कुछ कलाकृतियां ऐसी होती हैं जो आकर्षक होने के साथ ही अपने भीतर ना जाने कितनी ही कहानियां समेटे होती हैं। आंध्र प्रदेश के विजयवाड़ा में चल रहे राष्ट्रीय सरस मेला 2026 में लगी 16 फीट ऊंची आकृति ‘शक्ति’ भी कुछ ऐसी ही है। इसने राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू का भी मन मोह लिया। मेले का उद्घाटन करने पहुंचीं महामहिम काफी देर तक इस आकृति को निहारती रहीं। भारत के विविध रंग, पारंपरिक पहनावे और ग्रामीण महिला की पहचान से सजी यह आकृति मेले में आने वाले हर आम और खास का ध्यान खींच रही है।
सरस मेला 2026 का आयोजन पहली विजयवाड़ा में आयोजित हो रहा है।
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'शक्ति: द स्पिरिट ऑफ लखपति दीदी' नाम की यह इंस्टॉलेशन उन ग्रामीण महिलाओं को समर्पित है, जिनके हाथों का हुनर अब घर की चारदीवारी से निकलकर बाजार तक पहुंच रहा है।
लाखों औरतों की कहानी बयां करती है 'शक्ति'
केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण तथा ग्रामीण विकास मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने टाइम्स नाउ नवभारत से बात करते हुए कहा कि 'शक्ति शब्द अपने आप में बहुत कुछ कहता है। इसका अर्थ ताकत के साथ ही आत्मविश्वास, सामर्थ्य और अपने जीवन की दिशा खुद तय करने का हौसला भी है। इसी विचार को केंद्र में रखकर इस विशाल आकृति की कल्पना की गई है। यह एक ऐसी ग्रामीण महिला का प्रतीक है, जो अपनी पारंपरिक पहचान को सहेजते हुए आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनने की राह पर आगे बढ़ रही है।'
बता दें कि यह आकृति पूरी तरह से ईकोफ्रेंडली है। इसमें अलग-अलग रंग और साइज की चूड़ियों का इस्तेमाल किया गया है। आकृति में दिखने वाली हर चीज हमारे ग्रामीण भारत, संस्कृति और परंपरा का अनूठा संगम है। शिवराज सिंह चौहान ने बताया कि, 'आकृति में नजर आने वाली चूड़ियां, पारंपरिक पहनावा और हस्तनिर्मित थैला केवल सजावट का हिस्सा नहीं हैं। इनमें ग्रामीण भारत की कला, शिल्प और सांस्कृतिक विविधता की झलक दिखाई देती है। भारत के गांवों में पीढ़ियों से महिलाएं बुनाई, कढ़ाई, सिलाई, मिट्टी के काम, लकड़ी की कलाकारी और स्थानीय खाद्य उत्पाद बनाने जैसे हुनर को संभालती आई हैं। ‘शक्ति’ उन्हीं हाथों का प्रतिनिधित्व करती है, जो परंपरा को जिंदा रखने के साथ-साथ उससे आजीविका भी बना रहे हैं।'
इस इंस्टॉलेशन के पीछे छिपे विचार को ग्रामीण महिलाओं के हुनर, उनकी पहचान और बढ़ते आत्मविश्वास से जोड़ते हुए देखा जा रहा है। इसकी 16 फीट की ऊंचाई को उस बदलाव के प्रतीक के तौर पर देखा जा सकता है, जिसमें ग्रामीण महिलाएं अपने काम को पहचान दिलाने और कारोबार बढ़ाने की दिशा में आगे बढ़ रही हैं।
हुनर से कारोबार तक का सफर
ग्रामीण महिलाओं के पास हुनर की कमी कभी नहीं रही। असली चुनौती उस हुनर को नियमित आमदनी में बदलने की रही है। एक महिला सुंदर कपड़ा तैयार कर सकती है, स्वादिष्ट अचार बना सकती है या हाथ से सजावटी सामान बना सकती है। लेकिन इन उत्पादों को बाजार तक पहुंचाने के लिए पूंजी, प्रशिक्षण, सही कीमत, पैकेजिंग और ग्राहकों तक पहुंच जरूरी होती है।
इन्हीं चुनौतियों से निपटने के लिए देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 15 अगस्त 2023 को लाल किले से कहा था कि मेरा सपना गांवों में 2 करोड़ लखपति दीदी बनाने का है। इसके लिए उन्होंने लखपति दीदी योजना का ऐलान किया जिसे ग्रामीण विकास मंत्रालय ने 2024 से शुरू कर दिया।
प्रधानमंत्री के मार्गदर्शन में ग्रामीण विकास मंत्रालय ने तमाम स्वयं सहायता समूहों (सेल्फ हेल्प ग्रुप्स) से जोड़कर ग्रामीण महिलाओं की इन चुनौतियों से निपटने का रास्ता मुहैया कराया। अब ये महिलाएं साथ मिलकर बचत करती हैं, काम शुरू करती हैं और अपने उत्पादों को ग्राहकों तक पहुंचाने की कोशिश करती हैं। इसका उद्देश्य महिलाओं को ऐसी टिकाऊ आजीविका से जोड़ना है, जिससे उनकी सालाना घरेलू आमदनी कम से कम एक लाख रुपये हो सके। इसे लखपति दीदी योजना नाम दिया गया है।
वैसे ग्रामीण विकास मंत्रालय की 'लखपति दीदी योजना' का अर्थ सिर्फ किसी ग्रामीण महिला की कमाई एक निश्चित आंकड़े तक पहुंचाना नहीं है। इसके पीछे बड़ा विचार यह है कि महिलाएं अपने हुनर को कारोबार में बदलें, आमदनी के नए रास्ते खोजें और परिवार के आर्थिक फैसलों में उनकी भूमिका मजबूत हो।
तीन करोड़ लखपति दीदियों का आंकड़ा और आगे का लक्ष्य
लखपति दीदी पहल का दायरा लगातार बढ़ा है। ग्रामीण विकास मंत्रालय, भारत सरकार के मुताबिक वो तीन करोड़ लखपति दीदियां बनाने का लक्ष्य तय समय सीमा से पहले हासिल कर चुकी है। ताजा आंकड़ा 3.5 करोड़ से ऊपर पहुंच चुका है। अब मार्च 2029 तक छह करोड़ लखपति दीदियां बनाने का नया लक्ष्य रखा गया है। यह लक्ष्य ग्रामीण महिलाओं को आजीविका, बाजार और उद्यमशीलता के ज्यादा अवसर उपलब्ध कराने की दिशा में बड़ा कदम है।
सरस मेला बना ग्रामीण उद्यमियों का बड़ा बाजार
बड़ी चुनौती महिलाओं को उनकी आमदनी को टिकाऊ बनाने, कारोबार को आगे बढ़ाने और उनके उत्पादों के लिए स्थायी बाजार तैयार करने की है। राष्ट्रीय सरस मेला इसी चुनौती का समाधान साबित हो रहा है।
पहली बार दिल्ली एनसीआर से बाहर विजयवाड़ा में आयोजित हो रहे राष्ट्रीय सरस मेले में 30 से अधिक राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों की लगभग 1500 महिला स्वयं सहायता समूह उद्यमी और लखपति दीदियां, 650 से अधिक स्टॉलों पर अपने उत्पादों का प्रदर्शन कर रही हैं।
मेले में पारंपरिक हस्तशिल्प, हथकरघा, क्षेत्रीय उत्पादों और अलग-अलग राज्यों के स्वाद देखने को मिल रहे हैं। मेले में ग्रामीण महिलाएं ग्राहकों से सीधे जुड़ने और अपने कारोबार को नए बाजारों तक ले जाने का अवसर भी पा रही हैं। मेले में ब्रांडिंग, पैकेजिंग, मार्केटिंग और कारोबार बढ़ाने से संबंधित मार्गदर्शन की व्यवस्था भी की गई है।
नारी शक्ति की आत्मनिर्भरता का प्रतीक है 'शक्ति'
कुल मिलाकर मेले के बीचोंबीच खड़ी ‘शक्ति’ उन महिलाओं का प्रतीक है, जिनका हुनर लंबे समय तक घर की चारदीवारी के अंदर की दम तोड़ता रहा। अब वही हुनर उनकी आमदनी, पहचान और उद्यमशीलता का आधार बन रहा है। किसी को यह कहने में गुरेज नहीं करना चाहिए कि असल मायने में यह 16 फीट ऊंची आकृति उन सपनों के सच होना है, जो गांवों में पलते हैं और अवसर मिलने पर नए आकार ले सकते हैं।
