बच्चों की अच्छी परवरिश करना माता-पिता के लिए किसी चुनौती से कम नहीं है। कई बार बच्चों को बेहतर अनुभव देने की कोशिश में वे खुद पर भी जरूरत से ज्यादा दबाव डाल लेते हैं। लेकिन क्या अच्छी परवरिश के लिए हर बार कुछ खास या बड़ा करना जरूरी है? टीवी एक्टर नकुल मेहता ने अपने एक पॉडकास्ट में इसी सवाल का जवाब एक दिलचस्प उदाहरण के जरिए दिया है। उन्होंने बच्चों की परवरिश को ‘दाल-चावल पैरेंटिंग’ का नाम दिया।
नकुल मेहता की 'दाल चावल पेरेंटिंग' क्या है? (Photo: Nakul Mehta Instagram)
क्या है दाल-चावल पैरेंटिंग?
नकुल मेहता ने अपनी पत्नी जानकी के साथ ‘द इंडियन पैरेंट पॉड’ में बातचीत के दौरान परवरिश के इस नजरिए पर बात की। उन्होंने दाल-चावल की तुलना बच्चों की परवरिश से की। जिस तरह दाल-चावल एक साधारण लेकिन पेट भरने वाला और सुकून देने वाला भोजन है, उसी तरह बच्चों को भी प्यार, देखभाल, सुरक्षा और माता-पिता की मौजूदगी की जरूरत होती है। इसके लिए हर बार महंगे गिफ्ट, शानदार ट्रिप या बड़े-बड़े सरप्राइज जरूरी नहीं हैं।
इस सोच का मतलब यह नहीं कि बच्चों की जिंदगी में रोमांच या नए अनुभवों की कोई जगह नहीं होनी चाहिए। बात बस इतनी है कि परवरिश की बुनियाद मजबूत होनी चाहिए। हर परिवार अपने हिसाब से इसमें थोड़ा ‘तड़का’ लगा सकता है। यानी बच्चों की जरूरत और परिवार की परिस्थितियों के अनुसार परवरिश का तरीका अलग हो सकता है, लेकिन प्यार और भरोसे जैसी बुनियादी चीजें बनी रहनी चाहिए।
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बच्चों के लिए मौजूद रहना है जरूरी
पैरेंटिंग एक्सपर्ट्स भी मानते हैं कि बच्चों के विकास में भावनात्मक सुरक्षा, रोजमर्रा की बातचीत और नियमित दिनचर्या की अहम भूमिका होती है। जब बच्चों को पता होता है कि जरूरत पड़ने पर माता-पिता उनके साथ होंगे, तो उनमें भरोसे और अपनापन की भावना मजबूत होती है।
इसके लिए जरूरी नहीं कि माता-पिता हर समय बच्चों के साथ ही रहें। वे दिन में कुछ समय ऐसा जरूर निकाल सकते हैं, जब उनका पूरा ध्यान बच्चे पर हो। बच्चे की बात सुनना, उसके दिन के बारे में पूछना, उसकी पसंद की गतिविधियों में शामिल होना और बिना तुरंत सलाह दिए उसकी भावनाओं को समझना रिश्ते को मजबूत बनाता है।
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प्यार के साथ सीमाएं भी जरूरी
बच्चों को प्यार देना जितना जरूरी है, उतना ही जरूरी उनके लिए कुछ स्पष्ट सीमाएं तय करना भी है। उन्हें यह समझना चाहिए कि घर में हर बात उनकी इच्छा के मुताबिक नहीं होगी। स्क्रीन टाइम, सोने का समय और व्यवहार से जुड़े नियम इसका हिस्सा हो सकते हैं। लेकिन इन नियमों को डर या सजा के बजाय बातचीत और निरंतरता के साथ लागू करना बेहतर है।
बच्चे अपने माता-पिता को देखकर भी बहुत कुछ सीखते हैं। वे यह भी देखते हैं कि बड़े लोग मोबाइल का इस्तेमाल कैसे करते हैं, गुस्सा आने पर कैसी प्रतिक्रिया देते हैं और असहमति होने पर किस तरह बात करते हैं। इसलिए अच्छी परवरिश केवल बच्चों को समझाने से नहीं, बल्कि अपने व्यवहार से उदाहरण पेश करने से भी जुड़ी है।
नकुल मेहता की ‘दाल-चावल पैरेंटिंग’ का संदेश यही है कि बच्चों को बड़ा करने के लिए किसी एक तय फॉर्मूले की जरूरत नहीं है। जरूरी है कि घर में प्यार, भरोसा, नियमित देखभाल और स्पष्ट सीमाएं हों। कई बार बच्चों के लिए सबसे यादगार वह साधारण पल होता है, जब माता-पिता ने उनकी बात ध्यान से सुनी हो।
