हम सभी कभी न कभी अपने पुराने फैसलों को याद करके सोचते हैं कि काश तब ऐसा किया होता, काश वह मौका नहीं छोड़ा होता। वैसे मनोवैज्ञानिक मानते हैं कि पछतावे से बाहर निकलने का सबसे अच्छा तरीका अतीत में फंसना नहीं, उससे सीख लेना है। कुछ किताबें इसी नजरिए को मजबूत करती हैं और जीवन को नए ढंग से देखने की प्रेरणा देती हैं। यहां ऐसी ही पांच किताबों के बारे में जानिए, जो पछतावे से आगे बढ़ने में मदद कर सकती हैं।
पछतावे में जीना छोड़िए, ये 5 किताबें सिखाएंगी आगे बढ़ना (Photo: iStock)
1. द मिडनाइट लाइब्रेरी
यह उपन्यास नोरा सीड नाम की महिला की कहानी है, जिसे जीवन के अलग-अलग विकल्पों को जीने का मौका मिलता है। वह देखती है कि जिन फैसलों पर उसे सबसे ज्यादा पछतावा था, वे हर दुनिया में खुशी की गारंटी नहीं बनते। किताब यह संदेश देती है कि हर चुनाव के साथ कुछ पाने और कुछ छोड़ने की कहानी जुड़ी होती है।
2. द पावर ऑफ रिग्रेट
डेनियल पिंक इस किताब में बताते हैं कि पछतावा कमजोरी नहीं, बल्कि सीखने का एक जरिया हो सकता है। उन्होंने हजारों लोगों के अनुभवों के आधार पर पछतावे के चार बड़े प्रकार बताए हैं - नींव से जुड़े पछतावे, साहस न दिखाने वाले पछतावे, नैतिक पछतावे और रिश्तों से जुड़े पछतावे। उनका तर्क है कि इन भावनाओं को समझकर बेहतर फैसले लिए जा सकते हैं।
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3. द आर्ट ऑफ चूजिंग
कोलंबिया बिजनेस स्कूल की प्रोफेसर शीना अयंगर अपनी रिसर्च के जरिए समझाती हैं कि ज्यादा विकल्प हमेशा ज्यादा खुशी नहीं देते। कई बार बहुत सारे विकल्प हमारे भीतर उलझन और पछतावे को बढ़ा देते हैं। यह किताब सिखाती है कि फैसले लेते समय अपने मूल्यों और प्राथमिकताओं को पहचानना सबसे जरूरी है।
4. मैन्स सर्च फॉर मीनिंग
ऑस्ट्रियाई मनोचिकित्सक विक्टर फ्रैंकल ने नाजी यातना शिविरों में बिताए अपने अनुभवों के आधार पर यह किताब लिखी। उनका सबसे बड़ा संदेश है कि इंसान हर परिस्थिति में अपने जीवन का अर्थ खोज सकता है। यह किताब सिखाती है कि कठिन अतीत के बावजूद आगे बढ़ना संभव है और यही सोच पछतावे की पकड़ को कमजोर करती है।
5. द पावर ऑफ नाउ
अगर आप बार-बार पुराने फैसलों को याद करके परेशान रहते हैं, तो यह किताब वर्तमान में जीने की अहमियत समझाती है। एकहार्ट टॉले कहते हैं कि मन अक्सर या तो बीते हुए कल में उलझा रहता है या आने वाले कल की चिंता करता है। वर्तमान क्षण पर ध्यान केंद्रित करना मानसिक शांति की दिशा में बड़ा कदम हो सकता है।
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पछतावा खत्म नहीं होता, उसका मतलब बदल सकता है
मनोविज्ञान का कहना है कि पछतावा एक सामान्य मानवीय भावना है। फर्क सिर्फ इतना पड़ता है कि हम उसे बोझ बनाते हैं या सीख में बदल देते हैं। ये पांच किताबें यही याद दिलाती हैं कि जीवन में हर फैसला अंतिम नहीं होता और आगे बढ़ने का रास्ता हमेशा खुला रहता है।
