देशभर में नीट पेपर लीक को लेकर छात्र आंदोलन कर रहे हैं। आंदोलनकारी शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र के इस्तीफे की मांग पर अड़े हैं। राजधानी दिल्ली में जंतर मंतर पर पिछले 25 दिनों से ये आंदोलन जारी है। इस आंदोलन के समर्थन में दूर दराज से छात्र जंतर मंतर पहुंचे हैं। इन सबके बीच धरना स्थल पर एक गीत खूब सुनाई दे रहा है। इस गीत के बोल हैं- मुझको अपने बैंक की किताब दीजिए, देश की तबाही का हिसाब दीजिए। वैसे तो इस गीत के नए-नए वर्जन ही आंदोलनकारियों के बीच गूंज रहे हैं, लेकिन क्या आप जानते हैं कि मूल रूप से ये नज्म किसने लिखी है।
मंजर भोपाली की नज्म आज भी क्यों हैं वायरल
बात है साल 1990 की। अमेरिका में मुशायरे का मंच सजा था। सुनने वालों की भीड़ में ज्यादातार वो भारतीय थे जो वहां रह रहे थे। तमाम शायरों के बीच मंच पर जैसे ही मशहूर नगमानिगार मंजर भोपाली ने अपनी नज्म का पहला शेर पढ़ा:
मुझको अपने बैंक की किताब दीजिए,
देश की तबाही का हिसाब दीजिए...
पूरा हॉल तालियों से गूंज उठा। ये ताली महज एक अच्छे शेर के लिए नहीं थी। यह उस हिम्मत के लिए भी थी, जिसके साथ किसी शायर ने जनता के मन में दबे सवाल को मंच पर खड़ा कर दिया था। यह नज़्म सत्ता से सीधा सवाल थी। यह लोकतंत्र में जनता की ओर से मांगा गया ऑडिट था।
करीब 36 साल बाद भी मंजर भोपाली की इसी नज़्म को अपनी क्रांति का गीत बना आंदोलनकारी सत्ता से हिसाब मांग रहे हैं। ये आज भी उतनी ही प्रासंगिक है, जितनी अपने लिखे जाने के समय थी। बता दें कि मंजर भोपाली की यह नज्म उस दौर में दानव बन चुके भ्रष्टाचार, बेरोजगारी और महंगाई पर बतौर तंज लिखी थी। उन्होंने इन सबके हिसाब के लिए सरकार से वो किताब मांगी जिसमें जनता से किये उनके वादे, फैसले और नतीजे दर्ज थे।
प्रसिद्ध आलोचक नामवर सिंह अकसर कहा करते थे कि जनकविता वही है जो जनता की भाषा में जनता की बेचैनी व्यक्त करे। मंजर भोपाली की यह नज़्म इसी परंपरा का विस्तार है। दरअसल यह नज्म केवल महंगाई की शिकायत नहीं करती। यह पूछती है कि जो आपने वादे किये थे उनका क्या हुआ। देश में बेरोजगारी का जिम्मेदार कौन है? भ्रष्टाचार का हिसाब कौन देगा?
मंजर भोपाली ने 1990 और उसके आसपास के दौर में जब ये नज्म पढ़ी तब इसे तालियां तो मिलीं, लेकिन ये उतनी मशहूर नहीं हुई। इसी शुरुआत के कुछ एक मुशायरों में पढ़ने के बाद मंजर भोपाली ने भी इसे यूं ही छोड़ दिया। ये अलग बात है कि जब पहली बार उन्होंने ये नज्म पढ़ी थी, तब उसकी वीडियो रिकॉर्डिंग हुई थी जो इंटरनेट आने के बाद लोगों तक पहुंचने लगी।
सोशल मीडिया के आने के बाद तो ये नज्म बहुत ज्यादा मशहूर हो गई। आलम ये हुआ कि 2024 के लोकसभा चुनाव के दौरान ये गीत इतना वायरल हुआ कि मंजर भोपाली को धमकियां मिलने लगीं। धमकी ऐसी नज्म के लिए मिल रही थी जो उन्होंने करीब 35 साल पहले लिखा था।
यह नज़्म आज इंस्टाग्राम रील्स, यूट्यूब शॉर्ट्स और सोशल मीडिया पोस्टों में बार-बार दिखाई दे जाती है। दरअसल इसके सवाल आज भी पुराने नहीं हुए हैं। महंगाई आज भी लोगों को मार रही है। बेरोजगारी आज भी बहस का विषय है। सरकारी खर्च और सार्वजनिक जवाबदेही आज भी लोकतंत्र के केंद्र में हैं। यह सवाल आज भी भारतीय राजनीति के सबसे बड़े प्रश्न हैं। इसलिए नज्म का असर समय के साथ कम नहीं हुआ।
अच्छे गीतों की यही तो सबसे बड़ी ताकत है कि वो समय के साथ बूढ़ी नहीं होती। वह हर दौर में नया अर्थ ग्रहण कर लेती है। मंजर भोपाली की यह नज़्म इसका उत्कृष्ट उदाहरण है।
उर्दू के दिवंगत शायर राहत इंदौरी कहा करते थे कि शायर का असली काम सत्ता को आईना दिखाना है, न कि उसकी प्रशंसा करना। मंजर भोपाली भी उसी परंपरा के शायर थे। वे सीधे नाम नहीं लेते थे, लेकिन उनके सवाल इतने स्पष्ट होते थे कि सुनने वाले समझ जाते कि निशाना किस ओर है। उन्हें सुनते हुए लोग मुस्कुराते भी थे और असहज भी हो जाते थे। यही सफल व्यंग्य की पहचान है।
मंजर भोपाली के इस गीत की एक खास बात ये भी है कि उन्होंने भाषा ऐसी रखी जो चाय की दुकान, बस अड्डे या फिर किसी गली नुक्कड़ पर बैठे लोगों के बीच सुनाई देती है। शायद इसी कारण से आम आदमी उसमें अपना दर्द आसानी से पहचान लेता।
पढ़ें मंजर भोपाली की वही अमर नज्म:
मुझको अपने बैंक की क़िताब दीजिए
देश की तबाही का हिसाब दीजिए,
गांव गांव जख़्मी फिजाएं हो गई
जहरीली घर की हवाएं हो गई,
महंगी शराब से दवाएं हो गई
जाइए आवाम को जवाब दीजिए
देश की तबाही का हिसाब दीजिए,
लोग जो गरीब थे हकीर हो गए
आप तो ग़रीब से अमीर हो गए
यानि हुज़ूर बेजमीर हो गए
खुद को बेजमीरी का ख़िताब दीजिए
देश की तबाही का हिसाब दीजिए,
जेब है आवाम की सफाई कीजिए
लूट के गरीबों की भलाई कीजिए
कुछ तो निगाहों को हिजाब दीजिए
देश की तबाही का हिसाब दीजिए,
कैसी कैसी देखो योजनायें खा गए
बेच कर ये अपनी आत्माएं खा गए
मार के मरीजों की दवाएं खा गए
इन्हें पद्मश्री का खिताब दीजिए
देश की तबाही का हिसाब दीजिए
