मुझको अपने बैंक की किताब दीजिए- वो शायर जिसने सत्ता से मांग लिया था देश की तबाही का हिसाब, 35 साल बाद भी मिली धमकी

मुझको अपने बैंक की किताब दीजिए, देश की तबाही का हिसाब दीजिए - इस नज्म में इतना दम है कि जिस शायर ने इसे लिखा है उसे लिखने के करीब 35 साल बाद तक धमकियां मिली

देशभर में नीट पेपर लीक को लेकर छात्र आंदोलन कर रहे हैं। आंदोलनकारी शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र के इस्तीफे की मांग पर अड़े हैं। राजधानी दिल्ली में जंतर मंतर पर पिछले 25 दिनों से ये आंदोलन जारी है। इस आंदोलन के समर्थन में दूर दराज से छात्र जंतर मंतर पहुंचे हैं। इन सबके बीच धरना स्थल पर एक गीत खूब सुनाई दे रहा है। इस गीत के बोल हैं- मुझको अपने बैंक की किताब दीजिए, देश की तबाही का हिसाब दीजिए। वैसे तो इस गीत के नए-नए वर्जन ही आंदोलनकारियों के बीच गूंज रहे हैं, लेकिन क्या आप जानते हैं कि मूल रूप से ये नज्म किसने लिखी है।

Manzar Bhopali

मंजर भोपाली की नज्म आज भी क्यों हैं वायरल

बात है साल 1990 की। अमेरिका में मुशायरे का मंच सजा था। सुनने वालों की भीड़ में ज्यादातार वो भारतीय थे जो वहां रह रहे थे। तमाम शायरों के बीच मंच पर जैसे ही मशहूर नगमानिगार मंजर भोपाली ने अपनी नज्म का पहला शेर पढ़ा:

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