Bhagwat Gita Spiritual Quotes In Sanskrit With Hindi Meaning (गीता संस्कृत श्लोक): कई लोग प्रतिदिन गीता का पाठ करते हैं। धार्मिक पुराणों में भी गीता पढ़ने के कई फायदे बताए गए हैं। कहते हैं जो व्यक्ति नियमित रूप से गीता का पाठ करता है उसके जीवन में कभी कोई दुख नहीं आ सकता। गीता के पाठ से मानसिक शांति मिलती है और जीवन की कई परेशानियों से छुटकारा मिल जाता है। गीता नकारात्मक विचारों से दूर रखती है। यहां हम गीता के ऐसे श्लोकों के बारे में बताने जा रहे हैं जो आपको सकारात्मक ऊर्जा से भर देंगे।
Bhagwat Gita Spiritual Quotes In Sanskrit
Bhagwat Gita Spiritual Quotes In Sanskrit (भगवद गीता के श्लोक)
1. श्लोक: कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन। मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि॥
अर्थ- गीता के इस श्लोक में श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि, हे अर्जुन कर्म तुम्हारा अधिकार है लेकिन फल की चिंता करना तुम्हारा अधिकार नहीं है। इसलिए फल की इच्छा छोड़कर कर्म करो।
2. श्लोक: ध्यायतो विषयान्पुंसः सङ्गस्तेषूपजायते। सङ्गात्संजायते कामः कामात्क्रोधोऽभिजायते॥
अर्थ: किसी भी चीज के बारे में ज्यादा सोचने से उस वस्तु से लगाव होता है और उससे जुड़ी इच्छा पैदा होती है।
3. श्लोक: दुरेण ह्यवरं कर्म बुद्धियोगाद्धञ्जय बुद्धौ शरणमन्विच्छ कृपणाः फलहेतवः ||
अर्थ- भगवान कृष्ण भगवद गीता के इस श्लोक में कहते हैं कि, हे अर्जुन बुद्धि, योग और चैतन्यता से बुरे कर्मों से दूर होकर समभाव से ईश्वर की शरण को प्राप्त करो। जो लोग अपने अच्छे कर्मों को भोगने की अभिलाषा करते हैं वह लालची हैं।
4. श्लोक: नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावकः। न चैनं क्लेदयन्त्यापो न शोषयति मारुतः॥
अर्थ- इस श्लोक में कृष्ण आत्मा की अमरता को बताते हुए कहते हैं कि, आत्मा को न आग जला सकती है न पानी भिगो सकता है। इसे न हवा सुखा सकती है और नाही यह शस्त्रों से काटी जा सकती है। यह आत्मा अविनाशी और अमर है।
5. यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत:। अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्॥
अर्थ- कृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि, धरती पर जब भी धर्म का नाश होता है और अधर्म का विकास होता है तब मैं धर्म की रक्षा और अधर्म का नाश करने के लिए अवतार लेता हूं।
6. प्रकृतेः क्रियमाणानि गुणैः कर्माणि सर्वशः । अहंकारविमूढात्मा कर्ताहमिति मन्यते ॥
अर्थ- भगवान कृष्ण कहते हैं कि, हे अर्जुन सारे कर्म प्रकृति के गुणों के अनुसार ही किये जाते हैं। जो मनुष्य यह सोचता है कि मैं करने वाला हूं तो उसका अंत:करण घमंड से भर जाता है और ऐसा मनुष्य अज्ञानी होता है।
7. श्लोक: ध्यायतो विषयान्पुंसः सङ्गस्तेषूपजायते। सङ्गात्संजायते कामः कामात्क्रोधोऽभिजायते॥
अर्थ: किसी भी चीज के बारे में ज्यादा सोचने से उस वस्तु से लगाव होता है और उससे जुड़ी इच्छा पैदा होती है।
8. ध्यान का अर्थ है भीतर से मुस्कुराना और सेवा का अर्थ है इस मुस्कुराहट को औरों तक पँहुचाना।
9. हृदय से जो दिया जा सकता है वो हाथ से नहीं और मौन से जो कहा जा सकता है वो शब्द से नहीं।
10. समय और भाग्य दोनों परिवर्तनशील है इनपर कभी अहंकार नही करना चाहिए।
