Rukhmabai Raut: आज इंटरनेट और डेटिंग ऐप्स की दुनिया में शादी औऱ रिश्तों ने नई शक्ल ले ली है, लव-कम-अरेंज्ड मैरिज होने लगी हैं, लिव-इन रिलेशनशिप बढ़ी है, एक्स्ट्रा मैरिटल अफेयर देखने को मिल रहे हैं, समाज में वन नाइट स्टैंड तक हो रहे हैं और साथ ही रिश्तों में घरेलू हिंसा और झूठ भी बढ़े हैं। लेकिन हैरान करने वाली बात है कि ऐसे वक्त में भी तलाक को शर्मनाक माना जा रहा है। चूंकि तलाक को शर्मनाक समझा जाता है, तलाकशुदा इंसान दुनिया का सबसे बुरा इंसान माना जाता है। समाज ही नहीं घरवालों की नजरों में भी तलाकशुदा महिलाएं विलेन बन जाती है। हालांकि महिलाएं अब ऐसी दकियानूसी सोच के चंगुल से आजाद हो रही हैं। धीरे-धीरे ही सही , वो तलाक को लेकर समाज और लोगों की सोच को बदलने में कामयाब हो रही हैं।
Rukhmabai Raut: First Indian Women who get divorced with her Husband
आज जितनी तेजी से लोग एक दूसरे के इश्क में गिरफ्तार हो रहे हैं उतनी ही तेजी से डिवोर्स भी हो रहे हैं। महिलाए आर्थिक तौर पर काफी सशक्त और आत्मनिर्भर हो रही हैं। अब वह शादीशुदा जिंदगी में शोषण के खिलाफ आवाज बुलंद करने से कतराती नहीं हैं। अगर तलाक लेना पड़े तब भी वह पीछे नहीं हटतीं। लेकिन क्या आप जानते हैं कि भारत में सबसे पहले किसने तलाक लिया था। वो कौन सी महिला थी जिसने भारत जैसे देश में करीब ढाई सौ साल पहले पति से तलाक लेकर समाज की सोच पर करारा प्रहार किया साथ ही महिलाओं को अपने हक की आवाज बुलंद करने के हौसले से भी नवाज़ा। अगर आपको ना पता हो तो हम बता दें कि तलाक लेने वाली पहली भारतीय महिला का नाम था रखमाबाई राउत।
कौन थीं रखमाबाई राउत (Who was Rukhmabai Raut)
रखमाबाई राउत का जन्म सन 1864 में मुंबई में हुआ था। रखमाबाई राउत को एक समाज सुधारक, नारीवादी, उदारावादी सोच वाली भारत की शुरुआती महिला डॉक्टर के रूप में जाना जाता है। 19वीं सदी में महिला अधिकारों के प्रति लड़ने में उनका योगदान अतुलनीय था। उनके संघर्षों की वजह से ही कई कानूनों की नींव पड़ी जिसके परिणामस्वरूप समाज में महिला सशक्तिकरण का सपना साकार हुआ।
Rukhmabai Raut
दादाजी भीकाजी बनाम रुक्माबाई केस, 1885
रखमाबाई जब महज 9 साल की थीं तभी उनके पिता का निधन हो गया। उनकी विधवा मां ने उनकी शादी करवा दी। हालांकि शादी के बाद पति के यहां जाने से मना करने के बाद रखमाबाई हमेशा अपनी मां के साथ ही रहीं। रखमाबाई के पति दादाजी भीकाजी ने कोर्ट में याचिका दायर कर मांग की कि रखमाबाई उन्हें अपने पति के तौर पर स्वीकार करें और उनके साथ आकर रहें। रखमाबाई ने अपना पक्ष रखते हुए कहा कि शादी के समय वह बहुत छोटी थीं। उनकी सहमति के बिना हुई इस शादी के लिए उन्हें कोई मजबूर नहीं कर सकता।
रखमाबाई के इस कदम ने पूरे देशभर में जमकर तूल पकड़ा। लोग उनकी आलोचना करने लगे। चरित्र पर भी सवाल उठाए गए। लोगों ने कहा कि ये कैसी महिला है जो अपने पति के साथ रहने से मना कर रही है। मामला यहां तक भड़का कि देश की आजादी के जननायक बाल गंगाधर तिलक ने भी रखमाबाई की आलोचना कर दी। बाल गंगाधर तिलक ने भी अपने अखबार में लिखा कि, 'रखमाबाई के इस कदम को हिंदू परंपराओं पर एक धब्बे के रूप में देखा जाना चाहिए। उसके जैसी महिलाओं के साथ ठीक वैसा ही व्यवहार किया जाना चाहिए जैसा चोर, व्यभिचारी और हत्या के आरोपियों के साथ किया जाता है।' तमाम आलोचनाओं के बाद भी रखमाबाई नहीं टूटीं।
4 मार्च 1887 को फैसला दिया गया कि या तो रखमाबाई अपने पति के साथ रहने जाएं या फिर छह महीने के लिए जेल की सज़ा भुगतें। और रखमाबाई मुकदमा हारकर भी तब जीतीं, जब उन्होंने अपने अधिकार के लिए जेल जाना मंज़ूर किया।
जब क्वीन विक्टोरिया तक पहुंचा रखमाबाई का मामला
रखमाबाई के इस पूरे संघर्ष में उनके सौतेले पिता सखाराम अर्जन चट्टान की तरह उनके साथ खड़े रहे। रखमाबाई ने अपनी लड़ाई को आगे बढ़ाते हुए जेल से ही तत्कालीन रानी विक्टोरिया को खत लिखा और अपने तलाक की अर्जी उनके सामने लगाई। रानी विक्टोरिया ने अदालत के फैसले को पलट दिया। उन्होंने कोर्ट से रखमाबाई के पक्ष में उनकी शादी को भंग करवाया और दो हज़ार रुपये के भुगतान के बाद दादाजी भीकाजी ने भी अपना दावा छोड़ दिया।
Who is Rukhmabai Raut
और इस तरह से रखमाबाई पति से अलग होने वालीं पहली भारतीय महिला बन गईं। रखमाबाई की जीत ने महिलाओं के कानूनी हक की किताब में एक नया अध्याय भी जोड़ा। 1891 में एज ऑफ कन्सेंट एक्ट बना जिसके तहत शादी के लिए लड़की की वैध उम्र या मर्ज़ी की उम्र को 10 साल से बढ़ाकर 12 साल किया गया। इस केस के बाद कानून में पहली बार यह तय किया कि कम उम्र की लड़की के साथ यौन संबंध बनाने वाले को सज़ा हो सकती है, भले ही वह विवाहित क्यों ना हो। इसके उल्लंघन को बलात्कार की श्रेणी में रखा गया।
केस जीत नई इबारत लिखने लंदन चली गईं रखमाबाई
केस जीतने के बाद रखमाबाई लंदन चली गईं। 1889 में लंदन स्कूल ञफ मेडिसिन में उन्हें दाखिला मिला। पढ़ाई के दौरान उन्होंने ग्लॉसगो, ब्रुसेल्स और एडिनबर्ग का दौरा किया। 1894 में जब उनकी पढ़ाई पूरी हुई तब वह भारत लौटीं और मुंबई के कामा अस्पताल में प्रैक्टिस करने लगीं। रखमाबाई भारत की पहली महिला एमडी और प्रैक्टिस करने वाली डॉक्टर बनीं। 1918 और 1930 के दौरान उन्होंने गुजरात के राजकोट में चीफ मेडिकल ऑफिसर के तौर पर काम किया। इस दौरान उन्होंने महिला एवं बाल अधिकारों के लिए काफी संघर्ष किया।
रखमाबाई ने पति से अलग होने का केस लड़ सिर्फ भारत ही नहीं लंदन में भी खूब सुर्खियां बटोरी थीं। उनकी चर्चा सालों तक इंग्लैंड की पत्रिकाओं और किताबों तक में होती रही। वह अपने केस और स्टैंड के चलते बतौर फेमिनिस्ट स्थापित हो गईं। वह हमेशा नारी के उत्थान का सपना देखतीं और उसे साकार करने में लग जातीं। उन्होंने महिलाओं के पक्ष में काम करने के अपने जज़्बे को हमेशा बरकरार रखा। उदाहरण के लिए उन्हें मेडिकल क्षेत्र में काफी बड़े पदों की पेशकश भी की गई लेकिन वो राजकोट और सूरत के ज़नाना यानी महिला अस्पतालों में ही सेवाएं देती रहीं। भारतीय इतिहास में डॉक्टर रखमाबाई के संघर्ष की कहानी तमाम लड़कियों और महिलाओं के लिए प्रेरणादायक है।
