राजधानी दिल्ली के भारत मंडपम में चिन्मय अमृत महोत्सव की शुरुआत हो चुकी है। 23 से 25 अक्तूबर तक चलने वाले इस कार्यक्रम में शुक्रवार को खुद देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी मौजूद रहे। उन्होंने कार्यक्रम में स्वामी चिन्मयानंद के होलोग्राम से बात की। इस अमृत महोत्सव में देश-विदेश से करीब 10 हजार लोगों के शामिल होने की संभावना है।
चिन्मय अमृत महोत्सव के दौरान पीएम मोदी ने चिन्मयानंद के होलोग्राम से बात की (Photo: PIB)
चिन्मय अमृत महोत्सव के इस ऐतिहासिक और भव्य आयोजन पर जब देश-दुनिया की नजरें टिकी हैं, तो अनायास ही उस प्रेरणास्त्रोत की याद आ जाती है, जिनके विजन से इस विशाल यात्रा की नींव पड़ी थी। सोचिए, एक ऐसा संगठन जो आज दुनिया भर में ज्ञान और सेवा का पर्याय बन चुका है, 1952 में उसकी शुरुआत एक ऐसे शख्स ने की थी जो कभी धर्म और अध्यात्म को महज छलावा या संदेह की नजरों से देखता था।
एक बागी पत्रकार और तीखे सवालों का दौर
8 मई 1916 को केरल के एर्नाकुलम में जन्मे बालकृष्ण मेनन बचपन से ही काफी मेधावी, ऊर्जावान और तार्किक स्वभाव के थे। अंग्रेजी साहित्य में डिग्री लेने के बाद उन्होंने एक बेहतरीन लेखक और पत्रकार के रूप में अपनी पहचान बनाई। इसके बाद वे भारत के स्वतंत्रता आंदोलन में कूद पड़े। जेल की यातनाएं झेलने और गंभीर बीमारी से उबरने के बाद, साल 1942 में उनका दृष्टिकोण पूरी तरह बदल चुका था। देश की आजादी के बाद वे राजनीति, अर्थशास्त्र और समाज सुधार के कार्यों से जुड़ गए, लेकिन उनके भीतर एक गहरी आंतरिक जिज्ञासा और बेचैनी बनी हुई थी।
ऋषिकेश की वह यात्रा, जिसने बदल दी दिशा
यह वह दौर था जब एक युवा पत्रकार के रूप में उनके मन में देश के साधु-संतों और धार्मिक गुरुओं की भूमिका को लेकर तमाम सवाल और संदेह थे। बालकृष्ण मेनन ऋषिकेश यह परखने और दुनिया के सामने तथाकथित साधुओं का पर्दाफाश करने गए थे कि ये संत देश के भविष्य और समाज के निर्माण में क्या योगदान दे रहे हैं।
हालांकि नियति ने उनके लिए कुछ और ही सोच रखा था। ऋषिकेश की उस पावन भूमि पर स्वामी शिवानंद से मुलाकात के बाद यह पत्रकार हमेशा के लिए बदल गया। जो व्यक्ति साधुओं का सच सामने लाने गया था, वह खुद जीवन की अंतिम सच्चाई की खोज में वहीं रुक गया। बाहरी दुनिया के सवालों में उलझा उनका मन अचानक भीतर की तरफ मुड़ गया। संतों की आलोचना करने गए उस युवा पत्रकार का यह जीवन-प्रसंग एक ऐतिहासिक आध्यात्मिक रूपांतरण में बदल गया और उन्होंने संन्यासी बनने का मार्ग चुन लिया।
स्वामी शिवानंद ने उनकी अद्भुत प्रतिभा और ज्ञान की पिपासा को देखते हुए उन्हें हिमालय के प्रख्यात संत स्वामी तपोवन महाराज के पास भेज दिया। स्वामी तपोवन जी के सानिध्य में उन्होंने सालों तक बर्फ की वादियों और गुफाओं में रहकर वेदों और उपनिषदों का कठोर अध्ययन किया। वे हिमालय की ऊंचाइयों से नीचे उतरे और अगले चालीस वर्षों तक लगातार यात्राएं करते हुए वेदांत के ज्ञान को आम जनमानस तक पहुंचाया। उन्होंने यह साबित कर दिया कि अध्यात्म जाति, धर्म, उम्र या राष्ट्रीयता की सीमाओं से परे है।
तर्क और आधुनिकता के साथ वेदांत का प्रसार
आध्यात्म की दुनिया का हिस्सा बनने के बाद स्वामी चिन्मयानंद कभी यह नहीं कहते थे किमा मान लो, वे हमेशा कहते - जांचो, समझो और फिर स्वीकार करो। एक तर्कशील और आधुनिक पत्रकार का दिमाग उनके पास था, इसीलिए उन्होंने अध्यात्म को अंधविश्वास या आडंबर बनने से रोका।
स्वामी चिन्मयानंद ने जब 1951 में पुणे में अपना पहले ज्ञान यज्ञ की शुरुआत के साथ चिन्मय मिशन की औपचारिक नींव रखी थी। शुरुआत में उनके तार्किक और आधुनिक अंदाज़ में दिए गए प्रवचनों को देखने बहुत कम लोग आते थे, लेकिन धीरे-धीरे उनके भाषणों का जादू लोगों के सिर चढ़कर बोलने लगा।
उन्होंने संस्कृत के गूढ़ ग्रंथों और भगवद्गीता के संदेशों को अंग्रेजी और सरल भाषा में आम जनता के सामने रखा, जिससे पढ़े-लिखे युवा, गृहस्थ और बुद्धिजीवी वर्ग तेजी से उनकी ओर आकर्षित होने लगा। देखते ही देखते यह कारवां एक बड़े जन-आंदोलन में बदल गया और देश के कोने-कोने में इसके अध्ययन केंद्र खुलने लगे। स्वामी जी के विचारों की लोकप्रियता सिर्फ भारत तक ही सीमित नहीं रही, बल्कि उनके शिष्यों और उनके द्वारा किए गए वैश्विक दौरों के माध्यम से यह मिशन विदेशों तक जा पहुंचा। आज अमेरिका, ब्रिटेन, कनाडा और ऑस्ट्रेलिया सहित दुनिया के कई देशों में इसके सैकड़ों केंद्र सक्रिय हैं, जहां वेदांत का यह ज्ञान अनवरत रूप से बह रहा है।
अगस्त 1993 में महासमाधि लेने के बाद भी उनकी विरासत किताबें, वीडियो-ऑडियो टेप और उनके द्वारा स्थापित वेदांत अकादमियों से प्रशिक्षित ब्रह्मचारियों व स्वामियों के माध्यम से पूरी दुनिया में निरंतर आगे बढ़ रही है।
ड्राइंग रूम तक पहुंची भगवद्गीता
स्वामी चिन्मयानंद ने भगवद्गीता और उपनिषदों को मंदिरों के गर्भगृह और गुफाओं से निकालकर आम आदमी के ड्राइंग रूम और युवाओं की सोच तक पहुंचा दिया। उनका मानना था कि जीवन से भाग जाना संन्यास नहीं है। जीवन की चुनौतियों का मजबूती से सामना करते हुए मन को शांत रखना ही असली अध्यात्म है। यही वजह है कि आज का पढ़ा-लिखा युवा वर्ग, कॉर्पोरेट एक्जीक्यूटिव्स और बुद्धिजीवी उनकी बातों से खुद को बहुत गहराई से जुड़ा हुआ पाते हैं। जो युवा डिप्रेशन या मानसिक तनाव से जूझ रहे हैं, उन्हें स्वामी जी के विचारों में अपनी समस्याओं का सीधा और व्यावहारिक समाधान मिलता है।
स्वामी चिन्मयानंद ने जो चिन्मय मिशन शुरू किया था, वह आज एक आध्यात्मिक संगठन से कहीं बढ़कर है। यह स्कूल, अस्पताल, ग्रामीण विकास और समाज सेवा का एक ऐसा जीवंत उदाहरण बन चुका है, जिसने करोड़ों जिंदगियों को बदला है।
भारत मंडपम का यह ऐतिहासिक उत्सव चिन्मय मिशन के 75 वर्षों के लंबे इतिहास को याद करने के साथ ही उस क्रांतिकारी सोच का उत्सव भी है जिसने सनातन दर्शन को आधुनिकता के साथ जोड़ा।
