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बंगाली दुल्हन शादी के बाद क्यों पहनती हैं सफेद-लाल चूड़ियां? जानिए शाखा-पोला की परंपरा

शाखा-पोला में बंगाल की सांस्कृतिक पहचान, पारिवारिक परंपराएं और विवाह से जुडी मान्यताएं एक साथ दिखाई देती हैं। इनके सफेद और लाल रंग में एक ऐसी विरासत समाई है, जिसे महिलाएं पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ाती आई हैं।

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बंगाली शादी और शाखा पोला की परंपरा (Photo: Pexels)

भारतीय शादियों में दुल्हन के गहनों का खास महत्व होता है। अलग-अलग राज्यों में शादीशुदा महिलाओं के आभूषण और उनसे जुडी परंपराएं भी अलग होती हैं। बंगाल में विवाहित महिलाओं की कलाई पर अक्सर सफेद और लाल रंग की चूड़ियां दिखाई देती हैं। इन्हें शाखा-पोला कहा जाता है। ये चूड़ियां बंगाली हिंदू संस्कृति में शादी, शुभता और पारिवारिक परंपराओं से जुड़ी मानी जाती हैं।

क्या है शाखा-पोला?

शाखा-पोला दो तरह की चूड़ियों का मेल है। इनमें सफेद चूड़ी को ‘शाखा’ और लाल चूड़ी को ‘पोला’ कहा जाता है। परंपरागत रूप से शाखा शंख के खोल से बनाई जाती है, जबकि पोला लाल मूंगे से तैयार की जाती है। हालांकि, आजकल इनके दूसरे मटीरियल से बने विकल्प भी बाजार में मिलते हैं।

बंगाली हिंदू विवाह परंपरा में इन चूड़ियों को खास स्थान हासिल है। शादी के आसपास होने वाली रस्मों के दौरान दुल्हन को इन्हें पहनाया जाता है। परिवार और समुदाय के अनुसार इन्हें पहनाने की रस्म में कुछ अंतर हो सकता है। शादी के बाद भी कई महिलाएं इन्हें अपनी वैवाहिक पहचान के तौर पर पहनती हैं।

सफेद और लाल रंग का क्या है मतलब?

शाखा का सफेद रंग शांति, पवित्रता और शुभता से जोड़ा जाता है। वहीं, पोला का लाल रंग जीवन-शक्ति, समृद्धि और वैवाहिक जीवन की ऊर्जा का प्रतीक माना जाता है। हिंदू परंपराओं में लाल रंग का संबंध शादी, सिंदूर और नई शुरुआत से भी रहा है। बंगाल में सफेद और लाल रंग का यह मेल विवाहित महिलाओं की सांस्कृतिक पहचान का हिस्सा बन गया है।

इतिहासकारों के मुताबिक, इन चूड़ियों का महत्व सिर्फ उनके रंग और बनावट तक सीमित नहीं है। ये पीढ़ियों से चली आ रही पारिवारिक परंपराओं और सामाजिक पहचान को भी दर्शाती हैं।

शंख से चूड़ियां बनाने की परंपरा कैसे जुड़ी?

बंगाल का समुद्री व्यापार और शंख से जुड़ा शिल्प लंबे समय से स्थानीय संस्कृति का हिस्सा रहा है। कारीगर शंख के खोल को काटकर और तराशकर चूड़ियां बनाते थे। धीरे-धीरे शंख से बनी सफेद चूड़ियां बंगाली हिंदू विवाह परंपरा से जुड़ गईं। लाल पोला के साथ इनका जोडा एक खास पहचान बन गया।

इन चूड़ियों के पीछे कारीगरों की मेहनत और पारंपरिक शिल्प-कला की कहानी भी छिपी है। शंख को चूड़ी का आकार देना आसान काम नहीं होता। इसके लिए हुनर, धैर्य और बारीक कारीगरी की जरूरत होती है।

क्या हर बंगाली विवाहित महिला पहनती है ये चूड़ियां?

शाखा-पोला बंगाली हिंदू संस्कृति में खास जगह रखती है, लेकिन इसे हर बंगाली महिला के लिए अनिवार्य मानना सही नहीं होगा। इन्हें पहनने के तरीके और इनसे जुड़ी मान्यताएं परिवार, क्षेत्र और समुदाय के हिसाब से अलग हो सकती हैं। कुछ महिलाएं इन्हें रोज पहनती हैं, जबकि कुछ खास अवसरों पर ही पहनना पसंद करती हैं।

कुल मिलाकर देखें तो शाखा-पोला में बंगाल की सांस्कृतिक पहचान, पारिवारिक परंपराएं और विवाह से जुडी मान्यताएं एक साथ दिखाई देती हैं। इनके सफेद और लाल रंग में एक ऐसी विरासत समाई है, जिसे महिलाएं पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ाती आई हैं।

Suneet Singh
सुनीत सिंहauthor

सुनीत सिंह टाइम्स नाउ नवभारत डिजिटल में डिप्टी न्यूज एडिटर के रूप में कार्यरत हैं और लाइफस्टाइल सेक्शन में स्पेशल स्टोरीज प्रोजेक्ट का नेतृत्व कर रहे हैं। टीवी और डिजिटल पत्रकारिता में 13 वर्षों के अनुभव के साथ, सुनीत उन बहुमुखी पत्रकारों में शामिल हैं जिन्होंने न्यूजरूम और फील्ड—दोनों मोर्चों पर खुद को साबित किया है। माइक, कैमरा और एडिटिंग डेस्क तीनों से उनकी सहज जुगलबंदी ने उन्हें एक संतुलित और विश्वसनीय मीडिया प्रोफेशनल के रूप में स्थापित किया है। पिछले 10 वर्षों से सुनीत लाइफस्टाइल, लिटरेचर, सिनेमा और संस्कृति से जुड़ी गहन व विश्लेषणात्मक स्टोरीज लिखते रहे हैं और अबतक 12,000 से अधिक आर्टिकल पब्लिश कर चुके हैं। उनकी लेखन शैली गहराई, मौलिक दृष्टिकोण और रिसर्च-आधारित प्रस्तुति से पहचानी जाती है। वे विषयों की बारीकियों को पकड़कर उन्हें सरल, प्रभावी और पाठकों से जुड़ने वाली भाषा में ढालने में दक्ष हैं।

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