कैंसर की दवाओं की कीमतों में भारी अंतर और दवाओं के अधिकतम खुदरा मूल्य (MRP) तथा प्राइस टू रिटेलर (PTR) के बीच बड़े अंतर को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से कड़े सवाल किए हैं। आज मंगलवार को हुई सुनवाई के दौरान अदालत ने कहा कि सरकार मरीजों की जान से जुड़े मामले को केवल व्यापार और आर्थिक नीति के नजरिये से नहीं देख सकती।
कैंसर दवाओं की कीमतों पर सुप्रीम कोर्ट सख्त
कोर्ट ने एक घटना का जिक्र करते हुए बताया कि कीमोथेरेपी में इस्तेमाल होने वाला एक इंजेक्शन मेडिकल डिस्ट्रीब्यूटर को 11,000 रुपये में मिलता था, लेकिन एक जाने माने अस्पताल ने उसी इंजेक्शन के लिए 1.30 लाख रुपये वसूले। अदालत ने केंद्र से पूछा कि कीमतों में इतने बड़े अंतर का क्या औचित्य है और यह पैसा आखिर कहां जाता है? सुनवाई के बाद सुप्रीम कोर्ट ने मामले में फैसला सुरक्षित रख लिया।
'भारत में दवाओं की कीमतें कम हैं तो प्रति व्यक्ति आय की भी बात करनी होगी'
सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार ने दलील दी कि भारत में दवाओं की कीमतें दुनिया के सबसे कम स्तरों में हैं। इस पर सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि सबसे कम कीमतों की बात नहीं की जानी चाहिए, क्योंकि फिर भारत की कम प्रति व्यक्ति आय और दूसरी आर्थिक परिस्थितियों पर भी चर्चा करनी होगी।जस्टिस संदीप मेहता ने सवाल उठाया कि कैंसर की दवाओं के ट्रेड मार्जिन पर सीमा तय करने में सरकार को इतना समय क्यों लगा? उन्होंने कहा कि यह कोई रॉकेट साइंस नहीं है। सरकार सभी दवाओं की कीमतों को नियंत्रित क्यों नहीं कर सकती? केंद्र सरकार की ओर से पेश अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी ने कहा कि बाजार को खुद भी काम करने देना होगा। सरकार को चिकित्सा उद्योग के विकास के बारे में भी सोचना पड़ता है और पूरी तरह नियंत्रण करना इसका समाधान नहीं है। इस पर जस्टिस मेहता ने कहा कि सरकार केवल व्यापार और आर्थिक नीति की बात कर रही है। मरीजों के हितों को व्यापार के साथ तौलकर नहीं देखा जाना चाहिए।
11 हजार के इंजेक्शन के लिए 1.30 लाख रुपये वसूले
सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान एक ऐसी घटना का जिक्र किया, जिसे अदालत ने बेहद परेशान करने वाला बताया। कोर्ट के मुताबिक, कीमोथेरेपी में इस्तेमाल होने वाले एक विशेष इंजेक्शन के मेडिकल डिस्ट्रीब्यूटर की पत्नी कैंसर से पीड़ित थीं और उनका इलाज एक प्रतिष्ठित अस्पताल में चल रहा था।डिस्ट्रीब्यूटर ने अस्पताल प्रशासन को बताया कि वह खुद दवा के कारोबारी हैं और उन्हें यह इंजेक्शन 11,000 रुपये में मिलता है। इसके बावजूद अस्पताल ने बाहर से लाए गए इंजेक्शन को लगाने से इनकार कर दिया और उसी इंजेक्शन के लिए 1.30 लाख रुपये मांगे।अदालत ने केंद्र सरकार से सवाल किया कि इस अंतर को किस आधार पर सही ठहराया जा सकता है? कोर्ट ने कहा, 'क्या आप इस लूट का कोई औचित्य बता सकते हैं? इतना अंतर क्यों है? पैसा कहां जाता है?' अदालत ने यह भी सवाल उठाया कि क्या अस्पतालों को मरीजों को इस तरह नियंत्रित करने का अधिकार है कि वे अपनी जरूरत की दवा बाहर से खरीदकर भी इस्तेमाल नहीं कर सकें।
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15 रुपये की ड्रिप लाइन 250 रुपये में क्यों?
सुप्रीम कोर्ट ने चिकित्सा क्षेत्र में इस्तेमाल होने वाली दूसरी वस्तुओं की कीमतों में अंतर पर भी सवाल उठाए। अदालत ने ड्रिप लाइन का उदाहरण देते हुए कहा कि जिस वस्तु का प्राइस टू रिटेलर 15 रुपये है, उसे 250 रुपये में बेचा जा रहा है। कोर्ट ने पूछा कि जब कीमतों में इतना अंतर है तो ड्रग्स प्राइस कंट्रोल ऑर्डर (DPCO) का क्या औचित्य रह जाता है? अदालत ने कहा कि सरकार ऐसी स्थिति को जारी रहने दे रही है, जबकि इस विषय पर तीन संसदीय समितियां भी बन चुकी हैं। कोर्ट ने टिप्पणी की कि इन समितियों के निष्कर्ष उन लोगों के लिए बहुत सुविधाजनक नहीं हैं, जिनके हाथों में इस व्यवस्था को प्रभावित करने की ताकत है।
'पिछले 30 साल में पांच नए मॉलिक्यूल के नाम बताइए'
दवाओं की कीमतों को लेकर केंद्र सरकार की दलीलों पर सवाल उठाते हुए सुप्रीम कोर्ट ने भारतीय फार्मा उद्योग में इनोवेशन का मुद्दा भी उठाया। अदालत ने कहा कि सरकार कीमतों में अंतर का जवाब देने की जिम्मेदारी दवा उद्योग पर डाल रही है और उद्योग के इनोवेशन की बात कर रही है।कोर्ट ने पूछा कि पिछले 30 सालों में भारतीय फार्मा उद्योग ने कौन से पांच नए मॉलिक्यूल विकसित किए हैं? अदालत ने सरकार से ऐसे पांच मॉलिक्यूल के नाम बताने को कहा। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि मरीजों के पास दवाओं की कीमतों को लेकर मोलभाव करने की कोई ताकत नहीं होती। ऐसे में दवाओं की कीमतों में भारी अंतर का औचित्य स्पष्ट किया जाना चाहिए।
90 फीसदी दवाओं की कीमत पर कोई लगाम नहीं है
सुनवाई के दौरान अदालत ने कहा कि करीब 90 फीसदी दवाएं DPCO के दायरे से बाहर हैं। कोर्ट ने एक समाचार रिपोर्ट का हवाला देते हुए यह भी कहा कि दवाओं की कीमतों में अंतर से जुड़े मामले में दवा निर्माताओं से 8,000 करोड़ रुपये की वसूली लंबित है।
अदालत ने आयुष्मान भारत और दूसरी सरकारी स्वास्थ्य योजनाओं के तहत इलाज के खर्च की प्रतिपूर्ति का मुद्दा भी उठाया। कोर्ट ने कहा कि सरकार पांच लाख रुपये से अधिक की प्रतिपूर्ति नहीं करती। ऐसे में इलाज का अतिरिक्त खर्च अंततः मरीज को ही उठाना पड़ता है।
कैंसर की दवाओं पर 30 फीसदी ट्रेड मार्जिन की सीमा
हाल ही में केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को बताया था कि कैंसर की दवाओं के लिए ट्रेड मार्जिन 30 फीसदी तय किया गया है। हालांकि, अदालत को बताया गया कि यह सीमा दवा के MRP पर लागू होती है, न कि प्राइस टू रिटेलर (PTR) पर।सरकार ने सवाल उठाया कि दवाओं की कीमतों पर कितना नियंत्रण होना चाहिए और क्या पूरी तरह नियंत्रण करना उचित होगा?इस पर सुप्रीम कोर्ट ने पूछा कि क्या दवा कंपनियों को मनमानी करने की अनुमति दी जानी चाहिए? अदालत ने कहा कि जब मामला मरीजों और उनकी जान से जुड़ा है, तो क्या इस तरह की पूंजीवादी सोच अपनाई जानी चाहिए?
केंद्र सरकार ने दोहराया कि भारत में दवाओं की कीमतें दुनिया के सबसे कम स्तरों में हैं और सरकार समय-समय पर इस व्यवस्था में मौजूद विरोधाभासों को दूर करने का प्रयास कर रही है। इस पर अदालत ने पूछा कि सरकार ने कैंसर की दवाओं के ट्रेड मार्जिन की सीमा घटाकर 30 फीसदी करने का फैसला अचानक क्यों लिया? इतने वर्षों तक इस मुद्दे पर चुप्पी क्यों रही? कोर्ट ने कहा कि सरकार को कड़े सवाल पूछने के लिए मजबूर न किया जाए।
सरकार ने कहा कि इस विषय पर पहले से विचार-विमर्श किया जा रहा था। हालांकि, अदालत ने इस दलील से असहमति जताते हुए कहा कि यह कोई रॉकेट साइंस नहीं है। सरकार लोगों की जान से जुड़े मामले को केवल व्यापार और आर्थिक नीति के नजरिये से नहीं देख सकती। केंद्र सरकार ने कहा कि वह संतुलन बनाने की कोशिश कर रही है। इस पर सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि कीमतों के अंतर को लेकर कोई संतुलन नजर नहीं आ रहा है। अदालत ने कहा कि सरकार इस अंतर का औचित्य बताने में नाकाम रही है और वह यह सवाल करीब 30 बार पूछ चुकी है।
निजी अस्पतालों ने कहा- सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था पर अधिक बोझ
निजी अस्पतालों की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता मुकुल रोहतगी ने दलील दी कि निजी स्वास्थ्य क्षेत्र इसलिए विकसित हुआ है, क्योंकि सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था अपनी क्षमता के मुताबिक काम नहीं कर पा रही है और उस पर बहुत अधिक बोझ है। उन्होंने कहा कि निजी अस्पतालों की आय का बड़ा हिस्सा बीमा और सरकारी स्वास्थ्य योजनाओं से आता है। वहीं, अपनी जेब से भुगतान करने वाले मरीज लगभग 30 फीसदी तक हैं। रोहतगी ने कहा कि अदालत ने पूछा है कि अस्पतालों के पास पैसा कहां जाता है और वह इसी का सवाल का जवाब देना चाहते हैं।
इस पर सुप्रीम कोर्ट ने दवा की कीमतों का उदाहरण देते हुए पूछा कि अगर किसी दवा पर 100 रुपये की एमआरपी लिखा है, जबकि खुदरा विक्रेता उसे 10 या 20 रुपये में खरीदता है, तो उसकी कीमत 100 रुपये क्यों रखी जाती है? सरकार ऐसी व्यवस्था को जारी रहने की अनुमति क्यों दे रही है? केवल इसलिए कि दवा निर्धारित मूल्य नियंत्रण के दायरे में नहीं आती, क्या उसकी कीमतों को नियंत्रित नहीं किया जाना चाहिए?
'अस्पताल लूटपाट के जरिए नहीं चल सकते'
मुकुल रोहतगी ने दलील दी कि यदि दवाओं की कीमतें घटा दी गईं तो अस्पतालों का संचालन प्रभावित होगा और अस्पताल ठप हो सकते हैं।रोहतगी ने कहा कि अस्पताल मरीजों पर बाहर से दवाएं लाने के लिए भरोसा नहीं कर सकते। उन्होंने बाजार में नकली दवाओं की समस्या का हवाला देते हुए कहा कि यदि दवाओं की कीमतें कम की जाती हैं तो अन्य सेवाओं की कीमतें बढ़ सकती हैं। अस्पतालों को अपनी सभी सुविधाएं 24 घंटे चालू रखनी होती हैं और बुनियादी ढांचे को तैयार रखने के लिए लगातार खर्च करना पड़ता है। हालांकि, अदालत ने अस्पतालों की इस दलील को स्वीकार नहीं किया। कोर्ट ने कहा कि निजी अस्पताल कमर्शियल जगह हैं और वे हर सेवा के लिए मनमाना वसूलते हैं। फिर दवाओं की कीमतें 100 से 200 गुना तक अधिक क्यों रखी जाती हैं?अदालत ने कहा कि दवा कंपनियों की ओर से अस्पतालों को कॉरपोरेट डिस्काउंट भी दिया जाता है, लेकिन इस पहलू को भी व्यवस्था के भीतर छिपाकर रखा जाता है। केवल यह कहना पर्याप्त नहीं है कि निजी अस्पताल चलाने के लिए एमआरपी पर दवा बेचना जरूरी है।
