Madhubani Art: चित्रकारी एक कविता है, जो देखी जाती है, सुनी नहीं जाती - यह मशहूर कोट है द ग्रेट लियोनार्डो दा विंची का। वह जिस चित्रकारी की बात कर रहे हैं वह एक ऐसी कला है, जो भावनाओं को रंगों और रेखाओं के जरिए व्यक्त करती है। अगर हम कहें कि चित्रकारी मानवीय विचारों की अभिव्यक्ति का एक सशक्त तरीका है तो कहीं से गलत ना होगा। चित्रकारी का इतिहास बहुत पुराना है। दरअसल जब से इतिहास लिखा जा रहा है उससे भी पहले से चित्रकारी हो रही है। प्रागैतिहासिक काल में आदिमानव गुफाओं की दीवारों पर चित्र बनाते थे। समय और सभ्यता के साथ चित्रकला विकसित होती चली गई। जब भी भारतीय चित्रकला की बात होती है सबसे पहला नाम आता है मधुबनी पेंटिंग की।
Madhubani Art: गांव की दीवारों से ग्रीस की गैलरी तक, अद्भुत है मिथिला की महिलाओं के हुनर का पूरा सफर
मधुबनी आर्ट
मधुबनी पेंटिंग, जिसे मिथिला पेंटिंग भी कहा जाता है, बिहार के मिथिला क्षेत्र की देन है। यह कला अपनी जटिल रेखाओं, जीवंत रंगों और प्रतीकात्मक चित्रण के लिए दुनियाभर में मशहूर है। मधुबनी पेंटिंग की खासियत ये है कि जहां विदेशी आक्रांताओं के हमले, लूटपाट और गुलामी ने ना जाने कितनी ही पुरानी और सांस्कृतिक रूप से समृद्ध भारतीय कलाओं को लील लिया, इस चित्रकला ने अपना वजूद बचाए रखा। ना सिर्फ वजूद बचाया बल्कि इतना फूली फली कि आज पूरी दुनिया इसकी मुरीद है।
दीवार पर मधुबनी आर्ट
मधुबनी पेंटिंग बिहार ही नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति और कलात्मकता का नमूना है। यहां के संपन्न इतिहास और संस्कृति की अभिव्यक्ति के रूप में मशहूर यह चित्रकला हमारे इतिहास को हमारे आज से जोड़ने वाला एक पुल है, जिसका परचम आज पूरी दुनिया में लहरा है। इस विश्व प्रसिद्ध मधुबनी आर्ट पर आपका दिल भी जरूर आया होगा, लेकिन क्या आपने सोचा है कि आखिर इसकी शुरुआत कैसे हुई और कैसे इसने दुनियाभर में अपनी धाक जमाई। आइए डालते हैं नजर दीवार से कैनवस तक कैसा रहा मधुबनी चित्रकला का सफर:
मधुबनी पेंटिंग
मधुबनी पेंटिंग का इतिहास: राजा जनक का फरमान बना मिथिला की पहचान
मधुबनी पेंटिंग की उत्पत्ति का संबंध प्राचीन मिथिला संस्कृति से है, जो रामायण काल से जोड़ा जाता है। किंवदंती के अनुसार, जब भगवान राम और सीता का विवाह हुआ, तो मिथिला के राजा जनक ने अपने महल को सजाने के लिए स्थानीय महिलाओं से चित्र बनाने को कहा। वहां की महिलाओं ने दीवारों और जमीन पर इस चित्रकला की शुरुआत की थी और राम-सीता विवाह के कई मनमोहक दृश्य इस चित्रकला के जरिए बनाए गए थे और इस तरह हुआ था मधुबनी या मिथिला चित्रकला का उद्भव। धीरे-धीरे ऐसा चित्रकारी मिथिला में शादी, ब्याह या मुंडन जैसे दूसरे समारोह की भी सुंदरता बढ़ाने लगी। लोग शुभ अवसरों पर अपने घर की दीवार पर एक चित्रकारी करने लगे। आगे चलकर यह मिथिला से बाहर भी पहुंची और आज जो आलम है वो बताने की जरूरत नहीं है। रामायण काल में इस चित्रकला के उदय को अगर खारिज करेंगे तो भी इसका लिखित इतिहास 2500 साल पुराना माना जाता है, जब यह कला धार्मिक और सामाजिक अनुष्ठानों का हिस्सा थी।
राम सीता विवाह की झलक
पेड़, पशु और प्रतीक: मधुबनी के बदलते रंग
जैसा कि हमने ऊपर बताया कि मधुबनी पेंटिंग की शुरुआत राम-सीता के विवाह के बाद शुरू होने की बात कही जाती है। इसलिए इस चित्रकला में बहुत हद तक देवी-देवताओं को ही शामिल किया जाता है। इस चित्रकला में राम सीता विवाह की मधुर झांकियां, राधा-कृष्ण के प्रसंग और शिव पार्वती की कहानियों को उकेरा जाता है। देवी-देवताओं से जुड़ी पौराणिक कहानियों के साथ ही मधुबनी चित्रकारी में प्रकृति के प्रति प्रेम भी साफ नजर आता है। मधुबनी चित्रकला में बिहार के महापर्व छठ से लेकर पेड़-पौधों, पक्षी, जानवरों और प्राकृतिक सुंदरता की झलक भी देखने को मिल जाएंगी। मधुबनी पेंटिंग में हर चित्र का एक प्रतीकात्मक अर्थ होता है। सूर्य, चंद्रमा, कमल और मछली जैसे प्रतीक उर्वरता, समृद्धि, और जीवन का प्रतीक हैं। कोहबर (विवाह के दौरान बनाया जाने वाला चित्र), जिसमें कमल और मछली जैसे प्रतीक होते हैं, नवविवाहित जोड़े के लिए उर्वरता और सुख का प्रतीक है।
मधुबनी चित्रकारी
रंगों में रची-बसी संस्कृति: मधुबनी की अनोखी शैली
मधुबनी चित्रकला की शुरुआत जब हुई थी तब ना तो आज की तरह सिंथेटिक रंग थे और ना ही पेंटिंग ब्रश। प्राचीन काल में मधुबनी चित्रकारी में पेड़, पौधे या फूलों से निकले प्राकृतिक रंग या फिर सिंदूर कोयले और मिट्टी से बने रंगों का इस्तेमाल होता था। उदाहरण के लिए लाल रंग कुसुम फूल से, पीला हल्दी से और काला कोयले से बनाया जाता है। ब्रश के लिए बांस की टहनी और कपड़े का उपयोग होता था। बांस की लकड़ियों के अलावा, इसे बनाने के लिए माचिस की तीलियां और उंगलियों का भी प्रयोग किया जाता है। इस बात के प्रमाण मिलते हैं कि अपने शुरुआती काल में मधुबनी चित्रकारी घर की दीवारों पर प्राकृतिक रंगों से ही होती थी। वैसे अब तो यहां पर भी आधुनिकता के नाम पर केमिकल वाले रंग, पेंटिंग ब्रश और कैनवस ने अपनी दमदार मौजूदगी दर्ज करा दी है।
मधुबनी पेंटिंग के रंग
मधुबनी की चित्रभाषा: प्रतीकों का अद्भुत संसार
मधुबनी पेंटिंग को सामाजिक और सांस्कृतिक आधार पर पांच शैलियों में बांटा गया है:
1. भरनी: यह शैली सबसे जटिल और रंगीन है। इसमें पूरी जगह रंगों और पैटर्न से भरी जाती है। यह मुख्य रूप से ब्राह्मण और कायस्थ समुदाय की महिलाओं द्वारा बनाई जाती है।
2. कचनी: यह शैली रेखाओं पर केंद्रित है। इसमें बारीक रेखाओं का उपयोग होता है और रंगों का कम प्रयोग होता है। यह कायस्थ समुदाय में लोकप्रिय है।
3. तांत्रिक: यह शैली धार्मिक और तांत्रिक विषयों पर केंद्रित है। इसमें मंत्र, यंत्र और देवी-देवताओं के चित्र बनाए जाते हैं।
4. गोदना: यह शैली अनुसूचित जाति की महिलाओं द्वारा बनाई जाती है। इसमें प्राकृतिक तत्व और टैटू जैसे डिज़ाइन होते हैं।
5. कोहबर: यह विवाह के अवसर पर बनाई जाती है और नवविवाहित जोड़े के लिए शुभकामनाओं का प्रतीक है। इसमें कमल, बांस और मछली जैसे प्रतीक होते हैं।
मिथिला पेंटिंग
रेखाओं की भाषा: मधुबनी का ज्यामितीय सौंदर्य
मधुबनी पेंटिंग की सबसे बड़ी खासियत इसकी प्राकृतिक और प्रतीकात्मक शैली है। इसमें जटिल ज्यामितीय पैटर्न, रेखाएं और प्राकृतिक तत्वों का चित्रण किया जाता है। इस कला में दोहरी रेखाओं का उपयोग होता है और खाली जगह को छोटे-छोटे पैटर्न से भरा जाता है। इसमें कोई छायांकन (शेडिंग) नहीं होता, जिससे चित्र सपाट लेकिन जीवंत दिखते हैं। इसकी एक खासियत यह भी है कि इस चित्रकला को बनाते समय सीधी और टेढ़ी रेखाओं का इस्तेमाल किया जाता है। रंग-बिरंगी रेखाओं से बनाई गई इन तस्वीरों को प्राकृतिक और चटक रंगों से भरा जाता है। मधुबनी पेंटिंग में खाली जगह की कोई जगह नहीं होती है। खाली जगह पर फूल, पत्तियों और बेल-बूटियों को भरनी की तरह इस्तेमाल में लिया जाता है।
मधुबनी पेंटिंग की खासियत
मधुबनी पेंटिंग में आंखों को बनाने या उभारने का काम सबसे अंत में किया जाता है। किसी मधुबनी चित्रकारी में आपको ये आंखें भले ही बेहद साधारण दिखती हैं, लेकिन उस पूरी पेंटिंग मुख्य आकर्षण होती हैं। मधुबनी चित्रकला में जितनी बारीकियां और जटिलताएं हैं, ये आंखों को उतना ही सुखद अनुभव कराती हैं और इस पेंटिंग को देखते ही आप उसमें बस डूब कर रह जाते हैं।
मधुबनी, मिथिला और महिलाएं
मधुबनी की सबसे बड़ी खासियत है इसके चित्रकार। मधुबनी चित्रकारी का काम आदि काल से महिलाएं ही करती आ रही हैं। पितृसत्तात्मक समाज में महिलाओं नें अपने हुनर से घर की दीवारों पर जो कला की छाप छोड़ी उसने पूरी दुनिया में अपना झंडा बुलंद किया जाता है। मिथिलांचल की हर मां सैकड़ों साल से अपनी बेटी को मधुबनी चित्रकारी के गुण सिखाती आ रही है। मधुबनी चित्रकला पर हमेशा से ही महिलाओं की धाक रही है। आज भी जब आपको ज्यादातर महिला चित्रकारी ही नजर आएंगी। हालांकि अब कुछ पुरुष भी मधुबनी पेंटिंग के काम में उतरने लगे हैं।
मधुबनी पेंटिंग और महिलाएं
आज देश में मधुबनी चित्रकारी की सबसे बड़ी कलाकार हैं महासुंदरी देवी। उन्हें पारंपरिक मधुबनी पेंटिंग में महारत हासिलहै। अपने हुनर से उन्होंने इस कला को राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाई। कला के माध्यम से न केवल अपनी पहचान बनाई बल्कि मधुबनी पेंटिंग को भी एक नया आयाम दिया। मधुबनी चित्रकारी में उनके उत्कृष्ट योगदान के लिए साल 2011 में भारत सरकार ने पद्मश्री पुरस्कार से सम्मानित किया था। महासुंदरी देवी के अलावा और भी महिलाएं हैं जिन्होंने मधुबनी पेंटिंग के जरिए देश-दुनिया में नाम कमाया है। कोटक महिंद्रा बैंक ने तो भारती दयाल की मधुबनी पेंटिंग को अपने क्रेडिट कार्ड पर इस्तेमाल किया है।
मधुबनी पेंटिंग में माहिर महिलाएं
मिथिला से मेक्सिको तक का सफर
भारत जैसे विशाल देश में मिथिला जैसी छोटी जगह से निकल मधुबनी चित्रकारी ने आखिर विश्व पटल पर अपनी पहचान कैसे बना ली, ये भी रिसर्च का विषय है। हालांकि जो उपलब्ध जानकारी है उसके मुताबिक मधुबनी पेंटिंग को पहली बार वैश्विक पहचान मिली साल 1934 में। पूरे बिहार में बाढ़ आई हुई थी।
तब के एक ब्रिटिश अधिकारी विलियम जी. आर्चर ने बाढ़ से बुरी तरह प्रभावित मिथिलांचल का दौरा किया। वहां उन्होंने लोगों के घर की दीवारों पर चित्रकारी देखी और उसी में खोकर रह गए। बाद में अंग्रेज व्यापारियों ने इसे कपड़े और कैनवास पर बनवाना शुरू किया और दुनिया के दूसरे देशों तक पहुंचाया।
दीवार पर मधुबनी आर्ट
1960 के दशक में सूखे की स्थिति में, भारत सरकार ने मधुबनी की महिलाओं को कागज़ पर पेंटिंग बनाने के लिए प्रोत्साहित किया, ताकि वे अपनी कला के माध्यम से आय अर्जित कर सकें। इस पहल ने मधुबनी पेंटिंग को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मंच पर पहचान दिलाई। मधुबनी पेंटिंग को 1970 में भारत सरकार ने भौगोलिक संकेतक (GI) टैग भी दिया।
डिजिटल युग में मधुबनी का कायाकल्प
ई-कॉमर्स और सोशल मीडिया ने मधुबनी पेंटिंग को नई पहचान दी है। कलाकार अब ऑनलाइन अपनी पेंटिंग्स बेच रहे हैं और मोटा पैसा कमा रहे हैं। अब मिथिला के किसी गांव में बैठी महिला भी मेक्सिको के कस्टमर की डिमांड को मोबाइल स्क्रीन से पूरी कर रही है। इसके अलावा, फैशन डिज़ाइनर मधुबनी प्रिंट्स को साड़ियों, कुर्तों, और ड्रेसेज़ पर इस्तेमाल कर रहे हैं। साल 2025 में आम बजट पेश करने के दौरान देश की वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने भी भी मधुबनी चित्रकारी वाली साड़ी ही पहनी थी।
निर्मला सीतारमण
मधुबनी पेंटिंग सिर्फ़ एक कला रूप नहीं, बल्कि बिहार और भारत की संस्कृति और धरोहर (का एक अहम हिस्सा है। यह कला हमें सिखाती है कि सादगी और रचनात्मकता से भी विश्व स्तर पर पहचान बनाई जा सकती है। मधुबनी पेंटिंग का यह रंगीन सफर हमें हमारी सांस्कृतिक जड़ों से जोड़ता है और हमें गर्व करने का मौका देता है।
