द्वारा स्वागत किए जाने के बाद, अयोध्या नगरी में एक त्योहार के बीच प्रवेश किया।" यह त्योहार आज तक दीपावली के रूप में मनाया जा रहा है। अयोध्या के नागरिक भगवान रामचन्द्र के आगमन से इतने प्रसन्न हुए जैसे वे गहरी नींद से जाग उठे हों। उन्होंने शहर में भगवान का स्वागत करने के लिए सभी गलियों में सजावट की, घरों के सामने रंगोली बनाई और शुभ केले के पौधे से भी सजाए।
भगवान राम के राज में सभी प्रकार के शारीरिक, मानसिक कष्ट, रोग, वृद्धावस्था, शोक, विषाद, भय और थकान पूरी तरह से अनुपस्थित थे। यहां तक कि जो मृत्यु नहीं चाहते थे, उनके लिए मृत्यु नहीं थी। (SB 9.10.53) यही राम राज्य कहलाता है। भगवान रामचन्द्र त्रेतायुग में प्रकट हुए थे। इसका अर्थ है कि दीपावली परंपरा इस संसार में लाखों वर्षों से विद्यमान है। गुरु-शिष्य परंपराओं के कारण यह परंपरा आज भी जीवित है।
दूसरी कथा द्वापर युग की है इसे दामोदर लीला के रूप में याद किया जाता है। हरिवंशम् (विष्णुपर्व 7.36) में इसका वर्णन है, 'स च तेनैव नाम्ना तु कृष्णो वै दामबन्धनात् । येन दाम्ना निबद्धोऽसाव् उदरे सुदृढं व्रजे । घोषे दामोदर इति गोपीभिः परिगीयते ॥'
बाल कृष्ण को यशोदा माता ने एक पीसने वाले ओखल से बांध दिया था। क्योंकि कृष्ण अत्यंत शरारती हो गए थे। दामोदर भगवान कृष्ण का एक और नाम है। नन्हें कृष्ण को दामोदर इसलिये कहा जाता है कि उन्होंने अपनी मां यशोदा के हाथों स्वयं को एक लकड़ी के ओखल से बंधने दिया। "दामा" का अर्थ है रस्सी और "उदरा" का अर्थ है पेट। दामोदर का अर्थ है भगवान कृष्ण, जिनका पेट रस्सी से बंधा हुआ है।
श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर श्रील सनातन गोस्वामी की वैष्णव-तोषणिका से उद्धृत करते हुए कहते हैं कि कृष्ण का दही का बर्तन तोड़ने और मां यशोदा द्वारा ओखल में बंधने की घटना दीपावली के दिन हुई थी, जिसे दीपमालिका भी कहा जाता है। भारत में इस त्योहार को शानदार तरीके से मनाया जाता है। यह त्योहार अब इतना लोकप्रिय हो गया है कि इसे पूरे ग्रह पर बिना भेदभाव के मनाया जाता है।
दीपावली का संदेश
सभी त्योहारों का संबंध भगवान श्री कृष्ण या भगवान श्री रामचन्द्र से है। जब लोग भगवान के साथ इस संबंध को अभिव्यक्त करते हैं, तो वे इन उत्सवों का अत्यधिक लाभ उठाते हैं। जब लोग दीपावली को त्योहार को उसकी सही समझ के साथ मनाते हैं, तो वे आध्यात्मिक रूप से लाभान्वित होते हैं, और भगवान की लीलाओं के प्रति लगाव विकसित करते हैं।
रंगोली का महत्व
भगवान श्री कृष्ण और बलराम ने अवन्ति में संदीपनि मुनी के गुरुकुल में सभी वेदों, कलाओं और कौशलों को उनसे सीखने के लिए प्रवेश किया था। हालांकि वे सर्वज्ञ हैं, लेकिन उन्होंने जीवन में गुरु के पास जाकर और उनसे आध्यात्मिक विज्ञान सीखने का उदाहरण प्रस्तुत किया। श्रीमद भागवत में उल्लेखित है कि उनसे भगवान ने 64 कलाएं और कौशल 64 दिन और रातों में सीखे। आध्यात्मिक गुरु से सीखी गई एक कला और कौशल का नाम तण्डुल-कुसुम-बाली-विकार है, जिसमें चावल और फूलों से फर्श पर शुभ डिज़ाइन बनाए जाते हैं। यह कला चावल और आटे के तरल पेस्ट से फर्श पर चित्र बनाने की प्रक्रिया है। ऐसे चित्र घरों या मंदिरों में किए जाने वाले शुभ समारोहों के दौरान बहुत लोकप्रिय होते हैं। दीपावली के अवसर पर भी इन चित्रों को फर्श पर बनाने की एक परंपरा है। चावल के आटे और अन्य अनाज से बनाए गए ये चित्र रंगोली कहलाते हैं। ये रंगोलियां सर्वोच्च भगवान की प्रसन्नता के लिए बनाई जाती हैं। यह एक बहुत प्राचीन परंपरा है। कल्पना कीजिए, 5000 वर्ष पूर्व, कृष्ण और बलराम ने अपने गुरु से इस कला और कौशल को सीखा था।
दीपावली कैसे मनाएं
- यशोदा दामोदर को घी का दीपक अर्पित करें और घर के सामने सुंदर सजावट में ऐसे कई दीपक रखें।
- भगवान श्री रामचन्द्र के अयोध्या में आगमण का उत्सव मनाने के लिए पटाखे फोड़ें और कई दीप और दीये जलाएं।
- घर को साफ करने के बाद घर के सामने रंगोली बनाएं। रंगोली में शुभ चिह्न जैसे कमल, मोर के पंख, बांसुरी आदि बना सकते हैं।
- भगवान कृष्ण को दूध, मक्खन, घी से बनी मीठी वस्तुएं अर्पित करें और फिर उन्हें परिवार के सभी सदस्यों, रिश्तेदारों और पड़ोसियों में बांटें। यह प्रसाद वितरण भगवान कृष्ण को बहुत प्रिय है।
- नए वस्त्र पहनें और भगवान कृष्ण को अर्पित करने के बाद उपहारों का आदान-प्रदान करें।
- भगवान की प्रसन्नता के लिए सोने और नए बर्तन खरीदें।
लेखक: श्री सत्यगौर चंद्र दास (एमटेक- आईआईटी, चेन्नई) वृंदावन चंद्रोदय मंदिर क्षेत्रीय अध्यक्ष, दि अक्षय पात्र फाऊंडेशन
डिस्क्लेमर: इस लेख में लेखक के विचार निजी हैं। टाइम्स नाऊ नवभारत इनकी प्रामाणिकता की पुष्टि नहीं करता है।
