West Bengal Politics: पश्चिम बंगाल में 'सियासी खेला'खत्म होने का नाम नहीं ले रहा। पश्चिम बंगाल की नंदीग्राम और रेजिनगर विधानसभा सीटों पर उपचुनाव के लिए 6 अक्टूबर 2026 को मतदान होगा और 9 अक्टूबर 2026 को नतीजे आएंगे, लेकिन चुनाव से ठीक पहले राज्य की राजनीति ने दिलचस्प मोड़ ले ली है। ममता बनर्जी की अगुवाई में करीब 15 साल तक शासन करने वाली तृणमूल कांग्रेस सबसे बुरे दौर से गुजर रही है। एक-एक कर ममता बनर्जी के सभी 'लॉयल' उनके बागी बनते जा रहे हैं।
TMC के नाम-चिन्ह से नंदीग्राम तक, बंगाल के सियासत में क्या-क्या हुआ?
शुक्रवार का मामला ही ले लीजिए। ममता बनर्जी गुट की उम्मीदवार संचिता प्रधान डे ने पहले सीएम शुभेंदु अधिकारी से मुलाकात की। इसके बाद नंदीग्राम सीट से अपनी उम्मीदवारी वापस ले ली। इस घटना के बाद ममता दीदी ने तो दूसरा उम्मीदवार भी उतारना सही नहीं समझा। आखिरकार, ममता बनर्जी ने कांग्रेस उम्मीदवार मिलन प्रधान का समर्थन किया, लेकिन बाद में कांग्रेस के प्रत्याशी को ही गिरफ्तार कर लिया गया।
इसके अलावा, सियासी उठापठक तृणमूल कांग्रेस (TMC) का नाम और चुनाव चिन् को लेकर भी जारी है। चुनाव आयोग के अंतरिम फैसले के बाद अब ममता बनर्जी का गुट पुराने ‘All India Trinamool Congress’ नाम और 'जोड़ा फूल' (Flowers & Grass) चुनाव चिन्ह का इस्तेमाल नहीं कर सकता। ईसी के इस फैसले से नाराज होकर ममता बनर्जी ने सर्वोच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया है।
टीएमसी में विवाद क्या है?
पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के बाद तृणमूल कांग्रेस के भीतर नेतृत्व और संगठन पर नियंत्रण को लेकर दो धड़े आमने-सामने आ गए। एक तरफ ममता बनर्जी के नेतृत्व वाला गुट है, जबकि दूसरी तरफ बागी नेताओं का गुट है, जिसने पार्टी के संगठन और विधायी ढांचे पर अपना दावा किया है।चुनाव आयोग के सामने दोनों पक्षों ने खुद को असली TMC बताया। आयोग के मुताबिक, दोनों पक्ष पार्टी के नाम और चुनाव चिन्ह पर दावा कर रहे थे। इसलिए इस विवाद का अंतिम फैसला Election Symbols (Reservation and Allotment) Order, 1968 के Paragraph 15 के तहत किया जाना है।
चुनाव आयोग ने क्या फैसला किया?
आगामी उपचुनावों की तारीख करीब होने के कारण चुनाव आयोग ने 17 सितंबर को अंतरिम आदेश जारी किया। इस आदेश के तहत दोनों गुटों को फिलहाल ‘All India Trinamool Congress’ नाम और पार्टी के पारंपरिक ‘Flowers & Grass’ चुनाव चिन्ह के इस्तेमाल से रोक दिया गया।
आयोग ने कहा कि दोनों पक्षों के दावों पर अंतिम फैसला करने के लिए विस्तृत प्रक्रिया की जरूरत है, लेकिन उपचुनाव सामने होने के कारण तत्काल अंतरिम व्यवस्था जरूरी है। दोनों गुटों से नए नाम और चुनाव चिन्ह के विकल्प मांगे गए।
दोनों गुटों को क्या मिला?
अगले ही दिन चुनाव आयोग ने दोनों गुटों को अस्थायी नाम और चुनाव चिन्ह आवंटित कर दिए। चुनाव आयोग ने ममता बनर्जी गुट और अरूप रॉय/ऋतब्रत बनर्जी गुट दोनों को ही अलग-अलग नाम और चुनावी चिह्न आवंटित किया।
ममता बनर्जी के नेतृत्व वाले गुट को 'ममता आल इंडिया तृणमूल कांग्रेस' नाम आवंटित किया गया। इस गुट को 'फुटबॉल प्लेयर' चुनाव चिह्न दिया गया। वहीं, अरूप रॉय/ऋतब्रत बनर्जी वाले गुट को 'डेमोक्रेटिक तृणमूल कांग्रेस' नाम और 'लिफाफा' चुनाव चिह्न आवंटित किया गया।
आयोग ने दोनों गुटों को पश्चिम बंगाल, मेघालय और त्रिपुरा में मान्यता प्राप्त राजनीतिक दल के रूप में माना है। यह व्यवस्था आगामी उपचुनावों के लिए अंतरिम है और इससे यह अंतिम रूप से तय नहीं होता कि मूल TMC नाम और चुनाव चिन्ह पर स्थायी अधिकार किस गुट का होगा।
ममता बनर्जी क्यों पहुंचीं सुप्रीम कोर्ट?
ममता गुट का कहना है कि उसे पार्टी के मूल नाम और चुनाव चिन्ह का इस्तेमाल करने दिया जाना चाहिए। अब सुप्रीम कोर्ट में यह मामला सामने आने के बाद विवाद का एक अहम हिस्सा न्यायिक जांच के दायरे में आ गया है।
रिपोर्टों के मुताबिक, याचिका पर जल्द सुनवाई के लिए 21 सितंबर को मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली पीठ के सामने इसका उल्लेख किए जाने की संभावना है।
क्या चुनाव आयोग का फैसला अंतिम है?
चुनाव आयोग ने अभी सिर्फ अंतरिम व्यवस्था की है ताकि आगामी उपचुनावों में दोनों गुट बिना भ्रम के अपने उम्मीदवारों को मैदान में उतार सकें।
मूल टीएमसी नाम और ‘जोड़ा फूल’ चुनाव चिन्ह पर किस पक्ष का दावा स्वीकार किया जाएगा, इसका अंतिम फैसला अभी बाकी है। आयोग ने इस विवाद को Paragraph 15 के तहत substantive determination के लिए रखा है। यानी अभी के लिए पुराना नाम और पुराना चिन्ह, फ्रीज कर दिया गया है।
