Science News: जब भी हम भूकंप का नाम सुनते हैं, हमारे दिमाग में टेक्टोनिक प्लेटों का टकराना, इमारतों का गिरना आता है और कभीकभार सुनामी आता है। लेकिन क्या आपने कभी बर्फ या ग्लेशियर के कारण आने वाले भूकंपों के बारे में सुना है? 26 अगस्त को नेपाल में जो तबाही आई, उसमें नेपाल-तिब्बत सीमा के पास लांगटांग लिरुंग पर्वत की चोटी से ग्लेशियर का एक विशाल हिस्सा टूटकर नीचे घाटी में गिर गया। इस घटना का असर इतना जोरदार था कि अमेरिकी भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण (USGS) ने इसे शुरुआत में 5.2 तीव्रता के भूकंप के रूप में दर्ज किया था। लेकिन आज हम जिस भूकंप की बात करने वाले हैं वो इस तरह के नहीं हैं।
क्या होते हैं ग्लेशियल भूकंप
अंटार्कटिका के सबसे खतरनाक और विशाल थ्वाइट्स ग्लेशियर (Thwaites Glacier), जिसे दुनिया 'डूम्सडे ग्लेशियर' यानी प्रलय का ग्लेशियर कहती है, उसके नीचे वैज्ञानिकों ने सैकड़ों ऐसे भूकंपों की पहचान की है जो अब तक दुनिया की नजरों से छिपे हुए थे। प्रसिद्ध वैज्ञानिक पत्रिका जियोफिजिकल रिसर्च लेटर्स में प्रकाशित एक शोध के अनुसार, 2010 से 2023 के बीच अंटार्कटिका में 360 से अधिक ऐसे भूकंपीय घटनाक्रम दर्ज किए गए हैं। आइए, आसान भाषा में समझते हैं कि 'ग्लेशियल अर्थक्वेक' क्या होते हैं, ये आम भूकंपों से कितने अलग हैं और अंटार्कटिका में इनका अचानक बढ़ना दुनिया के लिए चिंता का विषय क्यों है।
क्या होते हैं 'ग्लेशियल अर्थक्वेक'?
ग्लेशियल अर्थक्वेक अत्यधिक ठंडे और बर्फीले क्षेत्रों में आने वाले विशेष प्रकार के भूकंप होते हैं, जिसका कारण बड़े-बड़े हिमखंडों का टूटकर फिर ग्लेशियर से टकराना है। जब किसी ग्लेशियर का किनारा समुद्र से मिलता है, तो वहां बर्फ के ऊंचे और पतले विशालकाय टुकड़े, जिन्हें आइसबर्ग भी कहते हैं, ये टूटकर समुद्र में गिरते हैं। जब ये हिमखंड पानी में गिरकर पलटते, तो वे पीछे मौजूद मुख्य "मदर ग्लेशियर" से बहुत तेज और भयानक रूप से टकराते हैं। इस जबरदस्त टक्कर से धरती के भीतर बेहद शक्तिशाली कंपन पैदा होते हैं, जो हजारों किलोमीटर दूर तक फैलते हैं। इसी घटना को ग्लेशियल अर्थक्वेक कहा जाता है।
यह खोज अब तक छिपी क्यों रही?
धरती पर आने वाले सामान्य भूकंप टेक्टोनिक प्लेटों के खिसकने, ज्वालामुखी फटने या परमाणु परीक्षणों से आते हैं। ये झटके हाई-फ्रीक्वेंसी वाली तरंगें पैदा करते हैं, जिन्हें दुनिया भर के सिस्मोग्राफ तुरंत पकड़ लेते हैं लेकिन ग्लेशियल अर्थक्वेक में हाई-फ्रीक्वेंसी तरंगें पैदा ही नहीं होतीं। ये बहुत धीमी और कम-आवृत्ति वाली कंपन तरंगें उत्पन्न करते हैं। यही कारण था कि वैश्विक भूकंपीय नेटवर्क इन्हें आसानी से दर्ज नहीं कर पाता था और ये दशकों तक वैज्ञानिकों की नजरों से बचे रहे।
उत्तरी गोलार्ध के ग्रीनलैंड में दो दशक पहले पहली बार इस तरह के भूकंपों की खोज हुई थी। ग्रीनलैंड में आने वाले ग्लेशियल भूकंप इतने शक्तिशाली होते हैं कि उनकी तीव्रता उत्तर कोरिया द्वारा किए जाने वाले परमाणु परीक्षणों के बराबर होती है। हालांकि, अंटार्कटिका के ग्लेशियल भूकंप तुलनात्मक रूप से कम तीव्रता के होते हैं, इसलिए उन्हें पकड़ने के लिए वैज्ञानिकों को खुद अंटार्कटिका महाद्वीप पर मौजूद लोकल सिस्मोग्राफ स्टेशनों के आंकड़ों का गहराई से अध्ययन करना पड़ा।
'डूम्सडे ग्लेशियर' पर 245 भूकंप: खतरे की घंटी क्यों?
वैज्ञानिकों द्वारा दर्ज किए गए 362 भूकंपीय झटकों में से लगभग दो-तिहाई, यानी 245 भूकंप अकेले थवाइट्स ग्लेशियर के समुद्री किनारे पर दर्ज किए गए। यह ग्लेशियर आकार में बहुत बड़ा है और यदि थ्वाइट्स ग्लेशियर पूरी तरह से ढह जाता है, तो इससे दुनिया भर के समुद्र का जलस्तर लगभग 3 मीटर तक बढ़ सकता है। इससे मुंबई, न्यूयॉर्क, लंदन जैसे दुनिया के कई तटीय शहर जलमग्न हो सकते हैं। इसी कारण से इसे 'डूम्सडे ग्लेशियर' कहते हैं।
शोध में पाया गया कि 2018 से 2020 के दौरान थ्वाइट्स ग्लेशियर पर इन हिम-भूकंपों की संख्या सबसे ज्यादा थी। सेटेलाइट तस्वीरों से पुष्टि हुई कि इसी अवधि के दौरान ग्लेशियर की बर्फ तेजी से समुद्र की ओर बह रही थी। समुद्र के गर्म होते पानी और बदलते महासागरीय चक्र के कारण बर्फ की यह रफ्तार तेज हो रही है, जिससे हिमखंडों के टूटने और पलटने की दर बढ़ गई है।
पाइन आइलैंड ग्लेशियर की पहेली
शोधकर्ताओं को दूसरा बड़ा भूकंपीय क्लस्टर पाइन आइलैंड ग्लेशियर के पास मिला। लेकिन यहां की कहानी थोड़ी अलग है। इन आइलैंड में दर्ज झटके समुद्र तट से करीब 60 से 80 किलोमीटर अंदर की ओर थे। इसका मतलब है कि ये झटके हिमखंडों के समुद्र में पलटने से नहीं आ रहे हैं। यह वैज्ञानिकों के लिए अभी भी एक पहेली बना हुआ है और इस पर आगे और शोध की आवश्यकता है।
भविष्य के लिए यह खोज क्यों महत्वपूर्ण है?
अंटार्कटिका के ग्लेशियल अर्थक्वेक की खोज से वैज्ञानिकों को कई महत्वपूर्ण सवालों के जवाब पाने में मदद मिलेगी। इससे यह समझना आसान होगा कि समुद्र का गर्म पानी और जमीनी सतह मिलकर ग्लेशियर को किस सीमा तक अस्थिर कर रहे हैं। आने वाले 100 से 200 वर्षों में जलवायु परिवर्तन के कारण समुद्र का जलस्तर कितना बढ़ेगा, इसकी सटीक भविष्यवाणी करने में भी यह आंकड़े गेम-चेंजर साबित होंगे।
साथ यह अध्ययन चेतावनी देता है कि इंसानी गतिविधियों से हो रहा ग्लोबल वार्मिंग अब पृथ्वी के सबसे ठंडे और दूरस्थ कोनों तक पहुंच चुका है। बर्फ का यह खामोश कंपन भविष्य में आने वाले बड़े संकट का इशारा कर रहा है।
