SC on Death Penalty: मौत की सजा पाए दोषियों को फांसी देने के वैकल्पिक तरीके की मांग वाली याचिका सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दी है। याचिका में दलील दी गई थी कि फांसी देना मौत की सजा देने का एक दर्दनाक तरीका है। हालांकि, जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने फैसला सुनाते हुए यह स्पष्ट किया कि इस याचिका का खारिज होना केंद्र सरकार के रास्ते में बाधा नहीं बनेगा, अगर सरकार मृत्युदंड के तरीकों की व्यापक समीक्षा करना चाहती है और इसके निष्पादन के लिए किसी अधिक सम्मानजनक या वैकल्पिक तरीके को अपनाना चाहती है।
फांसी की सजा के वैकल्पिक तरीके पर सुप्रीम ने क्या कहा
सुप्रीम कोर्ट में याचिका खारिज
सुप्रीम कोर्ट ने आज मौत की सजा के लिए फांसी देने की मौजूदा व्यवस्था खत्म करने की मांग वाली याचिका खारिज कर दी। हालांकि, कोर्ट ने साफ किया कि याचिका खारिज होने का मतलब यह नहीं है कि भविष्य में इस व्यवस्था की संवैधानिक समीक्षा नहीं हो सकती। अगर नए और ठोस मेडिकल या वैज्ञानिक सबूत सामने आते हैं, जिनसे यह साबित हो कि फांसी के तरीके पर दोबारा विचार करने की जरूरत है, तो मामला फिर अदालत के सामने आ सकता है।
जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने यह फैसला सुनाया। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि उसका फैसला केंद्र सरकार को मौत की सजा देने के तरीके की व्यापक समीक्षा करने से नहीं रोकता। सरकार चाहे तो विशेषज्ञों की समिति बनाकर यह जांच करा सकती है कि क्या कोई दूसरा तरीका संविधान के उस उद्देश्य को बेहतर तरीके से पूरा कर सकता है, जिसमें दर्द और पीड़ा को न्यूनतम रखते हुए दोषी की गरिमा सुनिश्चित करना शामिल है।
फांसी की जगह दूसरे तरीके अपनाने की मांग
यह जनहित याचिका वरिष्ठ अधिवक्ता ऋषि मल्होत्रा ने दायर की थी। इसमें दंड प्रक्रिया संहिता यानी CrPC की धारा 354(5) को चुनौती दी गई थी। इस प्रावधान के तहत मौत की सजा पाए कैदी को तब तक गर्दन से फांसी पर लटकाने का निर्देश दिया जाता है, जब तक उसकी मौत न हो जाए। याचिका में फांसी की जगह इंट्रावीनस लेथल इंजेक्शन, गोली मारना, इलेक्ट्रोक्यूशन या गैस चैंबर जैसे विकल्पों पर विचार करने की मांग की गई थी। याचिकाकर्ता का तर्क था कि मौजूदा प्रक्रिया में कैदी को लंबे समय तक दर्द और पीड़ा से गुजरना पड़ सकता है।
याचिका में धारा 354(5) को संविधान के अनुच्छेद 21 का उल्लंघन बताते हुए इसे असंवैधानिक घोषित करने की मांग की गई थी। साथ ही गरिमापूर्ण तरीके से मृत्यु का अधिकार मौलिक अधिकार के रूप में मान्यता देने की मांग भी की गई थी।
सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?
सुप्रीम कोर्ट ने याचिका खारिज करते हुए भविष्य के लिए रास्ता पूरी तरह बंद नहीं किया है। कोर्ट ने कहा कि अगर आगे चलकर कोई ठोस मेडिकल या वैज्ञानिक सामग्री सामने आती है, जिससे यह साबित हो कि फांसी से होने वाले दर्द और पीड़ा के कारण मौजूदा व्यवस्था पर दोबारा संवैधानिक जांच जरूरी है, तो अदालत इस मुद्दे पर फिर विचार कर सकती है।
कोर्ट ने केंद्र को भी विशेषज्ञ समिति के जरिए मौत की सजा देने के तरीके की समीक्षा करने की स्वतंत्रता दी है। ऐसी समीक्षा का उद्देश्य यह देखना हो सकता है कि कोई वैकल्पिक तरीका कम से कम दर्द और पीड़ा के साथ दोषी की गरिमा को बेहतर तरीके से सुनिश्चित करता है या नहीं।
2023 में विशेषज्ञ समिति बनाने पर हुआ था विचार
इस मामले में मार्च 2023 में सुप्रीम कोर्ट ने विशेषज्ञ समिति बनाने की संभावना पर विचार किया था। कोर्ट ने अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणी से फांसी के असर, इससे होने वाले दर्द, मौत होने में लगने वाले समय और फांसी की प्रक्रिया को लागू करने के लिए उपलब्ध संसाधनों से जुड़ी जानकारी जुटाने को कहा था। मई 2023 में अटॉर्नी जनरल ने बताया था कि उन्होंने मौत की सजा लागू करने के बेहतर विकल्पों पर विचार के लिए विशेषज्ञ समिति बनाने की सिफारिश की है। केंद्र सरकार इस समिति के सदस्यों को लेकर विचार कर रही थी।
लेथल इंजेक्शन पर भी हुई बहस
पिछली सुनवाई में याचिकाकर्ता ने फांसी की जगह लेथल इंजेक्शन का विकल्प अपनाने की वकालत की थी। दलील दी गई थी कि दोषी को फांसी और लेथल इंजेक्शन में से विकल्प चुनने की अनुमति दी जा सकती है। हालांकि, इस दौरान प्रोजेक्ट 39A ने लेथल इंजेक्शन को लेकर दूसरे देशों के अनुभवों का हवाला देते हुए बताया कि यह तरीका भी पूरी तरह सफल नहीं माना गया है। संगठन ने कहा कि विशेषज्ञ समिति बनाकर सभी संभावित विकल्पों और उनसे जुड़े वैज्ञानिक साक्ष्यों का अध्ययन किया जा सकता है। सुनवाई के दौरान जस्टिस संदीप मेहता ने फांसी देने वाले जल्लादों पर पड़ने वाले मनोवैज्ञानिक प्रभाव की ओर भी ध्यान दिलाया।
सरकार ने कहा- उच्च स्तर पर हो रहा विचार
इससे पहले सुनवाई के दौरान अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणी ने सुप्रीम कोर्ट को बताया था कि केंद्र सरकार इस मामले की उच्चतम स्तर पर समीक्षा कर रही है और इसके लिए कुछ समितियां भी गठित की गई हैं।
