Kriti Sanon Rakhi Ad: रक्षाबंधन सिर्फ राखी, मिठाई और परिवार के साथ मिलने का त्योहार नहीं है, यह उन मौकों में से एक है जब कपड़े भी उत्सव का हिस्सा बन जाते हैं। इसी वजह से कृति सेनन के हालिया ज्वेलरी ब्रांड के रक्षाबंधन विज्ञापन में पहने गए इंडो-वेस्टर्न लुक ने फैशन और त्योहारों के रिश्ते पर नई बहस छेड़ दी।
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एड में कृति ब्रालेट-स्टाइल ब्लाउज, केप और ड्रेप्ड स्कर्ट में नजर आईं। कुछ लोगों को यह अंदाज रक्षाबंधन जैसे पारंपरिक त्योहार के लिए सही नहीं लगा, जबकि कई लोगों ने इसे मॉडर्न फैशन और व्यक्तिगत पसंद का हिस्सा माना। अभिनेत्री कंगना रनौत ने भी इस लुक पर सवाल उठाए। बाद में कृति ने कपड़ों को लेकर होने वाली ऐसी टिप्पणियों पर अपनी बात रखी। विवाद इतना बढ़ा कि ब्रांड ने विज्ञापन वापस ले लिया।
त्योहार और कपड़े
भारत में त्योहार आते ही कपड़ों की अलमारी अपने आप खुल जाती है। रक्षाबंधन हो, दिवाली हो या तीज.. हर त्योहार वाले मौकों पर तैयार होना सिर्फ अच्छा दिखने की बात नहीं, बल्कि उत्सव का हिस्सा भी है। बचपन में नई फ्रॉक या कुर्ता मिलने से लेकर बड़े होने पर अपनी पसंद की साड़ी चुनने तक, त्योहारों के साथ हमारे कपड़ों की यादें भी जुड़ी रहती हैं। यही वजह है कि किसी त्योहार से जुड़े विज्ञापन में कपड़ों का चुनाव लोगों का ध्यान जल्दी खींचता है।
फेस्टिव फैशन मतलब ट्रेडिशनल कपड़े?
ऐसा जरूरी नहीं है कि, त्योहारों पर पहने गए कपड़े हमेशा ट्रेडिशनल भारतीय ही हो। आज की महिला साड़ी के साथ स्नीकर्स पहन सकती है, कुर्ते के साथ मॉडर्न ज्वेलरी जोड़ सकती है या लहंगे को नए तरीके से स्टाइल कर सकती है। फैशन लगातार बदल रहा है और त्योहारों का पहनावा भी उसके साथ बदल रहा है। लेकिन इस बात का ध्यान रखना जरूरी है कि, मॉडर्न दिखना और त्योहार की भावना को बनाए रखना दोनों एक साथ संभव हैं।
कृति के लुक ने कौन सी बहस छेड़ दी?
कृति सेनन के विज्ञापन में दिखे लुक पर शुरू हुई चर्चा धीरे-धीरे सिर्फ कपड़ों तक सीमित नहीं रही। सवाल यह उठा कि जब किसी एड की थीम किसी खास त्योहार से जुड़ी हो, तो क्या उसमें दिखने वाला पहनावा भी उसी त्योहार की पारंपरिक सोच के करीब होना चाहिए?
कुछ लोगों को कृति का अंदाज रक्षाबंधन के पारंपरिक माहौल से मेल नहीं खाता लगा। वहीं, दूसरी तरफ यह बात भी सामने आई कि किसी महिला के कपड़ों को देखकर उसकी सोच, संस्कृति या सम्मान तय करना सही नहीं है। यही वजह है कि मामला सिर्फ एक फैशन लुक का नहीं रहा। यह सवाल बन गया कि त्योहार की परंपरा और अपनी पसंद के बीच संतुलन आखिर कौन तय करेगा?
आखिर फेस्टिव फैशन किसे कहें?
फेस्टिव फैशन का मतलब सिर्फ भारी साड़ी, चमकदार लहंगा या ढेर सारी कढ़ाई नहीं है। त्योहार पर हल्की कॉटन साड़ी, खूबसूरत झुमके और बालों में गजरा भी उतना ही प्यारा लग सकता है। सबसे जरूरी बात यह है कि कपड़ा मौके के साथ-साथ पहनने वाले की पसंद, आराम और जगह की गरिमा से भी मेल खाए।
कृति सेनन के लुक पर हुई बहस ने एक दिलचस्प बात सामने रखी है, फेस्टिव फैशन अब पहले जैसा एक जैसा नहीं रहा। परंपरा अपनी जगह है और बदलता फैशन अपनी जगह। दोनों को साथ लेकर चलने की गुंजाइश हमेशा रहती है।
