पूजा में तांबे के पात्र में ही जल क्यों रखा जाता है? जानिए शास्त्रों के अनुसार क्या है धार्मिक मान्यता

Copper Vessel in Puja: क्या आपने कभी सोचा है पूजा-पाठ में तांबे के लोटे या कलश में ही जल रखने की परंपरा क्यों है? जानिए शास्त्रों में ताम्रपात्र का महत्व और इससे जुड़ी धार्मिक मान्यताएं।

Copper Vessel in Puja: घर की रोज की पूजा हो, मंदिर में आरती हो या फिर कोई बड़ा धार्मिक अनुष्ठान, आपने एक बात जरूर देखी होगी कि जल अक्सर तांबे के लोटे या कलश में ही रखा जाता है। कई लोग इसे सिर्फ पुरानी परंपरा मानते हैं, लेकिन इसके पीछे धार्मिक मान्यताओं के साथ कुछ व्यावहारिक कारण भी बताए गए हैं। यही वजह है कि सदियों बाद भी यह परंपरा आज तक चली आ रही है। आखिर पूजा में स्टील या प्लास्टिक की जगह तांबे का पात्र ही क्यों चुना गया? आइए जानते हैं कि शास्त्र, आयुर्वेद और पारंपरिक मान्यताएं इस बारे में क्या कहती हैं।

Copper Vessel in Puja

पूजा में तांबे के बर्तन में ही जल क्यों रखा जाता है

शास्त्रों में ताम्रपात्र को क्यों मिला विशेष स्थान

सनातन परंपरा में तांबे यानी ताम्र को शुभ और सात्विक धातु माना गया है। पूजा-विधान से जुड़े कई धर्मग्रंथों में देवपूजन, कलश स्थापना, आचमन और अर्घ्य के लिए ताम्रपात्र (tamra patra) के उपयोग का उल्लेख मिलता है। धार्मिक मान्यता है कि तांबा सूर्य और अग्नि तत्व का प्रतीक माना जाता है, इसलिए इससे जुड़े पात्रों का उपयोग पूजा में शुभ माना जाता है। इसी वजह से सूर्य देव को अर्घ्य देने और शिवलिंग पर जल चढ़ाने के लिए भी तांबे के लोटे का इस्तेमाल करने की परंपरा है।

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