अंधकार से प्रकाश की ओर बढ़ना ही दिवाली का असली महत्व है, यह ज्योति भौतिक नहीं ज्ञान, चेतना और जीवन का पर्याय है

दिवाली का त्योहार मनाते हुए अक्सर यह भाव आता है कि हम इस पर्व को क्यों मनाते हैं। इस त्योहार पर जलने वाले लाखों दीपक क्या दर्शाते हैं। ये भौतिक प्रकाश नहीं बल्कि ज्ञान, चेतना और जीवन का पर्याय है। ये दीपक बताते हैं कि आत्मा की चेतना ही असली रोशनी है। पढ़ें इसी भाव को उजागर करता कमलेश कमल का यह लेख।

दीपावली, दीप-पर्व अथवा दीपोत्सव—सब नाम एक ही सच्चाई की ओर संकेत करते हैं: ज्ञान-ज्योति द्वारा आत्म-ज्योति को जगाने का पर्व। यह केवल एक उत्सव नहीं, बल्कि आत्मप्रकाश की यात्रा है। आध्यात्मिक दृष्टि से दीप का जलना “तमसो मा ज्योतिर्गमय” की युगों-युगों पुरानी प्रार्थना को साकार करता है। ‘दीप’ देह है, ‘तेल’ आत्मा है, ‘बाती’ चेतना है, और ‘ज्योति’ आत्मज्ञान—जो अज्ञान और मिथ्याज्ञान के तम को दूर करती है। मानव तन जब ‘माटी का तन’ कहा गया, तो यह स्वाभाविक है कि दीपावली के दीप भी मिट्टी के ही बनाए जाते हैं— ताकि बाहरी ज्योति के माध्यम से हम भीतर की ज्योति को पहचान सकें।

diwali ka mahatva

दिवाली का असली महत्व (Pic: Canva)

सनातन परंपरा मानती है कि सबसे महत्त्वपूर्ण दीप हम स्वयं हैं। आत्मा के भीतर निहित यह ज्योति ही निःश्रेयस की साधना का लक्ष्य है। इसी भाव को शास्त्रों ने इस प्रकार अभिव्यक्त किया है—

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