Adhikmas 2026: भारतीय सनातन परंपरा में अधिकमास को बेहद पवित्र और पुण्यदायी समय माना गया है। इसे पुरुषोत्तम मास भी कहा जाता है, क्योंकि यह भगवान विष्णु को समर्पित माना जाता है। सामान्य महीनों की तुलना में अधिकमास हर तीन साल में एक बार आता है और धार्मिक दृष्टि से इसका विशेष महत्व होता है। यही वजह है कि इस दौरान मंदिरों, तीर्थस्थलों और धार्मिक यात्राओं में श्रद्धालुओं की संख्या अचानक बढ़ जाती है। आइए जानते हैं अधिकमास (Adhikmas Religious Importance) में क्यों बढ़ जाता है तीर्थ यात्रा का महत्व।
अधिकमास में धार्मिक यात्रा का महत्व
क्यों और कब आता है अधिकमास
हिंदू पंचांग चंद्रमा की गति पर आधारित है, जबकि सौर वर्ष और चंद्र वर्ष में लगभग 11 दिनों का अंतर होता है। दोनों वर्षों के अंतर को बैलेंस करने के लिए लगभग हर 32 महीने बाद एक अतिरिक्त महीना जोड़ा जाता है, जिसे अधिकमास कहा जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार यह समय आत्मशुद्धि, भक्ति और आध्यात्मिक साधना के लिए सबसे श्रेष्ठ माना गया है।
अधिकमास में तीर्थ यात्रा का महत्व
अधिकमास में तीर्थ यात्रा का महत्व इसलिए बढ़ जाता है क्योंकि शास्त्रों में कहा गया है कि इस समय किए गए पुण्य कार्यों का फल कई गुना अधिक मिलता है। धार्मिक मान्यता है कि इस दौरान गंगा स्नान, पवित्र नदियों के दर्शन और प्रमुख धामों की यात्रा करने से व्यक्ति के पापों का नाश होता है और जीवन में सकारात्मक ऊर्जा आती है।
यही कारण है कि अधिकमास के पावन महीने में काशी, प्रयागराज, हरिद्वार, उज्जैन, मथुरा, वृंदावन और जगन्नाथपुरी जैसे धार्मिक स्थलों पर भारी भीड़ देखने को मिलती है। इस महीने में श्रद्धालु केवल दर्शन के लिए नहीं जाते, बल्कि मानसिक शांति और संतुलन पाने के लिए भी इन यात्राओं पर निकलते हैं।
अधिकमास का आध्यात्मिक महत्व
धार्मिक विद्वानों के अनुसार अधिकमास हमें आत्मचिंतन और ईश्वर से जुड़ने का समय देता है। तेजी से बदलती लाइफस्टाइल के बीच भागदौड़ भरी जिंदगी में लोग मानसिक तनाव और अस्थिरता महसूस करते हैं। ऐसे में तीर्थयात्रा उन्हें आंतरिक शांति देती है। इन दिनों में मंदिरों की आरती, भजन-कीर्तन, नदी तटों की शांति और साधु-संतों का सानिध्य मन को सकारात्मकता से भर देता है।
अधिकमास में दान-पुण्य का महत्व
अधिकमास के दौरान तीर्थ यात्रा के साथ दान-पुण्य का भी विशेष महत्व बताया गया है। यही कारण है कि इस महीने में लोग गरीबों को भोजन कराते हैं, वस्त्र दान करते हैं और धार्मिक अनुष्ठानों में भाग लेते हैं। मान्यता है कि इस माह में किया गया दान हमें अगले कई जन्मों तक शुभ फल देता है। यही कारण है कि अधिकमास में हमारे तीर्थ स्थलों पर भंडारे, कथा और सत्संग जैसे आयोजन बड़ी संख्या में होते हैं।
