27 जून 2008.. वह तारीख है जब भारत ने अपने उस पराक्रमी नायक को खो दिया जिसके सामने पाकिस्तान के 90 हजार सैनिकों ने घुटने टेक दिये थे। वो फौजी जो देश के प्रधानमंत्री को भी ना कहने की हिम्मत रखता था। हम बात कर रहे हैं देश के पहले फील्ड मार्शल सैम होर्मूसजी फ्रामजी जमशेदजी मानेकशॉ की। आज उनकी पुण्यतिथि है। वैसे तो भारतीय सेना जांबाज सैनिकों से हमेशा भरी रही, लेकिन सैम मानेकशॉ की बात कुछ अलग थी। वे ऐसे अफसर थे जो सत्ता के सामने सच बोलने से नहीं डरते थे, सैनिकों का मनोबल पढ़ना जानते थे और किसी भी तरह की जंग जीतने से पहले उसे दिमाग में ही जीत लेने की माद्दा रखते थे।
पूरे एशिया का भूगोल बदल देने वाले सैम अपने साहस और पराक्रम से हटकर अपनी हाजिर जवाबी के लिए भी याद किये जाते हैं। उनके हाजिरजवाबी और व्यंग के कई किस्से मशहूर हैं। इन्हीं में से एक किस्सा है जब सैम मानेकशॉ ने पाकिस्तानी दोस्त को मोटरसाइकिल देकर आधा पाकिस्तान 'छीन' लिया था।
सैम की अमेरिकी मोटरसाइकिल
सैम मानेकशॉ आजादी से पहले भी सेना में थे। तब वह ब्रिटिश इंडियन आर्मी में अफसर हुआ करते थे। उनके दोस्तों की लिस्ट लंबी थी। दोस्तों की फेहरिस्त में एक नाम याह्या खान का भी था। याह्या खान भी ब्रिटिश इंडियन आर्मी में अफसर था। दोनों के बीच ठीक-ठाक दोस्ती थी। सैम मानेकशॉ संपन्न परिवार से आते थे। उस जमाने में उन्होंने एक शानदार अमेरिकन मोटरसाइकिल खरीदी थी। सालों वह इसी बाइक से चले।
फील्ड मार्शल सैम मानेकशॉ
हनदी फाल्की ने सैम मानेकशॉ की बायोग्राफी में लिखा है कि 1947 में जब बंटवारा हुआ तब याह्या खान पाकिस्तान चले गए और वहां के सेना प्रमुख बन गए। भारत छोड़ने से ठीक पहले उन्होंने सैम से पूछा कि क्या तुम ये मोटरसाइकिल मुझे बेचोगे? सैम का इच्छा तो नहीं थी कि वह अपनी बाइक बेचें, लेकिन फिर उनके मन में पता नहीं क्या आया कि वो राजी हो गए। रकम तय हुई 1000 रुपये।
याह्या खान ने नहीं दिये 1000 रुपये
सैम मानेकशॉ ने याह्या खान से कहा कि 1000 रुपये दो और ये बाइक लेते जाओ। याह्या खान ने कहा कि फिलहाल मैं ये बाइक ले जा रहा हूं, पैसे दो-चार दिन में आपके पास पहुंच जाएंगे। पाकिस्तान पहुंच याह्या खान अपनी बात से पलट गया। उसने पैसे देने का विचार छोड़ दिया। पहले सैम को लगा कि हजार रुपये की ही तो बात है, आज ना कल याह्या उन्हें दे देगा। लेकिन दिन महीने साल बीतते गए, याह्या ने पैसे नहीं चुकाए। कुछ समय बाद तो सैम भी उन पैसों को भूल गए। हालांकि अपनी बाइक और याह्या खान के धोखे को वो कभी नहीं भूले।
याह्या खान ने नहीं चुकाए बाइक के पैसे (AI Image)
फिर आया साल 1971। अब तक सैम मानेकशॉ भारतीय सेना के प्रमुख बन चुके थे और याह्या खान पाकिस्तान में तख्तापलट कर राष्ट्रपति बन चुका था। हालात ऐसे बने कि भारत-पाक में जंग छिड़ी। सैम मानेकशॉ के नेतृत्व में भारतीय सेना ने पाकिस्तान को घुटनों पर ला दिया। 90 हजार पाकिस्तानी सैनिकों को सैम मानेकशॉ ने बंदी बना लिया। 13 दिन चले इस जंग ने पाकिस्तान के दो टुकड़े कर पूरे एशिया का भूगोल बदल दिया। पूर्वी पाकिस्तान की सरजमीं पर बांग्लादेश का जन्म हुआ।
16 दिसंबर 1971 को जब हार के बाद पाकिस्तानी आर्मी ने भारतीय सेना के सामने सरेंडर किया तब सैम मानेकशॉ ने अपनी मोटरसाइकिल और याह्या खान के धोखे को याद किया। उन्होंने पाकिस्तानी सैनिकों के सामने ही उनके सदर-ए-आजम की चुटकी लेते हुए कहा- भले याह्या खान ने मेरी मोटरसाइकिल के एक हजार रुपये नहीं लौटाए, लेकिन आज उसने आधा पाकिस्तान देकर अपना हिसाब चुका दिया।
सैम ने पीएम से कहा- आप मेरे काम में नाक ना घुसाएं
सैम मानेकशॉ की काबिलियत पर तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा को बहुत भरोसा था। दोनों के बीच अकसर बातें हुआ करती थीं। शुभा सूद ने अपनी किताब फील्ड मार्शल सैम मानेकशॉ में उस घटना का जिक्र किया है जब सैम इंदिरा गांधी से बोल बैठे थे कि आप मेरे काम में नाक ना घुसाएं।
हुआ ये था कि पीएम इंदिरा गांधी को कहीं से ऐसी बात सुनने को मिली कि सैम मानेकशॉ सेना की मदद से सरकार का तख्तापलट कर सकते हैं। ये तो किसी से नहीं छिपा है कि इंदिरा गांधी अपनी सरकार, सत्ता और शक्ति को लेकर कितनी सतर्क रहा करती थीं। बात को गंभीरता से लेते हुए उन्होंने फील्ड मार्शल सैम मानेकशॉ को मीटिंग के लिए बुलाया।
पीएम के सामने भी बेबाक राय रखते थे सैम (AI Image)
इंदिरा गांधी ने बिना लाग लपेट सीधा सवाल किया- सैम, क्या आप मेरी सरकार का तख्तापलट करने की सोच रहे हैं? इस सवाल की सैम को उम्मीद नहीं थी। वो थोड़ी देर शांत रहे और अपने खास बेबाक चुटीले अंदाज में जवाब दिया - आपकी और मेरी, दोनों की नाक लंबी है, आप मेरे काम में अपनी नाक ना घुसाइए, मैं आपके काम में नहीं घुसाऊंगा।
सैम मानेकशॉ का यही अंदाज था। उनकी नजर में जो सही था वो सही थी। सही बात को कहने से वो कभी नहीं डरे। उनका हमेशा से मानना था कि कोई भी सेना तभी जंग में फतह हासिल कर सकती है जब उसे यकीन हो कि उसका कमांडर जीत सकता है। सैम ने अपनी बहादुरी से वो विश्वास जीता था। इसी बहादुरी के कारण देश आज भी सैम मानेकशॉ को सैम बहादुर के नाम से याद करता है।
